अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
56 अपराजितपृच्छा
ज्ञानं गुरुमुखोद्भूतं संसृतेः पाशच्छेदनम्।
ये भजन्ति गुरुं भक्त्या सूर्य तमिहरं यथा ॥ 12 ॥
लभन्ते ते ततो ज्ञानं धर्मे तीर्थे महात्मनि।
अर्थदानप्रभावेण ज्ञास्यन्ति तपसां क्रमम् ॥ 13 ॥
ज्ञाने मोक्षं तपो राज्यं दाने भोग्यं महोत्कटम्।
एवं तु जायते मुक्तिर्यो जानाति स पण्डितः ॥ 14 ॥
गुरुमुख से उद्भूत ज्ञान संसार रूपी भवसागर के पाशों को काटने वाला है और
जो लोग भक्तिपूर्वक गुरु की पूजा और आज्ञा में रहते हैं, उनका अज्ञानान्धकार उसी
प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे सूर्य का प्रकाश अन्धकार को समास कर देता है। ऐसे
भक्त लोग इस ज्ञान को धर्मस्थानों में तथा तीर्थस्थानों में महात्मा स्वरूप गुरुओं से
प्राप्त करते रहते हैं और अपने अर्थ के दान-पुण्य के प्रभाव से वे तपस्या के क्रम
को जान लेते हैं। वे यह सम्यक् प्रकार से जान जाते हैं कि ज्ञान का फल मोक्ष है,
तप का फल राजपद पाना है, दान का फल महान भोगों को भोगना है। इसी तरह
से मुक्ति होती है। यह जानने वाला ही सही तौर पर पण्डित कहा जाता है।
यः करोति स कर्त्ता च भूतात्मा कथ्यते बुधैः।
जीवसञ्ज्ञो ह्यन्तरात्मा सहजः सर्वदेहिनाम् ॥ 15 ॥
येन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु।
न भूत भूतसम्पर्कों महाक्षेत्रज्ञ एव सः ॥ 16 ॥
जो करता है, वही कर्ता है जिसे विद्वान लोग 'भूतात्मा' कहते हैं और सभी
देहियों की सहज अन्तरात्मा को 'जीव' संज्ञा से कहा जाता है और जिससे जन्म
लेने के उपरान्त के सभी सुख-दुःख जाने जाते हैं, उसे ही 'महाक्षेत्रज्ञ' कहा गया
है¹, उसे कोई भूत-प्राणी या भूत सम्पर्क-प्राणी का स्पर्श नहीं होता। वह तो केवल
साक्षी और दृष्टा मात्र है।
एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्।
इदं शरीरं ज्ञानेन क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥ 17 ॥
आत्मैव चात्मचैतन्यमात्मना सृजति स्वयं।
आत्मना कृतं नानात्वमात्मन्येव प्रलीयते ॥ 18 ॥
वह ज्ञानी अपने सात्विक ज्ञान से इस शरीर को 'क्षेत्र' समझता है। उसे एक
- श्रीमद्भगवद्गीतायां - इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥
(13, 1)
सूत्र-१२ ७१
प्रकार से या बहुत प्रकार से वैसे ही देखता है जैसे एक चन्द्रमा जल ही लहरों पर
अनेक रूपों में दिखाई देता है, फिर भी वह वास्तव में एक ही है। इसी जल-
चन्द्रवत न्यायानुसार आत्मा ही आत्म चैतन्य को अपनी आत्मा में ही स्वयं सृजन
करती है और अपनी स्वयं की की गई नानात्व की कृतियों को वही आत्मा स्वयं
उन्हें प्रलीयते अर्थात् मिटा देती है।¹
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ 19 ॥²
आकाश की ओर मूलवाले और नीचे की ओर शाखा वाले जिस संसार-रूप
अश्वत्थ वृक्ष को अव्यय अर्थात् कभी व्यय नहीं होने वाला— ऐसा कहते हैं और
वेद जिसके पत्ते हैं (अर्थात् विविध छन्दों के सृष्टि के रूप ऐसे ही असंख्य हैं जैसे
किसी पीपल के असंख्य पर्ण हों), उस संसार-वृक्ष को जो तत्त्व से जानता है, वह
सम्पूर्ण वेदों को जानने वाला है।
एकस्तम्भे नवद्वारे त्रिशूले पञ्चदेवताः।
क्षितिप्राकारसन्नद्धेऽनुपरिचारनायकाः ॥ 20 ॥
यह जीवात्मा एक स्तम्भ पर टिका हुआ है, वह स्तम्भी ऐसा है कि जिसमें नौ
द्वार हैं, तीन शूल हैं, पाँच देवता हैं और उसके भूमि पर परकोटे पर सन्नद्ध पहरेदार
चार नायक सैन्य है।³
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
गर्भविज्ञानोद्भवाधिकारो नाम द्वादशं सूत्रम् ॥ 12 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गर्भविज्ञान
उद्भव अधिकार नामक बारहवां सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 12 ॥
- श्रीमद्भगवद्गीतायां— क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा। भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥ (13,
