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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-२८ १२९
इसी बीच कृष्णकुल (ब्रज में) अन्तराल हुआ। यादवजनों में विछोह शुरू
हुआ। वहाँ कपट की चिता की ज्वाला प्रज्वलित हुई जिसको विद्वानों ने दैव
(दैवक्लेश) नाम से कहा है।¹ उस क्षेत्र में काल का प्रतिज्ञान रखने वाला
(कालयवन) महारथी चढ़ आया (?)।
शेषाश्च विनिवर्तन्ते जरासन्धभयार्दिताः ॥ 17 ॥
ये देवगिरिमाश्चित्य सौराष्ट्रदेशवासिनः ।
वारुण्यां च दिशायां च प्रभासक्षेत्रमागताः ॥ 18 ॥
(वहाँ से) शेष सभी जन जरासन्ध के भय से दुखी होकर लौट गए जो देवगिरि
होते हुए सौराष्ट्र के निवासी हुए और पश्चिम दिशा में प्रभास क्षेत्र तक पहुँचे।²
समुद्राभ्यर्थनं कृत्वा कृष्णो वा बलदेवकः ।
सद्यो (द्रो ?) गेन्द्र भूमिसैना स्थितावुभौ दन्तकाष्ठादिभिः ॥ 19 ॥
वरुणेषु यत्र द्वारं चतुर्विंशति²⁴ योजनैः ।
वहाँ श्रीकृष्ण और बलदेव ने समुद्र की पूजा की। दोनों ने अपनी पैदल सेना व
गजों को ध्यान पूर्वक देखा अर्थात् सेना का निरीक्षण किया। वरुण या पश्चिम दिशा
में जहाँ द्वार (समुद्र के बाद देश का द्वार होने से द्वारका की पहचान, समुद्र-द्वार)
था, भूमि चौबीस योजन विस्तार था।
शक्रेण प्रेषितास्तत्र निधयो धनदेव च ॥ 20 ॥
तेभ्यः समुद्भवा सृष्टिः काञ्चनै रत्नसञ्चितैः ।
दिनानां त्वेकविंशत्या²¹ ³सम्भवाः कुलयादवाः ॥ 21 ॥

  1. हरिवंश में यवनाधिपति के लिए 'दैवादपुत्रः' शब्द का प्रयोग हुआ है जो देवयोग से पुत्र विहीन था
    और पुत्र की कामना रखता था। (हरिवंश विष्णुपर्व 57, 12) महारथी कालयवन गोपाली नामक
    अप्सरा से तपस्वी गार्ग्यमुनि के द्वारा नियोग से उत्पन्न हुआ— मानुष्यां गार्ग्यभार्यायां
    नियोगाच्छूलपाणिना । स कालयवनो नाम जज्ञे शूरो महाबलः ॥ (तत्रैव 57, 15) कृष्ण ने मथुरा में वैर
    का अन्त कर डालने की इच्छा से द्वारकापुरी बसाकर वृष्णिवंशियों को आश्वासन दिया था— वैरस्यान्तं
    विधित्संस्तु वासुदेवो महायशाः । निवेश्य द्वारकां राजन् वृष्णीनाभास्य चैव ह ॥ (तत्रैव 57, 39)
  2. हरिवंश आदि में लोगों के उत्तर क्षेत्र से पलायन कर पश्चिम दिशावर्ती क्षेत्रों में जाकर बसने का वर्णन
    मिलता है। 'अन्तर्गिरिद्रोणी' सङ्केत पर विद्वानों ने विचार करते हुए कहा है कि लोग देश की सीमाओं पर
    स्थित पहाड़ी प्रदेशों की घाटियों की ओर पलायन करेंगे। लोग वनाञ्चलों, राजस्थान की लूणी नदी के
    तटवर्ती क्षेत्रों और हिमालय के पार्श्व में जाकर म्लेच्छों के साथ बस जाएँगे—कृत्स्नं वा हिमवत्पार्श्वे कूलं च
    लवणाम्भसः । अरण्येषु च वत्स्यन्ति नराः म्लेच्छगणैः सह ॥ (हरिवंशपुराण भविष्यपर्व 3, 4, 32)
  3. 'सम्बद्धाः कुलयादवाः ?' इति प्रकाशित पाठः । विशेष— महाभारत के खिल हरिवंश, ब्रह्मवैवर्तपुराण में
    द्वारकापुरी की रचना का विशेष वर्णन मिलता है।

130 अपराजितपृच्छा
तत्राष्टादशकोटीनां निवासाश्च महोत्सवाः।
वहाँ देवराज इन्द्र ने सहायता की और कुबेर ने निधियाँ अर्पित कीं। वहाँ भी
सृष्टि से पूर्व सञ्चित रत्न और स्वर्ण सभी यादव कुलों के सामूहिक प्रयास से इक्कीस
दिनों में बाहर निकला। इसी के बल पर वहाँ अठारह करोड़ निवास गृह बनाए गए
और महोत्सव रखा गया।
अथ द्वारकापुरीवर्णनं —
सा पुरी च महारम्या हेमप्राकारसम्भवा ॥ 22 ॥
पुर-प्राकार-परिखा-प्रतोली-मार्ग-गोपुरम्।
प्रासाद-प्रतिमा-सद्ममाडोत्तुङ्गमहोत्सवम् ॥ 23 ॥
उस द्वारकापुरी की बसावट बहुत रमणीक थी जिसमें स्वर्ण से निर्मित परकोटे
थे। उसकी रचना में पुर, प्राकार, परिक्खा (खाई), प्रतोली (लघु द्वार), महापथ,
गोपुर, प्रासाद और उनमें प्रतिमाएँ, भवन, माड बहुत उन्नत थे जिनमें महोत्सव का
माहौल था।
हिन्दोलकैस्तोरणैश्च रत्नैश्चैव विभूषिता।
रत्नोद्योतकुलाकीर्णा हेमरौप्यादितो भवा ॥ 24 ॥
स्फटिकैर्दिव्यसोपानैस्तडागैर्विविधैस्तथा।
पुष्परागेन्द्रनीलाढ्यपदकैः सूर्यरश्मिभिः ॥ 25 ॥
द्वारका नगरी को हिन्दोलों, तोरणों और नाना रत्नों से सजाया गया था जिससे
असंख्य रत्नों के पुञ्ज की और सोने-चाँदी के उपकरणों की चारों ओर चमक-ही-
चमक प्रसारित हो गई थी। द्वारका नगरी के तरह-तरह के जलाशयों के सोपान,
स्फटिक से निर्मित बड़े दिव्य बने हुए थे जिन पर सूर्य की किरणों से पुष्पराग
(पुखराज), इन्द्रनीलमणि (नीलम) आदि की शोभायुक्त छवि देखते ही बनती थी।
श्वेतरक्तहरित्पीतैः प्राकारैरिन्द्रकोपमैः।
अनेकोद्यानवाटीभिर्दिव्यवृक्षलतागृहैः ॥ 26 ॥
एकोद्येकविंशत्यन्तभूम्युद्भवगृहाणि च।
मालमौलिशुद्धशृङ्गहर्म्याणि च तथैव च ॥ 27 ॥
श्वेत, रक्त, पीत, हरित रङ्ग के परकोटे इन्द्रधनुष की छटा बिखरते थे।
द्वारकापुरी में अनेकों उद्यान, वाटिकाएँ थीं जिनमें दिव्य वृक्ष और नाना कुञ्ज बने
हुए थे। द्वारकापुरी के भवन एक तल से लेकर इक्कीस तल तक के थे। इनमें माल-
मौली (पङ्क्तियों की कतारों) से शुद्ध कँगूरों वाली बड़ी-बड़ी हवेलियाँ थीं।

