अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-२८ 131
राजालयस्य मध्ये च सद्मानि विष्णुतेजसा ? ।
तानि द्व्यष्टसहस्राणि माणिक्यादियुतानि च ॥ २८ ॥
मण्डपैः सुवितानैश्च चन्द्रार्कद्युतिसन्निभैः ।
वसन्तोत्सवसम्प्राप्तौ गोपीक्रीडार्थमेव च ॥ २९ ॥
इसी प्रकार वहाँ राजालय थे जिनके बीच-बीच विष्णु के तेज के समान
प्रकाशित होने वाले कक्षालय थे। इनमें सोलह हजार माणिक्यादि रत्नों से विजड़ित
मण्डप बने हुए थे जिनके चन्दोवे, वितानों की शोभा सूर्य और चन्द्रमा की चमक
के समान प्रतीति देती थी और जो वसन्तोत्सव आने पर गोपीजन के साथ क्रीड़ा
अर्थात् रासलीला के निमित्त बनाए गए थे।
तथा त्रिवलिकैस्तालैस्तथा च पटहोत्तमैः ।
स्वरैश्च मधुरैर्वंश्या हुडकैश्च सलीलया ॥ ३० ॥
विष्णोर्महोत्सवश्चैवं द्वारकापुरमण्डनः ।
वर्णितो देवदैत्याद्यैर्विष्णुराजमहोत्सवः ॥ ३१ ॥
वहाँ लीलाओं के बीच-बीच त्रिवलिका¹ की तालों पर और बड़े-बड़े नगारों
का स्वर वंशी का मधुर निनाद और हुडक्का का वादन होता। उक्त विष्णु महोत्सव
से द्वारकापुर की शोभा बढ़ती है। विष्णुराज महोत्सव का ऐसा वर्णन देवताओं व
दानवों ने किया है।
ध्यष्टयोजनविस्तारा ह्यायता त्र्यष्टयोनैः ।
समुद्रेण त तद्द्वारमुत्तमा द्वारिकाभिधा ॥ ३२ ॥
सर्वश्रेष्ठा पूरीणां च द्वारिका विष्णुभक्तिदा।
वह सोलह योजन विस्तार और चौबीस योजन लम्बाई वाली जो द्वारका नामक
की नगरी² है, वह वास्तव में समुद्र यात्रा करने वालों के लिए उत्तम समुद्र द्वार ही
है। भगवान् विष्णु की भक्ति देने वाली जितनी भी सर्वश्रेष्ठ पुरियाँ हैं, उनमें
द्वारकापुरी भी एक हैं।
तत्र बलादीनां वर्णनं —
चत्वारिंशत्सहस्राणि दन्तिनश्च महोत्कटाः ॥ ३३ ॥
- कृदिकारादिति पक्षे ङीपि त्रिवलीत्यपि। (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 2, पृष्ठ 662)
- वराहपुराण में इसको पाँच योजन विस्तृत एवं दस योजन लम्बी बताई गई है, इसको इन्द्रपुरी के समान
व विश्वकर्मा द्वारा निर्मित कहा गया है—अस्ति द्वारवती नाम पुरी शक्रपुरी यथा। मत्प्रभावानुरूपा च
निर्मिता विश्वकर्मणा॥ पञ्चयोजनविस्तारा दशयोजनमायता। (वराह. 147, 7-8)