- श्रीमद्भगवद्गीतायां (15, 1) तथा च कठोपनिषदे — ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेवं
शुक्लं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते॥ तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन। एतद्वैतत्॥ (2, 3, 1) - एक स्तम्भ अर्थात् यह शरीर। नवद्वार अर्थात् इस देह के नौ द्वार— दो आँखें, दो कान, दो नासिका,
एक मुंह, एक उपस्थ और एक गुह्य। तीन शूल अर्थात् सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण। पाँच देवता
अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश। चार सेनानायक अर्थात् धीरोदात्त, धीरप्रशान्त, धीरललित,
धीरोद्धत (अग्निपुराण, काव्यशास्त्रीय भाग) या अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्ट अथवा चार
अन्तःकरण— मन, बुद्धि, चित्त व अहङ्कार।
58 अपराजितपृच्छा
कर्मज्ञानोद्भवो नाम त्रयोदशं सूत्रम् ॥ 13 ॥
अपराजित उवाच -
केवलं कुलजं ज्ञानं शास्त्रजं क्षेत्रजं तथा ।
चतुर्मार्गबहिस्थं च कथय परमेश्वर ॥ 1 ॥
कष्टं साध्यं विना कष्टैरभ्यासं किल शाश्वतम् ।
कथयस्व प्रसादेन ज्ञानाभ्यासस्तु वै यथा ॥ 2 ॥
अपराजित बोले - केवलज्ञान, कुल से प्राप्त होने वाले ज्ञान, शास्त्र से प्राप्त
होने वाला ज्ञान और क्षेत्रीय परम्परानुसार होने वाले ज्ञान के अतिरिक्त जो बाहरी
ज्ञान शेष है, उसे भी हे परमेश्वर ! कहिए। यह सब ज्ञान प्राप्त करने का अभ्यास चाहे
कष्ट साध्य हो अथवा बिना कष्ट साध्य, सारा शाश्वत ज्ञान आप कृपाकर जैसा भी
हो, कहिए।
विश्वकर्मोवाच -
अग्निः काष्ठे तिले तैलं क्षीरमध्ये यथा घृतम्।
गुरुवत् कर्मयोगेन अभ्यासो ज्ञानदेहजः ॥ 3 ॥
यथा चात्यूर्ध्वसंस्थोऽपि दृश्यते जलचन्द्रमाः ।
तथा सर्वत्रसंस्थोऽपि ह्यात्माल्पैरवे दृश्यते ॥ 4 ॥
विश्वकर्मा बोले - हे वत्स ! जिस प्रकार अग्नि काष्ठ में, तेल तिल में और घी
दूध में अदृश्य रूप में स्थित है, परन्तु अभ्यास से ये सब ही प्राप्त किए जाते हैं,
उसी तरह ज्ञान भी देह में अदृश्य रूप में उपस्थित है जिसे गुरु के समान कर्मयोग
के अभ्यास द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। जिस प्रकार अत्यन्त ऊँचे होने पर भी
चन्द्रमा को हम जल में आसानी से निकट देख सकते हैं, उसी प्रकार सभी में सर्वत्र
स्थित आत्मा को भी अपनी आत्मा द्वारा अल्प प्रयास मात्र से देखा जा सकता है।
अदृष्टरूपे दृष्टव्यं हस्तौ चापि तथा श्रुतिः ।
अव्यक्ते व्यक्तरूपं च व्यक्ताव्यक्तस्य सम्भवः ॥ 5 ॥
क्षरं चैव परित्यज्य ध्यायेदात्मानमक्षरम्।
त्रिपदं( थं ) स्यात्परं स्थानं परं ब्रह्मा तदुच्यते ॥ 6 ॥
जिस प्रकार हाथ से स्पर्श करके या या कान से सुनकर भी अदृष्ट वस्तु का
ज्ञान दृष्ट रूप की तरह हो जाता है, उसी प्रकार अव्यक्त को भी व्यक्त रूप में और
मिश्र रूप में व्यक्ताव्यक्त भाव को भी देखा जाना सम्भव है। व्यक्ति को चाहिए कि
सूत्र- १३ [gap] 59
क्षर अर्थात् नाशवान वस्तु का ध्यान करना त्यागकर अक्षर अर्थात् नित्य रहने वाले
आत्मतत्त्व का ध्यान करें क्योंकि त्रिपदं- त्रिपदासावित्री के ध्यान करने से ऊँचा
कोई स्थान नहीं है, उस परम ध्यान को ही परमब्रह्म कहा गया है।
ब्रह्मारन्ध्रं ततो मध्ये जलसूर्य पुरभेदकम् ? ।
तन्मध्ये च समस्तं तु जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ 7 ॥
ऊर्ध्व चन्द्रो ह्यधः सूर्यो ब्रह्ममूलोद्भवन्तरम्।
वर्षन्त्यमोघमेघाश्च चन्द्रस्थानमतः परम् ॥ 8 ॥
इस ब्रह्मारन्ध्र अर्थात् ब्रह्माण्ड की पोल में जलसूर्य अर्थात् सूर्य की गर्मी से
वाष्पीभूत हुआ जल, पुरभेदक अर्थात् पूरी तरह भेदकर पूर्णतः ब्रह्माण्ड में व्यास है
और इसी के बीच में यह समस्त स्थावर जङ्गम जगत समाया हुआ है। ऊपर
चन्द्रलोक स्थित है, उसके नीचे सूर्यलोक है और इनके बाद ब्रह्म का मूलोद्भव
हुआ। चन्द्रस्थान अर्थात् चन्द्रलोक से और उससे भी ऊपर से अमोघ मेघों से वृष्टि
होती रहती है।
चन्द्र
60 अपराजितपृच्छा
अथ हंसयोगसाधनमाह –