सूत्र-२८ 131
राजालयस्य मध्ये च सद्मानि विष्णुतेजसा ? ।
तानि द्व्यष्टसहस्राणि माणिक्यादियुतानि च ॥ २८ ॥
मण्डपैः सुवितानैश्च चन्द्रार्कद्युतिसन्निभैः ।
वसन्तोत्सवसम्प्राप्तौ गोपीक्रीडार्थमेव च ॥ २९ ॥
इसी प्रकार वहाँ राजालय थे जिनके बीच-बीच विष्णु के तेज के समान
प्रकाशित होने वाले कक्षालय थे। इनमें सोलह हजार माणिक्यादि रत्नों से विजड़ित
मण्डप बने हुए थे जिनके चन्दोवे, वितानों की शोभा सूर्य और चन्द्रमा की चमक
के समान प्रतीति देती थी और जो वसन्तोत्सव आने पर गोपीजन के साथ क्रीड़ा
अर्थात् रासलीला के निमित्त बनाए गए थे।
तथा त्रिवलिकैस्तालैस्तथा च पटहोत्तमैः ।
स्वरैश्च मधुरैर्वंश्या हुडकैश्च सलीलया ॥ ३० ॥
विष्णोर्महोत्सवश्चैवं द्वारकापुरमण्डनः ।
वर्णितो देवदैत्याद्यैर्विष्णुराजमहोत्सवः ॥ ३१ ॥
वहाँ लीलाओं के बीच-बीच त्रिवलिका¹ की तालों पर और बड़े-बड़े नगारों
का स्वर वंशी का मधुर निनाद और हुडक्का का वादन होता। उक्त विष्णु महोत्सव
से द्वारकापुर की शोभा बढ़ती है। विष्णुराज महोत्सव का ऐसा वर्णन देवताओं व
दानवों ने किया है।
ध्यष्टयोजनविस्तारा ह्यायता त्र्यष्टयोनैः ।
समुद्रेण त तद्द्वारमुत्तमा द्वारिकाभिधा ॥ ३२ ॥
सर्वश्रेष्ठा पूरीणां च द्वारिका विष्णुभक्तिदा।
वह सोलह योजन विस्तार और चौबीस योजन लम्बाई वाली जो द्वारका नामक
की नगरी² है, वह वास्तव में समुद्र यात्रा करने वालों के लिए उत्तम समुद्र द्वार ही
है। भगवान् विष्णु की भक्ति देने वाली जितनी भी सर्वश्रेष्ठ पुरियाँ हैं, उनमें
द्वारकापुरी भी एक हैं।
तत्र बलादीनां वर्णनं —
चत्वारिंशत्सहस्राणि दन्तिनश्च महोत्कटाः ॥ ३३ ॥

  1. कृदिकारादिति पक्षे ङीपि त्रिवलीत्यपि। (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 2, पृष्ठ 662)
  2. वराहपुराण में इसको पाँच योजन विस्तृत एवं दस योजन लम्बी बताई गई है, इसको इन्द्रपुरी के समान
    व विश्वकर्मा द्वारा निर्मित कहा गया है—अस्ति द्वारवती नाम पुरी शक्रपुरी यथा। मत्प्रभावानुरूपा च
    निर्मिता विश्वकर्मणा॥ पञ्चयोजनविस्तारा दशयोजनमायता। (वराह. 147, 7-8)

चतुर्लक्षाणि सङ्ख्ययाता अश्वास्तेजस्विनस्तथा।
रथाः सपादकोट्यश्च चोष्ट्राः सार्धत्रिकोटिकाः ॥ 34 ॥
तथाष्टादशकोट्यश्च यादवाश्च महाबलाः।
सुभटाश्च महावीरा असङ्ख्ययाताः पदातयः ॥ 35 ॥
इस द्वारकापुरी में चालीस हजार महोत्कट अर्थात् महाबलवान दुर्दभ हाथी हैं
और चार लाख की संख्या में बड़े तेजस्वी अश्व भी हैं। इसके अतिरिक्त सवा करोड़
रथ और साढ़े तीन करोड़ ऊँट हैं। इस नगरी के निवासी यादवगण महाबलवान हैं
जिनकी संख्या अठारह करोड़ हैं, ये सब के सब वीर योद्धा हैं और उनके साथ
असंख्य पैदल सैनिक भी हैं।
द्वारिका या पुरी ख्याता पूज्या सुरनरोरगैः।
सिद्धचारणसङ्गीता ह्याप्सरोगणसेविता ॥ 36 ॥
विद्याधरैश्च गन्धर्वैर्नागेन्द्रैश्चोपसेविता।
तपोधनैश्च दिव्यैश्च ऋषिवृन्दैः समावृता ॥ 37 ॥
माया च मथुरा चैवायोध्या वाराणसी तथा।
काञ्ची जयन्ती द्वारका ह्येता मुक्तिप्रदायिका ॥ 38 ॥
सुर, नर और उरग-नागों के द्वारा पूजित यह द्वारकापुरी बहुत प्रसिद्ध है। सिद्ध,
चारणों द्वारा इसकी महिमा गायी गई है तथा अप्सरा व गणों के द्वारा यह सेवित है।
विद्याधरों, गन्धर्वों, नागराजाओं आदि से यह उपसेवित है और यहाँ तपोधनी, दिव्य
ऋषिगणों के समूहों की बहुतायत है। इसीलिए मुक्तिप्रदायिका नगरियों¹ में द्वारका
भी माया, मथुरा, अयोध्या, वाराणसी, काञ्चीपुर, जयन्ती (अमरावती) इन सात
पुरियों के साथ स्मरण योग्य है।
जरासन्धं वधिष्यामि हेतुमात्रेण भीमतः।
शिशुपालं वधिष्यामि यज्ञे धर्मसुतस्य वै ॥ 39 ॥
ततः पश्चात्करिष्यामि साहाय्यमर्जुनस्य च।
विष्णोर्वाक्यसहायेन हनिष्यामि कुरून् रणे ॥ 40 ॥
(कृष्ण पुनः स्मरण कराते हैं कि) मैं भीम के बहाने से जरासन्ध को मारूँगा
और शिशुपाल को धर्मराज युधिष्ठिर के यज्ञ के बहाने मारूँगा। इसके बाद, मैं अर्जुन
का सहायक बनकर भगवान् विष्णु के वचनों के सहाय (श्रीमद्भगवद्गीता के

  1. अन्यत्र 1. अयोध्या, 2. मथुरा, 3. माया, 4. वाराणसी, 5. काञ्ची, 6. अवन्ती और 7. द्वारका-
    सप्तपुरियों का यह क्रम मिलता है।

सूत्र-२८ 133
वचनानुसार) से अर्जुन को तैयार कर कौरवों का रणाङ्गन में संहार करूँगा।
शस्त्रहस्ता मृता ये ऽत्र स्वर्गं यास्यन्ति क्षत्रियाः।
कलौ च समनुप्राप्ते चतुर्थे युगपर्यये ॥ ४१ ॥
नेमिनाथाभिधानस्तु समुद्रविजयात्मजः।
गिरिमस्तकसम्भूतो द्वाविंशश्च₂₂ तीर्थङ्करः ॥ ४२ ॥
(उक्त महाभारत के रण में) जो क्षत्रिय हाथ में शस्त्र लिए हुए मरेंगे, वे सीधे
स्वर्ग में जाएँगे। यह सब घटना कलियुग, चतुर्थ युग आते-आते ही हो जाएगी।
इसके उपरान्त मैं समुद्रविजय राजा के पुत्र के रूप में नेमिनाथ नाम धारण करके
गिरिनार पर्वत के मस्तक पर बाईसवाँ तीर्थङ्कर बनकर उत्पन्न होऊँगा।
पाण्डवांश्च करिष्यामि केदारे तु हिमाश्रयान्।
गमयिष्यति स्वर्गे तान् केदारः प्रकटीकृतः ॥ ४३ ॥
मैं पाण्डवों को हिमालय के आश्रय में भेजकर उन्हें केदार की ओर जाने को
कहूँगा और वहाँ से जब वे स्वर्ग को जाएँगे, तो केदार तीर्थ को प्रकट करूँगा।
अथ केदारमाहात्म्य —
पृथिव्यां यानि तीर्थानि यानि तिष्ठन्ति भूतले।
केदारं प्रति गत्वा च तदनुग्रहदायकम् ॥ ४४ ॥
भारते च महापुण्यं न तीर्थं केदारात्परम्।
यदिच्छन्ति नरा मोक्षमाश्रयन्तु हिमाचलम् ॥ ४५ ॥
पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं और भूतल पर जितने भी तीर्थ हैं, उन सबमें से
जो भी केदार तीर्थ की ओर जाएगा, उस पर केदार का अनुग्रह दान सदा ही बरसता
रहेगा। समस्त भारत में केदारसे अधिक पुण्यवान् कोई तीर्थ नहीं है। जो भी व्यक्ति
मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखता हो, उसे हिमाचल का आश्रय लेकर केदार तीर्थ में
अवश्य आना चाहिए।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां हरेरष्टमः
कृष्णावतारनिर्णयाधिकारो नामाष्टाविंशं सूत्रम् ॥ २८ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में हरि का
आठवाँ कृष्णावतार निर्णय अधिकार नामक अठाईसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥

134 अपराजितपृच्छा
विष्णोर्जन्मरहस्यदशमोऽवतारो नाम नवविंशं सूत्रम् ॥ २९॥
विश्वकर्मोवाच —
कलौ युगे तु सम्प्राप्ते आश्विने कृष्णपक्षके।
नवम्यां च तिथौ चैव मृगान्ते सुमुहूर्तके ॥ १ ॥
शुद्धोदनसुतो भूत्वा मोहयिष्यामि मानवम्।
युगे तत्र भविष्यन्ति मुण्डाः काषायवाससः ॥ २॥
विश्वकर्मा बोले— कलियुग के आ जाने पर आश्विन मास के कृष्णपक्ष की
नवमी तिथि को मृग (मृगशिरा) नक्षत्र के अन्तिम चरण व शुभ मुहूर्त में, राजा
शुद्धोदन का पुत्र होकर, मैं बुद्ध का अवतार लेकर संसार के मानवों को मोहित कर
लूँगा अर्थात् उनको धर्म सम्बन्धी विवेकहीन कर लूँगा।¹ तब कलियुग के ऐसे
समय में काषाय गेरुए वस्त्रधारी केशमुण्डित बौद्ध संन्यासी होने लगेंगे।
शूद्राः शूद्रेषु दास्यन्ति विष्णौ बुद्धत्वमागते।
तेषामल्पतरो धर्म इह लोके परत्र च ॥ ३॥
दिगम्बरवृत्तिकास्तत्र बुद्धयुक्तकलौ युगे।
श्वेताम्बरास्तथान्ये च तथा नीलाम्बराः क्वचित् ॥ ४॥
इस प्रकार विष्णु के बुद्धत्व अवतार लेने पर उस युग में शूद्र शूद्रों को दीक्षा
देंगे जिससे उनमें धर्म अल्पतर होता जाएगा और वे इस मृत्युलोक में और परलोक

