अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें136 अपराजितपृच्छा
फैला देंगे कि उनसे प्रभावित होकर ब्राह्मण लोग भी शौचाचार त्याग देंगे और उनमें वेदों
का स्वाध्याय भी स्थगित हो जाएगा। यहाँ तक कि वे अपने पूर्वजों की परम्परा से प्राप्त
वेद ग्रन्थों तक को बेच देंगे। इतने लोभी हो जाएँगे कि अस्थिर चित रहने लगेंगे।
न स्निह्यन्ति पिता पुत्रा योषितो भ्रातरस्तथा।
न भृत्या नैव मित्राणि भविष्यन्ति न शान्तिदाः ॥ 11 ॥
धर्मो जितो ह्यधर्मेण सत्यं चैवानृतेन च।
जिताश्चौरैश्च राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः ॥ 12 ॥
वे इतने स्वार्थी हो जाएँगे कि पिता-पुत्र, नारियाँ, भाई-भाई, नौकर, मित्रगणों
आदि किसी में स्नेह सम्बन्ध नहीं रहेगा और पारस्परिक सम्बन्ध भी शान्ति देने
वाले नहीं होंगे।¹ इस मायामोह के अवतार के प्रभाव से धर्म को अधर्म जीत लेगा।
सत्य को झूठ पराजित कर डालेगा। चोर-तस्कर राजाओं को जीत लेंगे, स्त्रियाँ
पुरुषों को जीत लेंगी।
अथ युगवर्णनमाह —
सीदन्ति चाग्निहोत्राणि गुरुपूजा प्रणश्यति।
दशमे₁₀ द्वादशे₁₂ वर्षे नारी गर्भवती भवेत् ॥ 13 ॥
कन्याश्चैव प्रसूयन्ते तस्मिन्कलियुगे सदा।
सम्प्राप्ते षोडशे₁₆ वर्षे नरा गलितयौवनाः ॥ 14 ॥
(इसी प्रकार युग की दशा का वर्णन किया जा रहा है) कलिकाल के प्रभाव
से अग्निहोत्र की वैदिक परम्परा विनष्ट हो जाएगी। गुरुपूजा की आश्रमीय प्रणाली
नष्टभूत हो जाएगी और व्यभिचार, दुराचार इतना फैल जाएगा कि दस और बारह
वर्ष की कन्याएँ भी इसका शिकार होकर गर्भवती होने लगेंगी। फलतः इस
कलिकाल में ऐसी गर्भवती नारियाँ केवल कन्याओं को जन्म देने वाली होंगी और
सभी नर विषयासक्त होकर सोलह वर्ष की आयु तक आते-आते गलित-यौवन हो
जाएँगे अर्थात् वृद्ध-से प्रतीत होने लगेंगे।
अल्पोदकास्तथा मेघा अल्पशस्या तु मेदिनी।
अल्पक्षीरास्तथा गावः क्षीरे सर्पिर्न विद्यते ॥ 15 ॥
- महाभारत में आया है कि पुत्र पिता का और पिता पुत्र का वध करके भी उद्विग्न नहीं होंगे। अपनी प्रशंसा के
लिए लोग बड़ी-बड़ी बातें बनाएँगे किन्तु समाज में उनकी निन्दा नहीं होगी। उस समय सारा जगत् म्लेच्छ
हो जाएगा, इसमें संशय नहीं है। एक हाथ दूसरे हाथ को लूटेगा, सगा भाई भी भाई के धन को हड़प
लेगा— पुत्रः पितृवधं कृत्वा पिता पुत्रवधं तथा। निरुद्वेगा बृहद्वादी न निन्दामुपलप्स्यते ॥ म्लेच्छीभूतं जगत्
सर्वं भविष्यति न संशयः। हस्तो हस्तं परिमुषेद् युगान्ते समुपस्थिते ॥ (महा. वनपर्व 190, 28, 38)