हकारादि सकारान्तं संस्मरेत्तदहर्निशम् ।
लक्षयेत्तत्र सञ्चारं वर्णोच्चारविवर्जितम् ॥ 12 ॥
अनन्तं सहजं हंसं नित्याभ्यासपदे स्थितम् ।
गमागमनयोगेन सप्तकोटिजपः स्मृतः ॥ 13 ॥
षट्त्रिंशदङ्गुलं चारे वामदक्षिणगोचरे ।
स्वयमुच्चार्यते हंसो हंसस्तेन स उच्यते ॥ 14 ॥
(उसके आगे) साधक को हंस-योग की साधना करनी चाहिए। इसके
अभ्यास में हकार से आरम्भ करें और सकार से अन्त करें परन्तु ध्यान रखें कि यह
प्राणायाम की साधना है जिसमें केवल प्राण के आवागमन को साक्षी भाव से लक्ष्य
करके देखना है। आते श्वास में 'ह' की ध्वनि जैसा अभ्यास और जाते श्वास में 'स'
की ध्वनि जैसा आभास मात्र करना है और किसी प्रकार का 'ह' वर्ण या 'स' वर्ण
का वर्णोच्चार अर्थात् ध्वनि मुख उच्चारित नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार इस
सहजयोग में अनन्त हंस के नित्याभ्यास से पद पर दृढ़ स्थिति प्राप्त होती है और इस
सहजयोग में नित्य श्वास के आने-जाने के स्वरूप योग में सात करोड़ जप सहज ही
प्रतिदिन होते रहते हैं— इस योग में मात्र श्वास पर आते-जाते समय लक्ष्य रखना
है। इस सहजयोग के हंस प्राणायाम में नासिका के वाम व दक्षिण गोचर से अर्थात्
चन्द्रनाड़ी व सूर्यनाड़ी से सञ्चरित होने वाले श्वास की लम्बाई छत्तीस अङ्गुल की
होनी चाहिए अर्थात् व्यक्ति को सदा दीर्घ श्वास लेने का अभ्यास होना चाहिए।
जिससे वायु में स्थित प्राणी की पूर्ण प्राप्ति होती रहे। इस योग की सहज प्रक्रिया में
'हंसो', 'सोऽहं' की ध्वनि स्वयं ही उच्चारित होती रहती है, इसीलिए इसे हंस
(योग) कहा जाता है।¹
- तथा च योगगीतायां – शृणु राजन्यवक्ष्यामि हंसमन्त्रस्य साधनम्। यथोक्तं शम्भुना पूर्वं गिरिजायै
महात्मना॥ हृदयादुत्थितः प्राणो बहिर्याति महीपते। द्वादशाङ्गुलमानेन नासाद्वारा निरन्तरम्॥ परावृत्य
ततस्तूर्णं हृदयं प्रति गच्छति। हृदयाम्भोजतः पश्चाद्बहिरायाति सत्वरम्॥ एवं पुनः पुनः प्राणः
श्वासोच्छ्वासक्रमेण वै। सर्वेषामेव जन्तूनां बहिरन्तः प्रधावति॥ निर्गमेहं भवेच्छब्दः प्रवेशे सः प्रकीर्तितः।
हंसो हंस इति प्राणी वारम्वारं जपेत्सदा॥ बहिरागमने हंसः सोहं स्यादन्तरागमे। हंसः सोहं जपो देहे
स्वतो नित्यं प्रवर्त्तते॥ षट्शतानि च संख्या स्यात्सहस्राण्येकविंशतिः। जपस्याष्टसु यामेषु नित्यमेव दिने
दिने॥ एकान्ते समुपविश्य परेशं हंसविग्रहम्। ध्यायन्नेकाग्रचित्तेन पश्येत्प्राणगति बुधः॥ निर्गमे चप प्रवेशे
च हंसः सोहं निरन्तरम्। चेतसा चिन्तयेन्मन्त्र वाचा नोच्चारयेत्क्वचित्॥ एवमभ्यासतो नित्यं जपकोटिर्यदा
भवेत्। तदा प्रवर्त्तते नादः स्वयमेव न संशयः॥ (योगगीता 15, 65-74; तुलनीय हंसोपनिषद् एवं
दत्तात्रेयसंहिता)
सूत्र- १३ ६१
यावन्न चालयेद्योगी ह्यक्षसूत्रकरस्थितम्।
सप्तकोटिजपं कृत्वा हंसस्त्वेवं निवर्तते ॥ 15 ॥
एवं विश्वगतश्चारः प्राणिनां शुभदायकः।
हंसरूपे स्थिताः प्राणाः प्राणास्तत्त्वैः प्रकीर्तिताः ॥ 16 ॥
इस प्रकार के हंसयोग के जाप में योगी अपने हाथ में अक्षमाला नहीं चलाता
है तथापि उसके जाप सात करोड़ इस हंसत्व से पूरे निवर्त हो जाते हैं। इस प्रकार
का विश्वगत सञ्चार समस्त प्राणियों के लिए शुभदायक है। इसीलिए हंस रूप में इन
प्राणों के स्थित होने से ही इनको प्राणतत्त्व नाम से कहा गया है।
अथ हृदयकमलमाह —
हृदये सहजं पद्ममष्टपत्रं सबिन्दुकम्।
इच्छाशक्तिस्तथा मध्ये दलान्ते कुलदेवताः ॥ 17 ॥
शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः।
बीभत्साद्भुतशान्ताश्चाल्पाष्टौ ? कमले स्थिताः ॥ 18 ॥
कुलदेव्यष्टकोपेतमिच्छाशक्तिर्हदिस्थिता।
अब हृदय के भावों का विशेष परिचय दिया जा रहा है— हृदय में सहज ही
आठ पँखड़ियों और मध्य में बिन्दू युक्त कमल कहा गया है। इसमें बिन्दू रूप मध्य
में तो इच्छा शक्ति है और आठों दलों-पँखड़ियों में कुल देवता हैं। इस कमल में
(1.) शृङ्गार, (2.) हास्य, (3.) करुणा, (4.) रौद्र, (5.) वीर, (6.) भयानक,