  1. इतिहास में वैशाख पूर्णिमा बुद्ध जयन्ती के रूप में मान्य है जबकि काशीनाथोपाध्याय कृत 'धर्मसिन्धु'
    में दशावतार जयंती निर्णय प्रकरण में आश्विन शुक्ल दशमी तिथि को सन्ध्या में बुद्धावतार होने की बात
    लिखी है— आश्विनशुक्लदशम्यां सायं बुद्धोऽभूत्।
    विष्णुपुराण में इस अवतार को मायामोह कहा गया है। मायामोह के जैन और अन्य रूप धारण करने के
    प्रसङ्ग में बौद्धधर्म का उल्लेख है। वह जितेन्द्रिय मायामोह रक्तवस्त्र धारण कर अन्यान्य असुरों के पास
    पहुँचा और उनसे मृदु, अल्प और मधुर वाणी में बोला कि हे असुरगण ! यदि तुम लोगों को स्वर्ग या
    मोक्ष की इच्छा है तो पशुहिंसा आदि दुष्टकर्मों का त्याग कर तुम बोध को प्राप्त करो— पुनश्च
    रक्ताम्बरधृङ् मायामोहो जितेन्द्रियः । अन्यानाहासुरान् गत्वा मृद्वल्पमधुराक्षरम् ॥ स्वर्गार्थं यदि वो वाञ्छा
    निर्वाणार्थमथासुराः । तदलं पशुघातादिदुष्टधर्मैर्निबोधत ॥ (विष्णु. 3.18.16-17)
    रक्ताम्बरधारी मायामोह ने कहा कि यह सम्पूर्ण जगत् विज्ञानमय है— ऐसा जानो। मेरे वाक्यों पर पूरी
    तरह ध्यान दो। इस प्रसङ्ग में बुधजनों का ऐसा ही कहना है कि यह संसार अनाधार है, भ्रमजन्य पदार्थों
    की प्रतीति पर ही स्थिर है और रागादि दोषों से दूषित है। इस संसार-सङ्कट में जीव निरन्तर भटकता
    रहता है। इस प्रकार बुद्ध के ज्ञानसूचक शब्द भी पुराणकार ने दिए हैं- बुध्यत (जानिये), बुध्यध्वम्
    (समझिये), बुध्यत (जानिये)— विज्ञानमयमेवैतदशेषमवगच्छ ॥ बुध्यध्वं मे वचः
    सम्यग्बुधैरैवमिहोदितम् ॥ जगदेतदनाधारं भ्रान्तिज्ञानार्थ तत्परम्। रागादि दुष्टमत्यर्थं भ्राम्यते भव सङ्कटे ॥
    (तत्रैव 3. 18.18-19)

में दिगम्बर वृत्तियुक्त से बुद्ध वृत्तियुक्त और अन्य श्वेताम्बर युक्त रूप में तथा कहीं-
कहीं नीलाम्बर रूप में कलियुग में दिखाई देंगे।
केवलिन चतुर्विंशतितीर्थङ्कराः —
जिनोक्ताः केवलिनश्च चतुर्विंशतितीर्थगाः ₂₄ ।
अनन्तरं चर्षभाद्याश्चतुर्विंशति ₂₄ रेव च ॥ ५ ॥
हुताशनः पद्मनाभो जिनानां तु च सङ्ख्यया।
उक्ताः शासनदेव्यश्च यक्षाणां च तथैव च ॥ ६ ॥
पृथगेकैकशः प्रोक्ता अष्टौ ₈ वै प्रतिहारिणः।
(इनके अतिरिक्त मायामोह के रूप के ही अनुयायी ऐसे अन्य धार्मिक जन)
जिन कहलाएँगे। वे केवली भी कहलाएँगे और चौबीस तीर्थङ्करों को मानने वाले
होंगे। इनके ऋषभादि नाम वाले चौबीस तीर्थङ्कर हैं। उन सभी जिन तीर्थङ्करों की
अपनी चौबीस संख्या के अनुसार अपने-अपने हुताशन, पद्मनाभ, शासनदेवियाँ,
यक्षगण आदि कहे गए हैं। इसी प्रकार उनके एक-एक के पृथक्-पृथक् आठ-
आठ प्रतिहारीगण भी होते हैं।
तस्यानुयायी कथनं —
वणिग्धर्मेण मुदिता ज्ञानार्णव उदाहृताः ॥ ७ ॥
तेषां न स्नानहोमानि पितृपिण्डो न दीयते।
पाखण्डिनो विकर्मस्थाः पाणिपात्रेषु भक्षकाः ॥ ८ ॥
इनके अनुयायी सभी वणिक् धर्म को मानने वाले मुनियों द्वारा मात्र कथा,
प्रवचन सुनने के ज्ञानसागर में उदारता से लीन रहने और प्रसन्न रहने वाले होंगे।
इनके अतिरिक्त उनमें स्नान, ध्यान, होम, पिण्डदान आदि का पूर्णतः लोप हो
जाएगा। वे (परम्परित) धर्म के विपरीत और विकर्म या नहीं करने योग्य कर्मों में
लिप्त रहेंगे और करपात्री या हथेली में लेकर अन्नाहार करने वाले होंगे।
दर्शनेऽपण्डिताश्चैव गमिष्यन्ति च नारकान्।
तेषां दत्तं च भुक्तं च भस्मीभवति काष्ठवत् ॥ ९॥
स्वाध्याये चैव सीदन्ति ब्राह्मणाः शौचवर्जिताः।
वेदविक्रयिणश्चैव लोभिनोऽस्थिरचेतसः ॥ १० ॥
उनके दर्शनशास्त्र का आधार नहीं, इस दृष्टि से वे अपण्डित होंगे और दुष्कर्मों से
नरकगामी होंगे क्योंकि उनके द्वारा दिया गया दान और उस दान का भोग करने वाले
सभी काष्ठ की राख के समान निष्फल होंगे। वे अपना प्रभाव इस कलिकाल में इतना

136 अपराजितपृच्छा
फैला देंगे कि उनसे प्रभावित होकर ब्राह्मण लोग भी शौचाचार त्याग देंगे और उनमें वेदों
का स्वाध्याय भी स्थगित हो जाएगा। यहाँ तक कि वे अपने पूर्वजों की परम्परा से प्राप्त
वेद ग्रन्थों तक को बेच देंगे। इतने लोभी हो जाएँगे कि अस्थिर चित रहने लगेंगे।
न स्निह्यन्ति पिता पुत्रा योषितो भ्रातरस्तथा।
न भृत्या नैव मित्राणि भविष्यन्ति न शान्तिदाः ॥ 11 ॥
धर्मो जितो ह्यधर्मेण सत्यं चैवानृतेन च।
जिताश्चौरैश्च राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः ॥ 12 ॥
वे इतने स्वार्थी हो जाएँगे कि पिता-पुत्र, नारियाँ, भाई-भाई, नौकर, मित्रगणों
आदि किसी में स्नेह सम्बन्ध नहीं रहेगा और पारस्परिक सम्बन्ध भी शान्ति देने
वाले नहीं होंगे।¹ इस मायामोह के अवतार के प्रभाव से धर्म को अधर्म जीत लेगा।
सत्य को झूठ पराजित कर डालेगा। चोर-तस्कर राजाओं को जीत लेंगे, स्त्रियाँ
पुरुषों को जीत लेंगी।
अथ युगवर्णनमाह —
सीदन्ति चाग्निहोत्राणि गुरुपूजा प्रणश्यति।
दशमे₁₀ द्वादशे₁₂ वर्षे नारी गर्भवती भवेत् ॥ 13 ॥
कन्याश्चैव प्रसूयन्ते तस्मिन्कलियुगे सदा।
सम्प्राप्ते षोडशे₁₆ वर्षे नरा गलितयौवनाः ॥ 14 ॥
(इसी प्रकार युग की दशा का वर्णन किया जा रहा है) कलिकाल के प्रभाव
से अग्निहोत्र की वैदिक परम्परा विनष्ट हो जाएगी। गुरुपूजा की आश्रमीय प्रणाली
नष्टभूत हो जाएगी और व्यभिचार, दुराचार इतना फैल जाएगा कि दस और बारह
वर्ष की कन्याएँ भी इसका शिकार होकर गर्भवती होने लगेंगी। फलतः इस
कलिकाल में ऐसी गर्भवती नारियाँ केवल कन्याओं को जन्म देने वाली होंगी और
सभी नर विषयासक्त होकर सोलह वर्ष की आयु तक आते-आते गलित-यौवन हो
जाएँगे अर्थात् वृद्ध-से प्रतीत होने लगेंगे।
अल्पोदकास्तथा मेघा अल्पशस्या तु मेदिनी।
अल्पक्षीरास्तथा गावः क्षीरे सर्पिर्न विद्यते ॥ 15 ॥