(7.) वीभत्स, (8.) अद्भुत- ये आठ (अल्परूप से शान्त भी) रस और मध्य
बिन्दु में कुल देवियाँ भी स्थित हैं तथा इच्छा शक्ति भी हृदय में ही स्थित हैं।
ऊर्ध्वाकारैः स्थिता ख्यातेन्द्रियैर्बुद्धिरनुक्रमात् ॥ 19 ॥
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः।
मनो बुद्धिरहंकारः सत्त्वं रजस्तमस्तथा ॥ 20 ॥
इस हृदय में ही ऊर्ध्वाकार में स्थित इन्द्रियाँ भी बुद्धि के अनुक्रम में स्थित हैं।
इसी हृदय-कमल में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध तथा मन, बुद्धि और
आठवाँ अहङ्कार तथा सत्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण युक्त स्थित है।
कामः क्रोधश्च मोहश्च लोभो हर्षो मदो भयम्।
विषादश्चाष्टमः प्रोक्त इत्यष्टौ च गुणाः स्मृताः ॥ 21 ॥
इसी प्रकार हृदय कमल की अष्ट पँखड़ियों में ही काम, क्रोध, मोह, लोभ,
हर्ष, मद, भय और आठवाँ विषाद स्थित हैं। इन्हीं आठों को गुण भी कहा गया है।
न्द्रपीठे च संस्थिता ? ॥ 3 ॥Wait, look at line 29:कामाख्यनिलयः प्रोक्तश्चन्द्रपीठे च संस्थिता ? ॥ 3 ॥There is a question mark before॥ 3 ॥! ? ॥ 3 ॥And in line 19:विदुः ? ॥ 1 ॥- also a question mark! This means the editor/proofreader was working with corrupt manuscripts, and where readings are corrupt or doubtful, they put a?or left the corrupt reading! Now look at line 28: Is there a question mark? No. But is the reading in the manuscript corrupt? Yes! In G.O.S. (Gaekwad's Oriental Series) edition of Aparajitaprccha, Sutra 14, verse 3: Let's see how Mankad or the editor transcribed it: Could it beहृग्रिममध्ये? Wait, look at the letters: हृ ग्रि म म ध्येWait, let's look atग्रिम: Is it ग्रि+म+म+ध्ये? Wait, why would it be ग्रिममध्ये? "हृग्रिममध्ये"? Wait! Look at the first letter: हृThenा? No, wait! Could it be ह
सूत्र-१४ 63
प्रविष्टा पद्मनालेऽपि सूर्यपीठे लयं गता।
संस्थिता कामरूपान्ते सूर्येन्दुग्रहणे रता ॥ ४ ॥
विश्वकर्मा कहने लगे — ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् ब्रह्माण्ड की पोल में चन्द्रमा स्थित है
और अग्नि के बीच में रवि या सूर्य विद्यमान है तथा जिसे कामाख्य निलय कहते हैं
वह चन्द्र के पीठ के पीछे संस्थित है। पद्मनाल में प्रवेश करने पर भी वह सूर्य के
पीछे ही लय हो गई। जब सूर्य और चन्द्र ग्रहण में रत होते हैं, तब उन्हें कामरूपान्त
में संस्थित कहा जाता है।
रविचन्द्रयुते काले शक्तिः सङ्क्रमते यदा।
तत्काले ग्रहणं प्रोक्तं सङ्क्रान्तिर्विष्णुसम्भवा ॥ ५ ॥
ग्रहणान्ते पराशक्तिः पद्मतन्तुनिभा स्थिता।
सृजति स्वेच्छया कामः भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ ६ ॥
रवि-चन्द्र की युति होने के समय जब शक्ति का सङ्क्रमण होता है, उस समय
को ग्रहण कहा जाता है और इससे सङ्क्रान्ति तो विष्णु से ही सम्भव होती है।
ग्रहण के अन्त में पराशक्ति पद्मतन्तु के समान स्थित रहकर अपनी स्वयं की इच्छा
से काम का सृजन करती है जिससे चार प्रकार के भूतग्राम अर्थात् प्राणियों के समूह
उत्पन्न होते हैं।
कर्मकर्तृमणिर्बन्धुः करहीनाऽपि कर्षति।
सृजति ज्ञानतस्तद्वच्चक्षुर्हीना जगत्त्रयम् ॥ ७ ॥
भ्रामको(की) भ्रामयेद् बन्धूः करहीनोऽपि भागशः ?।
सृष्टिमार्गस्थिता शक्तिः करहीना करोति च ॥ ८ ॥
कर विहीन होने पर भी यह काम करने वाली कलाई (मणिबन्ध) पकड़कर
खींचती है और चक्षु विहीन होने पर भी चक्षु वाले की तरह ज्ञान से ही तीनों लोकों
की रचना कर देती है। यही भ्रामकी सभी बन्धुओं को स्वयं कर हीन होने पर भी
उनकी कलाई पकड़कर भ्रामती, नचाती है। इस तरह यह पराशक्ति कर हीन होने
पर भी अपने सृष्टि मार्ग पर चलती हुई सृष्टि की रचना करती है।¹
चन्द्रः कोऽपि मणिर्बद्धो नष्टचन्द्रः प्रमुञ्चति ?।
मुखहीना तथा शक्तिर्वाङ्मयं दर्शयेत् खलु ॥ ९॥
- तथा चौपनिषद्वाक्यम्- 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः' — वे परमात्मा हाथ-