  1. महाभारत में आया है कि पुत्र पिता का और पिता पुत्र का वध करके भी उद्विग्न नहीं होंगे। अपनी प्रशंसा के
    लिए लोग बड़ी-बड़ी बातें बनाएँगे किन्तु समाज में उनकी निन्दा नहीं होगी। उस समय सारा जगत् म्लेच्छ
    हो जाएगा, इसमें संशय नहीं है। एक हाथ दूसरे हाथ को लूटेगा, सगा भाई भी भाई के धन को हड़प
    लेगा— पुत्रः पितृवधं कृत्वा पिता पुत्रवधं तथा। निरुद्वेगा बृहद्वादी न निन्दामुपलप्स्यते ॥ म्लेच्छीभूतं जगत्
    सर्वं भविष्यति न संशयः। हस्तो हस्तं परिमुषेद् युगान्ते समुपस्थिते ॥ (महा. वनपर्व 190, 28, 38)

सूत्र-१९ 137
एकवर्णीभविष्यन्ति वर्णाश्चत्वार एव च।
वर्णान्तराणि भिद्यन्ते यास्यन्ति प्रलयं प्रजाः ॥ 16 ॥
कलिकाल की इस दुराचार की विभीषिका के फलस्वरूप मेघों में पानी की
कमी से वर्षा कम हो जाएगी। वर्षा की कमी से धरती में अनाज की पैदावार घटेगी
और गायों के दूध भी कम हो जाएगा या सूख जाएगा तथा कुछ दूध गायों से प्राप्त
भी होगा तो उसमें घी नाम मात्र का भी नहीं रहेगा। समय इतना विकृत होगा कि
चारों वर्गों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) का लोप हो जाएगा और सभी लोग
एकवर्णी हो जाएँगे तथा एक दूसरे वर्ण आपस में अन्तर्वर्णी सम्बन्ध स्थापित करके
वर्णसङ्करी हो जाएँगे। इस प्रकार से प्रजा प्रलय को प्राप्त हो जाएगी।
दुर्भिक्षाणि भविष्यन्ति राज्ञां दुर्द्यचेतसाम्।
वर्णान्तर वि राज्ञां ते विदुर्दुर्गे शून्यचेतसा ? ॥ 17 ॥
अधर्मीभवत् समस्तं दयाधर्मविवर्जितम्।
कीर्तितो बुद्धावतारः कलौ च नवमो हरिः ॥ 18 ॥
ऐसा समय भी आ जाएगा कि दुर्भिक्ष, अकाल पड़ते रहेंगे, राजा लोग भी
दुर्दान्त और दुष्टचित्त वाले हो जाएँगे और राजा कई वर्णान्तरों के होने लगेंगे। विद्वान
वर्गों में भी चेतना शून्यता इतनी बढ़ जाएगी कि वे भी अपना कर्तव्य भूल जाएँगे।
सभी अधर्मी हो जाएँगे और दयाधर्म रहित हो जाएँगे। इस प्रकार की स्थिति इस
कलिकाल में बुद्धावतार के रूप में आने वाले नवें विष्णु अवतार के बाद की होगी।
अथ कल्कि अवतारवर्णनं —
ततः कलियुगान्ते चोत्पत्स्यति दशमो हरिः।
ब्राह्मणो हरिपिङ्गलः याज्ञवल्क्यपुरोहितः ॥ 19 ॥
ततो हरिः कलेरन्ते दशमः सम्भविष्यति।
कुम्भलग्नभवो देवो ह्यश्वारूढो जगत्पतिः ॥ 20 ॥
म्लेच्छानां छेदनं कृत्वा यजेद् देवं सुवर्णकम्।
एकच्छत्रं धराराज्यं लक्ष्म्याः कृतयुगे पुरा ॥ 21 ॥
ऐसे में दसवें अवतार के रूप में कलियुग के अन्त में विष्णु हरिपिङ्गल नामक
याज्ञवल्क्य पुरोहित ब्राह्मण के घर जन्म लेंगे। वह कलियुग के अन्त में जन्म लेने
वाले दशमें हरि होंगे जो कुम्भ लग्नोदय की वेला में अश्वारूढ़ होकर सारे जगत के
पति होंगे। वे म्लेच्छों का नाश करके सुवर्णक देव की यज्ञ, पूजा प्रचलित करेंगे
और इस पृथ्वी पर पुनः एकच्छत्र शासन की स्थापना करेंगे तथा पहले के सतयुग
जैसी लक्ष्मी का पुनः प्रसार करेंगे।

138 अपराजितपृच्छा
वैष्णवावतारकीर्तन फलमाह —
इदं जन्मरहस्यं तु कीर्तयिष्यन्ति ये नरः ।
सुलभश्च हरिस्तेषां नित्यं वै सर्वजन्मसु ॥ २२ ॥
ॐ नमो वासुदेवाय नमो नारायणाय च ।
नमः कृष्णायेतिमन्त्राः सर्वप्रापप्रणाशनाः ॥ २३ ॥
हरि के इस प्रकार के जन्म रहस्य को जो लोग गाते रहेंगे, उनको सभी जन्मों
में भगवान् विष्णु सदा सुलभ होंगे। उन हरि को कीर्तन द्वारा पाने का उपाय 'ॐ
नमो वासुदेवाय', 'ॐ नमो नारायणाय', 'ॐ नमः कृष्णाय' आदि मन्त्र हैं जो
समस्त पापों का प्रणाशन करने वाले, शमन करने वाले हैं।
शृणोति जन्मरहस्यं ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।
स्त्रीबालघातकश्चैव सुरापो वृषलीपतिः ॥ २४ ॥
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।
यः पठेत् परया भक्त्या विष्णुजन्मप्रकीर्तितम् ॥ २५ ॥
मर्त्यलोकपरिभ्रष्टो विष्णुलोकं स गच्छति।
ईप्सितं लभते राज्यं स्वर्गे वा भूमिशासने ॥ २६ ॥
गतागता निवर्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः ।
अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः ॥ २७ ॥
श्री हरि के इस जन्म रहस्य को भी सुनते रहेंगे, वे ब्रह्मघाती या गुरुतल्पगामी
पापी स्त्रीघाती, बालघाती, सुरापान करने वाला और कुलटा स्त्री के पति भी क्यों न
हो, सभी पापों से मुक्त होकर वे विष्णुलोक में जाएँगे। अतः जो भी परम्
भक्तिपूर्वक इस विष्णु जन्म की कथा को पढ़ेगा, वह मर्त्यलोक में परिभ्रष्ट होने पर
भी विष्णुलोक में ले जाने का अधिकारी हो जाएगा एवं पुनर्जन्म लेने पर वह अपनी
इच्छानुसार चाहा हुआ भूमिशासन या स्वर्ग का राज्य प्राप्त करेगा। इस द्वादशाक्षर
मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का जाप करने वाले को कोई ग्रहबाधा नहीं
पहुँचा सकते, सूर्य-चन्द्रमा आदि ग्रहों की पूरी दशाएँ भी आई-गई हो जाती हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
विष्णोर्जन्मरहस्यदशावताराधिकारो नाम नवविंशं सूत्रम् ॥ २९ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विष्णु के
जन्म रहस्य, दशावताराधिकार नामक उनतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥

सूत्र-३० 139
विष्णुवाक्योद्भवारण्ये श्रीसोमेश्वरनिर्णयो नाम त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३० ॥
विश्वकर्मोवाच -
अथातोऽनन्तरं तत्र पर्वते गन्धमादने।
आगतश्च स्वयं विष्णुर्जगदाह्लादकारकः ॥ १॥
उद्धृत्याम्ब्वर्थपात्रं तु त्वष्ट्राद्यैर्मुनिसत्तमैः।
सुरासुरैः समस्तैश्च स्तूयमानं जगत्पतिम् ॥ २॥
स्थित्वासने महोत्सवे सिंहरूपायदलङ्कृते।
प्रहृष्टं च जगन्नाथं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ३॥
विश्वकर्मा बोले - इसके बाद, गन्धमादन पर्वत पर जगत को प्रसन्न कर देने
वाले भगवान् विष्णु स्वयं पधार गए और त्वष्टादि मुनि सत्तमों ने अपने कमण्डलों को
हाथ में उठाकर और सभी सुरों व असुरों ने जगत्पति भगवान् विष्णु की स्तुति करने
लगे। भगवान् जगन्नाथ को शङ्ख-चक्र-गदादि धारण किए हुए प्रसन्न मुद्रा में सिंह की
आकृतियों से अलङ्कृत सिंहासन पर विराजमान करते हुए बड़ा महोत्सव मनाया।
त्वष्टाद्याश्च मुनीन्द्राश्च हरिपाश्र्वे तु संस्थिताः।
सिंहासने निविष्टं तमादितेजोभवं प्रभुम् ॥ ४॥
‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’
‘ॐ नमो नारायणाय ।’
‘ॐ नमः कृष्णाय’ इति
मूलमन्त्राः सर्वपापप्रणाशनाः ॥ तानुच्चार्य ॥
इसमें त्वष्टादि समस्त मुनिगण भगवान् विष्णु के पास में खड़े हो गए और उन
आदि तेजोभव प्रभु को सिंहासन पर निविष्ट करके, आसीन करके ‘ॐ नमो भगवते
वासुदेवाय’, ‘ॐ नमो नारायणाय’, ‘ॐ नमः कृष्णाय’ इत्यादि मूल मन्त्रों का
उच्चारण आरम्भ किया जो सर्व पापों का नाश करने वाला है।
दण्डवत् प्रणतो भूत्वा पृच्छति त्वपराजितः।
दशावताराः श्रीविष्णोः कथिता विश्वकर्मणा ॥ ५॥
त्वष्टा चैव कथं देव कथं तस्य समुद्भवः।
कस्मिन्कालेवतारश्च कथयस्व जगत्पते ॥ ६॥
इसी बीच विश्वकर्मा ने दशावतार ग्रहण करने वाले भगवान् विष्णु की ओर
सम्मुख हुए कहा कि दण्डवत प्रणाम करके अपराजित यह पूछता है कि हे

140 अपराजितपृच्छा
जगतपते ! त्वष्टा$^1$ कौन देवता है और उनका समुद्भव कैसे हुआ तथा उनका अवतार
किस समय हुआ, यह कृपा कर कहिए।
विष्णुरुवाच —
सरस्वत्यर्णवाभ्यां च पुण्यप्रभास आश्रमः।
प्रयतात्मा महातीर्थं गत्वा तु हरजन्मदम्॥ ७॥
दृष्ट्वा तु हरते पापं स्नात्वा देवत्वदायकम्।
समागतः सोमराजो दृष्ट्वाश्रममथोत्तमम्॥ ८॥
(विश्वकर्मा के प्रश्न पर) भगवान् विष्णु कहने लगे— सरस्वती सागर$^2$ के पास
प्रभास आश्रम का पुण्यक्षेत्र है। कोई यदि प्रयत्न करके उस महातीर्थ को जाए तो

  1. यहाँ त्वष्टा के सम्बन्ध में पूछा तो गया है किन्तु इस सूत्र में वर्णन नहीं है। द्राविड़ वास्तुग्रन्थ 'मानसार'
    में आया है कि ब्रह्मादि के समान विश्वकर्मा चार मुख वाले हैं। चारों मुखों में से पूर्वमुख विश्वभू
    कहलाता है। दक्षिणमुख विश्वविद कहलाता है। उत्तरमुख विश्वस्थ कहलाता है जबकि पश्चिम मुख
    विश्वसृष्टा कहलाता है। इन्हीं चारों मुख से पहले चार विश्वकर्मा हुए। पूर्वी मुख के विश्वकर्मा, दक्षिण से
    मय, उत्तर से त्वष्टा तथा पश्चिमी मुख से मनु हुए। विश्वकर्मा का विवाह इन्द्र की पुत्री से, मय का
    विवाह सुरेन्द्र की पुत्री, त्वष्टा का विवाह वैश्रवण की पुत्री और मनु का विवाह नल की पुत्री से हुआ।
    विश्वकर्मा के पुत्र स्थपति कहलाए। मय के पुत्र सूत्रग्राही, त्वष्टा के पुत्र वर्धकी और मनु के पुत्र तक्षक
    कहलाए। ये ही आदि स्थपति है— विश्वकर्मा चतुर्वर्णजाति ब्रह्मादिवर्णवत्। पूर्वोक्तवर्णं चत्वारि नामं
    वक्ष्ये पृथक् पृथक्॥ विश्वभूरिति नामैतत्पूर्ववक्त्रं प्रकीर्तितम्। दक्षिणे विश्वविद्वक्त्रं विश्वस्थश्च तथोत्तरे॥
    पश्चिमे विश्वस्रष्ट्राख्यं वक्त्रमेवं चतुर्विधम्। एतेभ्यः प्रथमो जातो विश्वकर्मा चतुष्टयः॥ पूर्वानने विश्वकर्मा
    जायते दक्षिणे मयः। उत्तरस्य मुखे त्वष्टा पश्चिमे तु मनुः स्मृतः॥ उपयेमे विश्वकर्मा इन्द्रस्य तनयां तदा।
    मयः सुरेन्द्रतनयामुपयेमे त्वनन्तरम्॥ त्वष्टा वैश्रवणसुतामुपयेमे त्वनन्तरम्। मनुर्नलस्य तनयामुपयेमे तु
    तुर्यकम्॥ विश्वकर्माख्यनाम्नोस्य पुत्रः स्थपतिरुच्यते। मयस्य तनयः सूत्रग्राहीति परिकीर्तितः॥ त्वष्टुर्देव-
    ऋषिः पुत्रो वर्धकीति प्रकथ्यते। मनोः पुत्रस्तक्षकः स्यात्स्थपत्यादि चतुष्टयमये॥ (मानसार 1, 3-10)
    मानसार के तहत वास्तुशास्त्र प्रणेताओं में भी त्वष्टा का नामोल्लेख हुआ है— अगस्त्यः काश्यपश्चैव
    भृगुर्गौतमभार्गवाः॥ गालव इति ऋषयः प्रोक्ताः कर्षणायर्चनार्थकम्। तत्तत्तन्त्रवशात्सर्वं कुर्यात् षट्
    सम्पादस्पदम्॥ तत्तत्तन्त्रविपरीतं चेद् विपत्यं नित्यमावहेत्। अनुक्तं तत्र तन्त्रैस्तु ग्राह्यं दोषो न विद्यते॥
    विश्वकर्मा च विश्वेश्र विश्वसारं प्रबोधकः। वृतश्चैव मयश्चैव त्वष्टा चैव मनुर्नलः॥ मानविन्मानकल्पश्च
    मानसारो बहुश्रुतः। प्रष्टा च मानबोधश्च विश्वबोधो नायकश्च तथा॥ (तत्रैव 1, 2-6)
  2. गुजरात में राजा सिद्धराज के समय में सरस्वतीपुराण का प्रणयन माना जाता है। इसमें सरस्वती के क्षेत्र
    में नाग जाति के बसी होने का विशेष विवरण मिलता है। यथा— एष उखर संगृह्य अन्धकूपान्महामनः।
    नागलोके स्वयं गत्वा नागान् सञ्जीवयिष्यति॥ (सरस्वती. अध्याय 15) स्कन्दपुराण के नागरखण्ड में
    चमत्कारपुर के पास सारस्वतह्रद का वर्णन है जहाँ स्नान के लिए आने वाले विप्रों को नागजन त्रास देते
    रहते थे। (स्कन्द. नागर. 114, 17-18-83) इसी प्रकार प्रभासक्षेत्र माहात्म्य में आया है— सरस्वत्यां
    ब्रह्मकुण्डेऽसंख्याता मुनयः स्मृताः। दशार्बुदसहस्राणि कोटित्रितयमेव च॥ ऋषयस्तत्र तिष्ठन्ति यत्र प्राची
    सरस्वती। ब्रह्महत्या गता यत्र शङ्करस्य च तत्क्षणात्॥ कायः सुवर्णतां प्रापं कपालं पतितं करात्। ज्ञात्वैवं