पैरों से रहित होने पर भी ग्रहण करने में समर्थ और वेगपूर्वक चलने वाले हैं। वे नेत्रों के बिना ही
देखते हैं और कानों के बिना ही सुनते हैं। (श्वेताश्वतरोपनिषद् 3, 19)
64 अपराजितपृच्छा
अद्रवाऽपि द्रावयति यत्किञ्चित्काञ्चनादिकम्।
ज्ञानशक्तिस्तथा चैवं निद्रवेत्सृष्टितोऽम्बरम् ॥ 10 ॥
इसी तरह वह किसी चन्द्र को भी उनकी कलाई पकड़कर छुड़ाती है। यह
पराशक्ति मुखहीन होने पर भी समस्त वाङ्मय साहित्य-शास्त्रादि को कहकर प्रकट
करती है। यह पराशक्ति स्वयं अद्रवा होने पर भी काञ्चनादि जो कुछ भी धातुएँ हैं,
उनको द्रवित करती हैं, पिघलाती है। यह पराशक्ति ही अपनी सृष्टि से समस्त
ज्ञानशक्ति को आकाश में प्रसारित करती है।
अग्नितेजोगुणा यद्वत् सूर्यरश्मिगुणा यथा।
रवेरिव गुणास्तद्वत् सहजाः शक्तिसंस्थिताः ॥ 11 ॥
निर्गुणाऽपि गुणैर्युक्ता रूपहीनाऽपि रूपिणी।
सञ्चरेत्पादहीनाऽपि कर्णहीना श्रृणोति च ॥ 12 ॥
जिघ्रति घ्राणहीनाऽपि वक्त्रहीनाऽपि जल्पति।
चक्षुर्हीना लोकते च त्रैलोक्यं च करस्थितम् ॥ 13 ॥
जिस प्रकार सूर्य की रश्मियों के साथ गुण का सम्बन्ध है, उसी प्रकार अग्नि
का अपने तेज से गुण-सम्बन्ध है। रवि के समान ही सभी गुण उसी तरह शक्ति के
साथ सहज ही स्थित है। यह पराशक्ति निर्गुणा होने पर भी गुणों के साथ है और
रूप हीन होते हुए भी रूपवती है। यह पाँव विहीन होने पर भी चलती है और
कानों के नहीं होने पर सुनती है। यह नासिका से विहीन होने पर भी सूंघती है और
मुख हीन होने पर भी बोलती है। चक्षुहीना होकर भी यह देखती है और सारे तीनों
लोक उसके कर-कमलों में स्थित है।¹
एवं सा सर्वरूपस्था ह्यमूर्ता मूर्तिचारिणी।
पराशक्तिरितिख्याता ह्येका त्रैकोल्यनायिका ॥ 14 ॥
एषा सा परमा शक्तिरिच्छाज्ञानक्रियात्मिका।
पृथगेकाष्टकैर्युक्ता ह्यज्ञानां ज्ञानदा स्मृता ॥ 15 ॥
इस प्रकार वह पराशक्ति सभी रूपों में स्थित होकर अमूर्त होने पर भी मूर्ति
रूप में चलने वाली है इसीलिए तो इसे पराशक्ति नाम से विख्यात किया जाता है
१. तथा च गीतायां— सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिरोमुखम्। सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥ (13, 13-14)
गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है—बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान
बिनु बास असेषा॥ (रामचरितमानस 1, 118, 3-4)
सूत्र- १४ 65
जो तीनों लोकों— स्वर्गलोक, मर्त्यलोक व पाताललोक की नायिका अकेली
एकछत्रा रूप में है। इस तरह की यह परमशक्ति इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मिका है।
यही पराशक्ति पृथक्-पृथक् अठारह रूपों से युक्त होकर ही सब अज्ञानियों को ज्ञान
देने वाली मानी गई है।
अनेकभाविकं कर्म दग्धबीजमिवाम्भसि।
भविष्यदपि संरुद्धं ज्ञानकं भुवि गोचरम्॥ 16 ॥
सहजं भोगजं कर्मानर्गलं भविष्यत्तथा।
शक्तित्रयविभागेन दद्यात् सर्वं शुभाशुभम् ॥ 17 ॥
अनेक भावों से उत्पन्न कर्म भी इस पराशक्ति की कृपा से वैसे ही नष्ट हो जाते हैं
जैसे जले हुए बीजों को अङ्कुरण के अर्थ में जल से सींचना व्यर्थ है। इस महामाया
की कृपा से बन्धे और अवरुद्ध कार्य भी होने लगते हैं और ऐसे दिखने लगते हैं मानो
ये पहले ही हमारे ज्ञान में हों और हमें गोचर होते रहे हों। इस पराशक्ति की कृपा से
जन्म के साथ उत्पन्न होने वाले तथा पूर्वजन्म के प्रारब्ध, भोग के कारण उत्पन्न होने
वाले कर्म भी अनर्गल हो जाते हैं अर्थात् अर्गला, बाधा रहित हो जाते हैं और तीनों ही
शक्तियों के विभागानुसार सभी शुभाशुभ फल देने में समर्थ हो जाते हैं।¹
अथ शक्त्याप्रमाणानि —
कारणे च क्रियाशक्तिरिच्छाशक्तिः प्रवर्तने।
ज्ञानशक्तिस्तथाचारे सञ्चरेत्सचराचरम् ॥ 18 ॥
सर्वाङ्गसन्धिसञ्चारे नखकेशाग्रमध्यके।
व्यापिनी संस्थिता देहे रेणुमात्रस्वरूपिणी ॥ 19 ॥
ये शक्तियाँ इस प्रकार हैं— (1.) कारण में क्रियाशक्ति लगती है, (2.)