सूत्र ३०
141

हर, महादेव उसे नया जन्म प्रदान कर देते हैं। उस देवत्वदायक तीर्थ में स्नान करते
ही और उसे देखने मात्र से समस्त पाप दूर हो जाते हैं। उस सर्वोत्तम आश्रम के
अवलोकन मात्र से सोमराजा तुरन्त प्रकट हो गए।
अथाश्रमवर्णनमाह—
विविधैर्वनजैः कीर्ण तथा पुष्पैः समाकुलम्।
सुरभितामृतोपेतं नानाफलैश्च सङ्कुलम्॥ ९॥
पारिजातप्रभृतिभिः कङ्कोलैश्चैव पादपैः।
देवदारुभिराकीर्णं तथा वै रक्तचन्दनैः॥ १०॥
तालतमालाशोकैश्च रम्भाप्रियङ्गुचम्पकैः।
पुन्नागनागबकुलैः पाटलैर्बिल्वचन्दनैः॥ ११॥
जातीतगुरुकुमुदानेकपुष्पैः सुपुष्पितम्।
विविधैश्च तथा वृक्षैः शोभितं दिव्यमाश्रमम्॥ १२॥
वहाँ विविध प्रकार के वन पुष्पों के समूह थे जिनसे वह स्थान अमृत के
समान सुरभित हो रहा था और वहाँ नाना प्रकार के फलों की भरमार थी।
पारिजातादि स्वर्ग के वृक्ष और कङ्कोल के पौधे व देवदारु व रक्तचन्दन के पेड़ों से
लकदक वह क्षेत्र ताल, तमाल, अशोक, रम्भा, केल, प्रियङ्गु, चम्पक, पुन्नाग, नाग,
बकुल, पाटल (गुलाब) और बिल्व व चन्दन, जाती, तगर, कुमुद आदि अनेक
प्रकार के पुष्पों से सुपुष्पित विविध वृक्षावलियों से वह दिव्य आश्रम सुशोभित था।
विचित्रं हेमरचितं निर्मलं कुमुदेशवत्।
विपुलजलं- ? स्फटिकशङ्खवेदी ? ॥ १३॥
तरङ्गभङ्गुरावर्तमुग्रं मीनैरनेकशः।
शिशुमारैश्च नक्रैश्चाऽनन्तं दुर्गं शुक्त्यादिभिः॥ १४॥
योजनायुतविस्तीर्णं भीषणीयं ग्रहाकुलैः।
भयावहं च गहनं गम्भीरावर्तव्याकुलम्॥ १५॥
इमं समुद्रतीरस्थं माहेन्द्रं विन्ध्यगामिनम्?।
रम्याश्रमं प्रभासस्य प्रविष्टस्तारकाधिपः॥ १६॥
इसी प्रकार वहाँ विचित्र रूप से स्वर्ण से बनी हुई, शुद्ध विशाल कमल के


शङ्खिना पूर्वं कृतं तत्र महातपः॥ तुष्टः श्रीशङ्करो देवो लिङ्ग वासवरेण तु। कोटियज्ञफलं स्नाने प्राच्यां
लिङ्गस्य पूजन॥ (स्कन्द. प्रभास. 5, 22-25)

142 अपराजितपृच्छा
समान अर्थात् कमल दलों में राजा की तरह शोभित, विपुल जलराशि से पूर्व सरोवर
में स्फटिक से शङ्ख की रचना जैसी वेदी बनी हुई थी। उस सरोवर में अनेकों
मछलियाँ आतुरता से तैरती हुई उग्र तरङ्गों की चक्रियाँ बना रही थीं और उस
सरोवर में अनेक शिशुमार (जलमानुष, एक प्रकार का मत्स्य), मगर, और बड़े
सीप आदि भी थे। यह सरोवर एक युत (अरब) योजन विस्तार वाला और भीषण,
भयङ्कर ग्राहादि जल-जन्तुओं से भरा हुआ, बहुत गहरा और बड़ी-बड़ी विशाल
लहरों के भँवरों से उद्वेलित था। इस समुद्र के किनारे विन्ध्याचल पर्वत पर बने
सुन्दर आश्रम में तारकाधिप महेन्द्र प्रभास प्रविष्ट हुए।
प्रणिपत्य तदा देवं प्रभासं भुक्तिमाप्नुयात्।
अस्माकमीश्वरं भक्त्या राधयामि च संयतः ॥ 17 ॥
तदाज्ञया चाश्रमेऽस्मिन् निष्ठाराध्यमहेश्वरम् ।
तदा लब्ध्वाश्रमं श्रेष्ठं दत्तं प्रभासतुष्टिदम् ॥ 18 ॥
(प्रभास ने) वहाँ प्रणाम किया। इस पर वहां के (महेश्वर) देव ने प्रभास को
भुक्ति-मुक्ति प्रदान की। प्रभास ने कहा कि 'आप मेरे ईश्वर हैं और मैं आपकी संयत
चित्त से भक्तिपूर्वक आराधना करता हूँ।' 'इस आश्रम में स्थित महेश्वर की
निष्ठापूर्वक आराधना करो'— ऐसी आज्ञा के साथ ही यह श्रेष्ठ आश्रम प्रभास को
प्रदान किया जिसे पाकर उसे परम शान्ति हुई।
मन्वन्तरं शतं सार्धं सोमोऽकार्षीत् तपो नृपः ।
तोषयित्वा महादेवं प्रत्यक्षं शिवसम्भवम् ॥ 19 ॥
आह्लादितमना भूत्वा दृष्ट्वा च परमेश्वरम् ।
राजेन्द्र क्षिति कृत्वा तु निश्चलं देवसम्भवम् ? ॥ 20 ॥
इस आश्रम में एक सौ पचास मन्वन्तरों तक सोम राजा ने बड़ा ही कठोर तप
किया जिससे उसने महादेव शिव को तप द्वारा सन्तुष्ट करके उनका प्रत्यक्ष दर्शन
प्राप्त किया। महादेव शिव स्वयं उस राजा के सामने प्रकट हुए। भगवान् महादेव
शिव परमेश्वर को देखकर बड़े ही प्रसन्न मन वाला होकर उस राजेन्द्र सोम ने इस
पृथ्वी पर भगवान् शिव के प्राकट्य को निश्चल (प्रतिमा रूप में साकार, स्थापित)
किया।
ईश्वर उवाच —
तुष्टो ऽहं तव राजेन्द्र भक्त्या च परया त्वयि ।
वरं ब्रूहि च दास्यामि यथेच्छं तारकाधिप ॥ 21 ॥

सूत्र-३० 143
धर्मार्थकाममोक्षाणां ददामि यत्त्वदीप्सितम्।
नासत्यं नान्यथा चैवं त्वद्भक्त्या रोहिणीपते ॥ 22 ॥
(इस पर) ईश्वर बोले— हे तारकाधिप सोमराज! मैं तुम्हारी पराभक्ति से परम
तुष्ट हुआ हूँ अतः तुम कोई वर माँगो क्योंकि मैं तुम्हें यथेच्छ वर देना चाहता हूँ। हे
रोहिणीपति सोम, चन्द्रराजा तुम्हारी पर भक्ति के फलस्वरूप जिस तुम्हारे चाहे हुए
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कराने वाला वर मैं तुम्हें दे रहा हूँ, वह कभी
भी असत्य नहीं होगा न ही किसी तरह अन्यथा होगा।¹
चन्द्र उवाच —
अस्माकमात्मनः पार्श्वे मानसाङ्गं सुधार्यकम् ? ।
ममाभिधानतश्चैवाऽवतारस्तव साम्प्रतम् ॥ 23 ॥
(वर माँगते समय) चन्द्र बोले— हे प्रभु! मैं तो यह वर माँगता हूँ कि आप
मेरे आत्मा के पास मानस अङ्ग धारण करके मेरे गात्र को ही अपना स्थान बनाते
हुए तुरन्त अवतरित हों।
देव्युवाच —
शशाङ्क देवदेवेश तिलकत्ववाप्नुहि।
अथातस्त्वं तत्तिलके तथा तिष्ठ मम प्रिय ॥ 24 ॥
(इस बीच पार्वती) देवी बोली— हे शशाङ्क! मैं तुम्हारे मस्तक पर देवदेवेश
महादेव शिव का तिलक लगा देती हूँ जिससे ज्योंहि यह तिलक तुम्हारे मस्तक पर
लगेगा, त्योंहि मेरे प्रिय स्वामी महादेव शिव तुम्हारे तिलक में स्थित हो जाएँगे।
ईश्वर उवाच —
त्वयेप्सितं वरं यच्च प्रयच्छामि हितैषिणे।
इच्छयात्ममुखनैवाऽसारसंसारमोक्षदम् ॥ 25 ॥
निश्चितात्मसुखैरेवं शान्तावस्था मुखबोधिनी ? ।
स्वप्रावस्थायां न सौख्यमात्मनो राहिणीपतेः ॥ 26 ॥
स्वप्रावस्थो यदा दृष्टो भस्मोद्धूलिततापसः।
स्कन्धारुह्य हतं चौरै ? अस्मत्त्वयि विनिवेदयेत् ? ॥ 27 ॥

  1. आद्य जगद्गुरु शङ्कराचार्य ने सोमनाथ की आराधना इस प्रकार की है— सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये
    ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावंतसम्। भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्यते ॥
    (द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्र)

144 अपराजितपृच्छा
ईश्वर ने कहा कि तुम्हारे माँगे हुए जिस वरदान को मैं हित भावना से दे रहा
हूँ, वह इस असार संसार से मुक्ति दिलाने वाला है। मेरे मुख से जो यह ज्ञान तुम्हें
मिला है, यह निश्चित ही आत्मसुख एवं शान्तावस्था और हे रोहिणीपति सोम!
तुम्हारी आत्मा को भी सुख देने वाला है परन्तु तुम्हारी स्वप्नावस्था में नहीं, जागृत
रहने पर ही यह सम्भव है। यदि स्वप्नावस्था में तुम्हें भस्म-धूलि लगाए हुए कोई
तपस्वी दिखाई पड़ जाए जो किसी मारे गए चोर को अपने कन्धे पर उठाए हुए हो
और अपने बारे में तुम्हें ऐसा कहे कि-
तापस उवाच -
अहं सोम जगत्कर्ता वैरं स्यात्तु लङ्काधिपे।
त्वद्भक्तयाऽऽगतोऽहं वत्स चन्द्रनामाऽवतारतः ॥ २८ ॥
योगावस्थास्थितस्वेवं चिन्तात्मा रोहिणीपते।
उदकोल्लङ्घनं कृत्वा ऐन्द्रीं गतो दिशां प्रति ॥ २९ ॥
(उक्त तापस कहे कि) - हे सोम! मैं ही इस जगत का कर्ता भगवान् विष्णु हूँ
जिसका लङ्काधिपति रावण से वैर हो गया था वही मैं तुम्हारी भक्ति से हे वत्स!
चन्द्र नामावतार से आ गया हूँ। हे रोहिणीपति! इस प्रकार की योग स्थिति में
चिन्तात्मा होकर समुद्र को लाङ्घकर मैं, पूर्वदिशा की ओर गया।
कैलासाल्लिङ्गमानीय दानवेन्द्रो लङ्काधिपः।
आगमिष्यामि ? क्षेत्रैषु तस्य वाचा प्रबलोद्भवम् ? ॥ ३० ॥
ददामि ते त्वहं सोम सोमे वदति दुर्धरः।
क्षणार्धं तु धृतं विप्र यदाहं भो क्षितौ ततः ? ॥ ३१ ॥
गृहीत्वा सोमराजेन्द्रो लङ्कावधि वनैः स्थित ?।
उक्तं लिङ्गं तु राजेन्द्र क्षितौ भूत्वा तु निश्चलम् ? ॥ ३२ ॥
वह दानवेन्द्र लङ्कापति रावण कैलाश पर्वत से शिवलिङ्ग लाकर समस्त क्षेत्र में
उसकी प्रबल वाचा का उद्घोष करेगा कि मैं आ गया हूँ। हे सोम! वही शिवलिङ्ग
मैं तुम्हें देता हूँ और वह सोम को बड़े ही भयानक उद्धत ढंग से कहता है कि हे
विप्र! थोड़ी देर के लिए इस शिवलिङ्ग को थामे रहो जब तक कि मैं पृथ्वी पर
खड़ा रहूँ। उसे ग्रहण करके सोम राजेन्द्र तब तक ठहरा रहा जब तक लङ्काधिपति
रावण उस वन में स्थिर रहा और उसके आने की अवधि तक प्रतीक्षारत रहा परन्तु
जब रावण बड़ी अवधि तक नहीं आया तो शिवलिङ्ग को सोम राजेन्द्र ने धरती पर
रख दिया और निश्चल अर्थात् वहीं पर प्रतिष्ठित कर दिया।

सूत्र-३० 145
पूजितं लिङ्गराजेन्द्रं लङ्कावधि स्वस्थचेतसा ? ।
सोमाभिधानदेवत्वं सोमनाथ इति श्रुतम् ॥ ३३ ॥
शशाङ्कं मुकुटे धृत्वा तन्नाम शशिभूषणः ।
ईश्वरः सोमनाथाख्योऽवतरितः सोमेश्वरः ॥ ३४ ॥
जब तक लङ्काधिपति रावण के आने की अवधि हो, तब तक उसकी प्रतीक्षा
में वह सोमराजा बड़े स्वस्थचित्त से उस शिवलिङ्ग राज की पूजा में रहे। इसलिए
सोमराज राजा के द्वारा पूजित होने के कारण शिव वहाँ सोमाभिधान देवत्व के रूप
में सोमनाथ नाम से विख्यात् हुए। इस प्रकार चन्द्रमा को अपने मुकुट में धारण
करके और उसके ही नाम से शशिभूषण अर्थात् सोमनाथ नाम धरकर स्वयं ईश्वर
शिव ही सोमनाथ कहलाकर सोमेश्वर के रूप में अवतरित हुए हैं।
तदा सुरतरोर्वत्स प्रभासे भक्तिस्वागतः ।
जगन्नाथः सोमनाथस्त्रैलोक्ये चाऽपि दुर्लभः ॥ ३५ ॥
आरामनगरे रम्ये जगदाह्लादकारकः ।
जगन्नाथः सोमनाथस्त्रैलोक्ये चाऽपि दुर्लभः ॥ ३६ ॥
तब से ही हे वत्स! यह सुरतर देव प्रभास क्षेत्र में भक्ति के स्वागत से जगन्नाथ
सोमनाथ से आए हैं जो तीनों ही लोकों में दुर्लभ है। अस्तु, यह सदा ध्यान में
रखना चाहिए, बाग-बगीचों में, सुन्दर नगरों में ऐसे जगत को आनन्द प्रदान करने
वाले जगन्नाथ सोमनाथ तीनों लोकों में भी दुर्लभ हैं।
नाम्ना कैलासनगरे सोमनाथो महेश्वरः ।
संसारतारणो देवः संसारपाशछेदनः ॥ ३७ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां वाञ्छितार्थफलप्रदम् ।
सर्वतीर्थ महोत्साहं स्वर्गादिभोगभुक्तिदम् ॥ ३८ ॥
कैलास नामक नगर में भी सोमनाथ नाम के महेश्वर देव हैं जो कि संसार से
तारण करवाकर संसार में पुनरागमन के पाश को ही काट देते हैं। ये सोमनाथ धर्म,
अर्थ, काम और मोक्ष के वाञ्छित फल के दाता हैं और समस्त तीर्थों में सबसे
महान और स्वर्गादिक भोग और मुक्ति प्रदाता है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
विष्णुवाक्योद्धवारण्ये श्रीसोमेश्वरनिर्णयाधिकारो नाम त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३० ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विष्णु वाक्यानुसार
अरण्य में उद्धूत श्रीसोमेश्वर निर्णय अधिकार नामक उनतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥

146 अपराजितपृच्छा
विष्णुवाक्योद्भवसोमनाथोक्तद्वादशशिवरात्रिं
निर्णयो नामैकत्रिंशं सूत्रम् ॥ ३१ ॥
विष्णुरुवाच —
ततश्चानन्तरं वत्स प्रभासे भुक्तिमुक्तिदे।
कृत्वा सोमेश्वरे भक्तिं पूजा स्यात्तु महोत्सवः ॥ १ ॥
चन्दनागुरुकङ्कोलकर्पूरैः कुङ्कुमादिकैः ।
पञ्चामृतादिस्नानैश्च धूपाद्यैश्च सुगन्धिभिः ॥ २ ॥
मन्त्रस्तोत्रगीतवाद्यैर्नृत्यैश्च सुरयोषिताम् ।
इन्द्राद्याश्च सुराः सर्वे ब्रह्माद्याश्च मुनीश्वरः ॥ ३ ॥
विष्णुश्च भगवान् देवो मरीचिः काश्यपो गणाः ।
सूर्याद्याश्च ग्रहाश्चैव तथा चैवं गणोत्तमाः ॥ ४ ॥
अष्टौ च वसवः सिद्धा वासुक्याद्याश्च पन्नगाः ।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पार्थिवाश्चैव भूतले ॥ ५ ॥
पातालस्वः सप्तके च पृथिव्यां सप्तकं तथा ।
आनीताश्च त्रयो लोकाः सुरासुरनरोरगैः ॥ ६ ॥
प्रभासेन कृता पूजा देवदेवजगद्गुरोः ।
तुष्टः प्रभासं देवेशः पुत्रत्वं समुपागमत् ॥ ७ ॥
विष्णु बोले — हे वत्स! इसके उपरान्त ही भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने वाले
प्रभास क्षेत्र में भगवान् सोमेश्वर की भक्तिपूर्वक पूजा करके महोत्सव होने लगे।
चन्दन, अगरु, कङ्कोल, कर्पूर, कुङ्कुम और पञ्चामृत आदि से स्नान, धूप, सुगन्धित
द्रव्यों से, मन्त्र-स्तोत्र, गीत-वाद्य-नृत्यों से देवाङ्गनाएँ और इन्द्रादि देवगण, ब्रह्मादि
मुनीश्वर, भगवान् विष्णु देव, मरीचि, काश्यप गण, सूर्यादि सभी ग्रह और ऐसे ही
अनेक उत्तम गणों और आठों वसु, सिद्धगण, वासुकि आदि समस्त नाग पृथ्वी पर
जितने भी तीर्थ क्षेत्र और भूतल पर जितने भी राजा, सातों पातालों, सातों पृथ्वी
मण्डलों और तीनों लोकों के सुर-असुर-नर और नागों को निमन्त्रित करके प्रभास
क्षेत्रवासियों ने देव देव जगद्गुरु महेश्वर की पूजा की जिससे सन्तुष्ट होकर देवेश
भगवान् शिव महेश्वर ने प्रभास को पुत्रत्व प्रदान किया।
वाचस्पतेर्भागिनेयं वसुहृन्नन्द्रदायकम्।
प्रोवाच वचनं पुत्र एकादश ममांशकाः ॥ ८ ॥