प्रवर्तन या चलने में, बढ़ने में इच्छाशक्ति लगती है और (3.) आचरण में ज्ञानशक्ति
लगती है। इस तरह ये तीनों ही शक्तियाँ समस्त चराचर जगत में सञ्चरित होती है।
देह के सभी अङ्गों के सञ्चारण के लिए, सभी सन्धियों को गति देने के लिए जैसे
नख व केश के अग्रभाग में, मध्यभाग में भी सञ्चरण के लिए यह पराशक्ति रेणु-
मात्र स्वरूप की होकर समस्त देह में स्थित रहती है।
१. तथा च श्रीमद्भगवद्गीतायां— अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु
प्रभविष्णु च॥ (13, 17)
पुराणेऽपि— सृष्टिस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्माविष्णुशिवात्मकः। स सञ्ज्ञां याति भगवान्एक एव जनार्दनः॥
(पद्मपुराण सृष्टिखण्ड 2, 114)
बीजरूपा तु सा देवी जगन्माता व्यवस्थिता।
तां ज्ञात्वा मुच्यते पाशैस्सर्वज्ञस्तु नरो भवेत् ॥ 20 ॥
क्रियेच्छयोस्तथा ज्ञाने त्रिकरूपे व्यवस्थिता।
प्रातर्यस्तु प्रबुद्धात्मा विन्द्यात् शक्तिपतिं तु सः ॥ 21 ॥
यह पराशक्ति बीज रूपा होकर ही जगन्माता के रूप में व्यवस्थित है। इस
जगन्माता को ही सही-सही जान लेने पर सभी पाशों से मुक्ति मिल जाती है और
इस प्रकार जान लेने वाला व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। क्रियाशक्ति, इच्छाशक्ति और
ज्ञानशक्ति के इस त्रिक् रूप व्यवस्था से वह सर्वज्ञ प्रबुद्धात्मा भवसागर को तैर जाता
है और शक्तिपति को पाने का अधिकारी हो जाता है।
एवं शारीरिकं चक्रं शक्तित्रयसमन्वितम्।
शक्त्यन्ते च शिवं विद्याद्यो दशान्ते कलौर्विना ? ॥ 22 ॥
इस प्रकार उक्त तीनों शक्तियों¹ के समन्वय को पाया हुआ यह शारीरिक चक्र शक्ति
को जान लेने के अन्त में शिवतत्त्व को जान लेता है और इस तरह भवदशा के अन्त में
बिना किसी कलह (कला ?) के भवसागर से तर जाता है, उसका मोक्ष हो जाता है।¹
एकः शिवः परं ब्रह्मपदमेव निराश्रयम्।
पश्येत् संसारबीजं यो रम्भास्तम्भपुटं यथा ॥ २३ ॥
यस्य शिवशक्तिज्ञानं तस्य मुक्तिर्विधीयते।
शक्तित्रयविमुक्तस्य भुक्तिर्मुक्तिविमोचनम् ॥ 24 ॥
दर्पणेषु यथा छाया पिण्डः पिण्डाकृतिर्भवेत्।
तथा सर्वगतः शम्भुर्द्दश्यते जलचन्द्रवत् ॥ 25 ॥
एक ही शिव परम ब्रह्मपद है और वह निराश्रय है अर्थात् वह किसी के सहारे
से नहीं है। जो इस संसार-बीज रूप शिव को केले के स्तम्भ की परतों की तरह
देख लेता है, उसे ही शिव-शक्ति का ज्ञान प्राप्त कहा जाता है और उसकी मुक्ति
निश्चित विधि के अनुसार हुई मानी जाती है क्योंकि शक्तित्रय के द्वारा हुए विमुक्त
नर की प्रारब्ध भुक्ति भी और मुक्ति भी विमोचन को प्राप्त हो जाती है अर्थात् भुक्ति-
मुक्ति भी छूट जाती है। उदाहरण के लिए जैसे दर्पण में अपनी परछाईं भी पिण्ड
शरीर की आकृति जैसी दिखाई पड़ती है, उसी तरह ऐसे जीवन्मुक्त पुरुष को
समस्त चराचर में शिव ही दिखाई देते हैं; यह दर्शन जल की उर्मियों पर सर्वत्र चन्द्र
ही चन्द्र की भाँति दृष्टिगोचर होता है।
- तथा च— इच्छाज्ञानक्रियारूपास्त्रिशूलं शक्तयो मताः। उक्तास्ता एव खट्वाङ्गं शुद्धसत्त्वप्रवर्तिकाः ॥
सूत्र- १५ 67
स्वयं देवी स्वयं देवः स्वयं शिष्यः स्वयं गुरुः ।
स्वयं ध्यानं स्वयं धाता स्वयमेव परात्परम् ॥ २६ ॥
यत्र यत्र मनो याति ( यायात् ) तत्र तत्र परः शिवः ।
वेदो वेद्यं जपो मौनमाचारः प्रार्थना क्रिया ॥ २७ ॥
व्रतं स्नानं तीर्थयात्रा चोपवास्यं त्रिरात्रिकम् ।
इत्येतदाश्रयस्थानं मुक्तिस्थानं निराश्रयम् ॥ २८ ॥
( इससे निष्कर्ष यह हुआ कि 'सोऽहं' का जाप करने वाला पराशक्ति को