सूत्र-३१ 147
सोमनाथः प्रभासश्च कर्दमः शशिभूषणः।
निष्कदाख्यः सहस्राक्ष ऋणमुक्तिः पापान्तकः ॥ ९ ॥
अर्कस्थाल्यमनार्कस्वरं ? तवपुत्रा एकादश ।
एकादशैते रुद्राक्ष प्रभासक्षेत्रसम्भवाः ॥ १० ॥
इस प्रकार बृहस्पति के भानजे और वसु के हृदय को आनन्द देने वाले उनके
पुत्र प्रभास को भगवान् शिव महेश्वर ने वचन दिया कि तुम्हारे ग्यारह पुत्र होंगे जो
मेरे ही अंशरूप होंगे। इनके नाम होंगे— 1. सोमनाथ, 2. प्रभास, 3. कर्दम, 4.
शशिभूषण, 5. निष्कद, 6. सहस्राक्ष, 7. ऋणमुक्ति, 8. पापान्तक, 9. अर्कस्थाली,
10. अनार्क और 11. स्वर। ये तुम्हारे ग्यारह पुत्र कहलाएँगे। ये सभी प्रभास क्षेत्र में
उत्पन्न एकादश रुद्रों के ही समान समझें।¹
विश्वकृद् विश्वकर्मा च त्वष्टा स्याद् देववर्धकः।
भूर्भुवर्भुवनेशश्च तथा भुवनदेवकः ॥ ११ ॥
पुनरुच्चार्य नामानि विश्वेशः त्रिदशेश्वरः।
विश्वश्च विश्वनिरतस्स्वयं च सृष्टिकोद्भवः ॥ १२ ॥
नासत्यावश्विनौ दस्रौ प्रोक्तौ देवचिकित्सकौ ।
जगत्कर्ता च रुद्रश्च प्रभासो वसुनन्दनः ॥ १३ ॥
सृष्टा च सर्वशिल्पानां जगन्नेत्रस्तदुद्भवः।
चतुर्दश्यां समुत्पन्नः स्त्रष्टा विश्वपतिस्तथा ॥ १४ ॥
कार्तिक्यां कृष्णपक्षे तु दीपोत्सवसमुद्भवः।
महोत्सवास्तथा पञ्च तृतीयो ²यावतीदिनी ॥ १५ ॥
स्वयं साक्षाद् रुद्रमूर्तिर्विश्वकृद् विश्वशेखरः।
विश्वकृद्, विश्वकर्मा, त्वष्टा, देववर्धकी, भूर्भुवः भुवनदेव, भुवनदेवक— इन
नामों को पुनः कहते हुए विश्वेश, त्रिदशेश्वर, विश्व, विश्वनिरत और सृष्टिकोद्भव,
नासत्य, अश्विनी, दस्र, देव चिकित्सक, जगतकर्ता, रुद्र, प्रभाव, वसुनन्दन, सृष्टा और
सभी शिल्पियों के जगतनेत्र³ स्वरूप आपकी उत्पत्ति चतुर्दशी को हुई। कार्तिकमास में

  1. इन्हीं से सोमपुरा शिल्पियों की एकादश गोत्रों का प्रवर्तन माना जाता है।
  2. 'यावनोदिनी ?' प्रकाशित पाठः। शब्दकल्पद्रुम में 'यावतिथः' शब्द के लिए कहा है— यावत्+ तस्य
    पूरणे डट्। ऐसे में मनुस्मृति का यह वचन प्रमाण है— आद्याद्यस्य गुणांस्त्वेषामाप्नोति परःपरः। योयो
    यावतिथश्चैषां सस तावद्गुणः स्मृतः ॥ (मनु. 1, 20)
  3. ये विश्वकर्मा के नाम हैं। विश्वकर्मापुराण में विश्वकर्मा के सौ नामों की सूची है। यह यहाँ प्रासङ्गिक ही

148 अपराजितपृच्छा
कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को उत्पत्ति हुई तब हे विश्वपति ! दीपोत्सव मनाया गया और
अन्य महोत्सव रूप में पाँच तृतीया भी अगली तिथि (के पूर्ण अथवा उदयव्यापिनी)
सहित मानी गई है। आप स्वयं साक्षात् रुद्रमूर्ति विश्वकृत और विश्वशेखर है।
विश्वकर्मोवाच —
दीपोत्सवः कथं देव किमर्थश्च तदुद्भवः।
सुरोरगासुरनराः कुर्वन्ति कथमुत्सवम्॥ 16 ॥
विश्वकर्मा बोले — हे प्रभु ! दीपोत्सव क्या है और इसका प्रचलन किसलिए
है? देवता, नाग, असुर और मानवगण यह उत्सव कैसे मनाते हैं, सो कहिये।
ईश्वर उवाच —
द्वादश₁₂ दीपोत्सवानां श्रेष्ठाः स्युः कार्त्तिकादितः।
शिवरात्रयो द्वादश व्रतानामुत्तमा मताः॥ 17 ॥
आद्या मार्गशिरे कृष्णचतुर्दश्यां तिथौ भवेत्।
त्रयोदश्यामेकभोजी ह्युपोष्या च चतुर्दशी॥ 18 ॥
स्नानं कृत्वा चोदकेन यस्तिष्ठेलिङ्गमाश्रितः।
दिनान्ते च निशाप्राप्तौ कुर्याद् वै दन्तधावनम्॥ 19 ॥
ईश्वर बोले — कार्त्तिकादित¹ या कार्तिक से आरम्भ होने वाले बारह (मासों
के) दीपोत्सव श्रेष्ठ है और बारह शिवरात्रियों को व्रतों के लिए उत्तम माना गया है।
होगी— अज, अतुल, अधिकर्मिक, अधिनायक, अधिष्ठाता, अधीश्वर, अभिधेय, अभिनन्द्य, अभिरक्षक,
अभ्युदयकारी, अमन्द, अर्चनीय, आढ्यङ्कुर, आदिकर, आदिकर, आनन्त्य, आनन्दन, आयःशूलिक,
आराधनीय, ईरेश, ईक्षक, ईश्वर, उच्छण्ड, उत्तमश्लोक, उत्पादक, उद्यमी, एकाक्षर, एकान्त, ऐकात्म्य,
ऐश्वर्यवन्त, ओजस्वी, औपमिक, क, कष्टक विशोधक, कल्याणक, कार्मुक, कालाध्यक्ष, कालक्ष,
कीर्तिकीय, कुशाग्रबुद्धि, कृतकार्य, कृताभरण, कृतायास, कृतधी, कृतप्रतिज्ञ, कृतलक्षण, कृतसङ्कल्प,
कृतहस्त, कृती, कृत्य, कृपालु, केवक, केलिमुख, कौतुकप्रिय, क्रतुप्रिय, क्रतुपति, क्रियापटु, क्वाचित्क,
क्षन्ता, क्षिप्रकारी, ख्यातिप्राप्त, गणितज्ञ, गण्डकघ्न, गमनीय, गुणी, चक्रवर्ती, चक्री, चक्षुर, चण्ड,
चण्डविक्रम, चारक, चित्रकार, चिन्मय, छत्वरक, जगतीश्वर, जगत्स्त्रष्टा, जनाश्रय, जागरूक, जिष्णु,
तक्षक, तितिक्षु, तक्षिणकर्मी, त्यागी, त्रिकालविद्, त्वष्टा (त्वष्ट्र), दक्ष, दाता, दिव्य, दिष्णु, दृस, देववर्धिक
, धृतात्मा, नन्दक, नमस्य, नित्य, निपुण, नियामक, निरज, पटु, पारङ्गत, पृथु, ब्रह्मवत्, विश्वात्मा,
विश्वकर्मा, सर्वेश्वर और सृष्टिकर्ता। (शिल्पशास्त्रम् : सम्पादक-अनुवादक : श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा
संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, 2008 ई., भूमिका, पृष्ठ 15)

  1. यहाँ कार्त्तिकादि वर्षारम्भ का सङ्केत है जो कि मेवाड़ के बाद गुजरात आदि में अद्यावधि प्रचलन में है।
    अन्यत्र चैत्रादि या श्रावणादि वर्षारम्भ किया जाता है। ग्रन्थ के 19वें सूत्र (14-15) में भी इसी क्रम से
    गणना है। विष्णु आदि पुराणों से ज्ञात होता है कि पूर्व गुप्तकाल तक नक्षत्रों की गणना कृत्तिकादित थी,
    वराहमिहिर ने प्रथमतः अश्वन्यादित गणना की। यहाँ बारह शैवव्रतों का विधान किया गया है।