पाकर शिवतत्त्व को पा लेता है जिसमें) वह स्वयं को देवी तथा स्वयं को देव,
स्वयं को शिष्य और स्वयं को गुरु, स्वयं को ध्यान और स्वयं को ध्यान करने वाला
जानकर स्वयं को ही परात्परम् परमात्मा जान लेता है। ऐसी अवस्था में जहाँ-जहाँ
उसका मन जाता है, वहाँ-वहाँ उसे परम शिव के ही दर्शन होते हैं और उसे समस्त
वेद जाने हुए हो जाते हैं और उसके समस्त जप भी मौन में समा जाते हैं। उसके
समस्त आचार-व्यवहार ही उसकी प्रार्थना की क्रिया बन जाती है। इस संसार के
भवसागर में व्रत, स्नान, तीर्थयात्रा, उपवास, त्रिरात्रिक जपादि सब आश्रय के स्थान
है, परन्तु जीवन्मुक्त को प्राप्त मुक्तिस्थान ही एक मात्र निराश्रय है अर्थात् स्वतन्त्र है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
शिवशक्तिब्रह्मज्ञानाधिकारो नाम चतुर्दश सूत्रम् ॥ 14 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में शिव
शक्ति ब्रह्मज्ञान अधिकार नामक चौदहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 14 ॥
गीतासद्भावोऽपरेऽपराजितबोधनार्थं पञ्चदशं सूत्रम् ॥ 15 ॥
अपराजित उवाच —
बीजरूपा कथं जाता वृद्धिंयाता परेश्वर ।
क्रियाशक्तिः कथं भूता बीजयोनिरथाम्भसि ॥ 1 ॥
अपराजित बोले — हे परमेश्वर ! यह प्राणी बीज रूप में कैसे जन्म लेता है,
जन्म के बाद वृद्धि को कैसे प्राप्त करता है ? इस प्राणी में क्रियाशक्ति कैसे होती है
जो कि बीज योनि को जैसे जल से सींचने पर बीज बढ़ता है, वैसे ही बढ़ती है।
गुरुमार्गाः कथं प्रोक्ताः कुलाकुलोभयोद्भवाः ? ।
कथयस्व महाभाग मम भ्रान्तिहरं प्रभो ॥ 2 ॥
इसी प्रकार गुरु प्रदर्शित मार्ग किसे कहते हैं और कुल व अकुल इस भव में
68 अपराजितपृच्छा
उद्भव करने वाले क्या हैं ? हे महाभाग ! यह सब ठीक-ठीक कहकर हे प्रभो, मेरी
भ्रान्ति को दूर करें।
विश्वकर्मोवाच —
वटो यथा च बीजस्थस्तथा शुक्रगता तनुः ।
सङ्घाटे काञ्चनं यद्वत् क्रियादीपेन दृश्यते ॥ ३ ॥
हे वत्स ! जिस प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म वट बीज में सम्पूर्ण वट वृक्ष समाया हुआ
है उसी प्रकार जीव के शुक्र में उसका समस्त शरीर सम्पूर्ण रूप से समाया हुआ है।
जिस प्रकार कञ्चन में स्थित आभूषण का घड़ा गया रूप क्रिया अर्थात् घड़ाई रूपी
दीप से दिखाई पड़ता है, वैसे यह सब है।
क्रियामाध्यात्मिकीं विद्यात् क्रियाशक्तेरनुक्रमात् ।
देहस्थं दीपकं दिव्यं शक्तिरूपण बोधितम् ॥ ४ ॥
तेन बोधितमात्रेण पश्यन्ति भुवनत्रयम् ।
त्रैलोक्यदीपकं दिव्यं तत्त्वद्योतकरं परम् ॥ ५ ॥
प्राणी की क्रिया शक्ति को आध्यात्मिक समझा जाता है। इसी क्रियाशक्ति के
अनुक्रम से बढ़ते-बढ़ते देह में स्थित दिव्य दीपक प्रज्वलित हो जाता है, उसे ही
शक्ति रूप से समझा जाता है। यह समझ में आते ही तीनों लोकों के चराचर जगत
के प्राणी समूहों का ज्ञान से स्पष्ट दर्शन होने लगता है। इस तरह यह ज्ञान, तत्त्व को
प्रकाशित करने वाला परम दिव्य त्रैलोक्य दीपक स्वरूप है।
मूढात्मानो न बुध्यन्ति गुरुमार्गविवर्जिताः ।
गुरुवक्त्रे स्थितं तत्त्वं प्राप्यते तत्प्रसादतः ॥ ६ ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु ।
इस तत्त्व को गुरुमार्ग पर नहीं चलने वाले मूढ़ लोग नहीं समझ सकते क्योंकि
यह परम तत्त्व तो गुरुदेव के मुख में ही स्थित होता है और वह गुरु की कृपा से ही
प्राप्त हो सकता है। इसलिए यह तत्त्व प्राप्त करने के लिए सभी प्रयत्नों से गुरुदेव की
आराधना करो।
गुरुपूजननिर्देशमाह —
गुरुपूजा प्रकर्त्तव्यागन्धपुष्पाक्षतादिभिः ॥ ७ ॥
पुष्पधूपैश्च नैवेद्यैर्वस्त्रालङ्कारभूषणैः ।
गृहक्षेत्रपुरग्रामैर्गजाश्वशयनासनैः ॥ ८ ॥
सूत्र- १५ ६९
तस्मात् पूजा प्रकर्तव्या ह्यात्मना च धनेन च।
गुरुदेव की पूजा गन्ध, पुष्प, अक्षतादि से करनी चाहिए। गुरु पूजार्थ पुष्प, धूप,
नैवेद्य, वस्त्रालङ्कार, गृह, खेत, नगर, ग्राम, हाथी-घोड़े, शयन-आसनों को समर्पित
करना चाहिए। उन्हें यह सब भेंट में अर्पण करना चाहिए। इसलिए गुरुतत्त्व प्राप्ति
के लिए स्वयं अपने आपको और धनादि को समर्पण करके गुरुदेव की पूजा करनी
चाहिए।
गुरुमाहात्म्यमाह —
गुरुलोपो न कर्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत् ॥ 9 ॥
यावत्कालं भवेद्देहस्तावदेव गुरुं स्मरेत्।
गुरुर्माता पिता देवो गुरुर्ज्ञानं कुलाकुलम् ॥ 10 ॥
गुरु का लोप कभी नहीं करना चाहिए अर्थात् कभी भी गुरु विहीन नहीं रहना
चाहिए। यदि कभी ऐसा अवसर भी आ जाए कि गुरु से दूर, स्वच्छन्द, अकेला
रहना पड़े तो भी जब तक इस देह से जीवित रहो, तब तक गुरुदेव का सदा स्मरण
करते रहो क्योंकि गुरुदेव ही माता, पिता, देव और सर्वस्व है, कुल और अकुल का
बोधक भी गुरुज्ञान ही है।
यस्यैवं संस्थितो भावस्तस्य देवसमं कुलम्।
आसनं शयनं यानं मणिकाञ्चनभूषणम् ॥ 11 ॥
साधकेन न कर्तव्यं गुरो ( वै ) चाधिकं ननु।
यह भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि जिस देव के प्रति आपका भाव दृढ़ता
से संस्थित हो गया हो, उसी देव के समान कुल के आप हो जाते हैं। साधक को
चाहिए कि वह अपने आसन, शयन, यान तथा मणिकाञ्चन, आभूषणादि को किसी
भी प्रकार से गुरु से अधिक महत्व न दें। गुरु के सामने अपना वैभव प्रदर्शन नहीं
करें।
गुरोः शय्यासने यानं पादुकोपानहौ पदम् ॥ 12 ॥
स्नानोदकं तथाच्छायां लङ्घयेन्न कदाचन।
कर्मणा मनसा वाचा यैश्च नाराधितो गुरुः ॥ 13 ॥
तस्माद् ज्ञानं महारत्नमत्यन्तं गूढतां गतम्।
योगिनी शाकिनी कर्म ? यस्य भक्तिस्तु निश्चला ॥ 14 ॥
गुरुदेव की शय्या, आसन, यान, पादुका, पनही-पगरखी, चरणचिह्न, स्नान का
जल तथा गुरुदेव के शरीर की परछाई को कभी नहीं लांघना चाहिए क्योंकि जिसने
70 अपराजितपृच्छा
मनसा, वाचा, कर्मणा गुरु तत्त्व की आराधना की है अर्थात् उसके लिए यह परम
कर्तव्य है। इस तरह जिस साधक की गुरुतत्त्व में निश्चला, अडिग भक्ति है, वह
योगिनी, शाकिनी क्रम के अत्यन्त गूढ़ता को पहुँचे हुए ज्ञान महारत्न का अधिकारी
हो जाता है।
तस्य प्रवर्तते शीघ्रं निर्वाणं परमं पदम्।
इत्थं समययुक्त्या च गुरुभक्तो यतेन्द्रियः ॥ 15 ॥
दृढचित्तेन चादद्याद् ज्ञानं त्रैलोक्यपूजितम्।
मूलसूत्रमहारत्नं रत्नपीठविनिर्गतम् ॥ 16 ॥
ऐसा साधक शीघ्र ही निर्वाण के परमपद की ओर अग्रसर हो जाता है। यही
यतेन्द्रिय गुरुभक्त के लिए युक्त समय समझना चाहिए और वह दृढ़चित्त से साधना
करने से प्राप्त इस ज्ञान के बल पर त्रैलोक्य पूजित हो जाता है। यह ज्ञान मूलसूत्र
रूपी महारत्न है जो गुरुतत्त्व रूपी रत्नपीठ से निकला हुआ समझना चाहिए।
सारभूतं महातत्त्वं मुक्तिमार्गप्रकाशकम्।
आदेयं गुरुभक्ताय वज्रकपाटमुत्तमम् ॥ 17 ॥
यही सारतत्त्व, महातत्त्व है जो मुक्तिमार्ग को प्रकाशित करने वाला है और
गुरुभक्त को गुरुदेव के द्वारा दिया गया, उसकी रक्षा करने वाला, सर्वोत्तम वज्रकपाट
रूप से मिला हुआ तत्त्वज्ञान है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
गीतासद्भावोऽपरेऽपराजितबोधनाधिकारो नाम पञ्चदश सूत्रम् ॥ 15 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गीता
सद्भाव अपरनाम अपराजितबोध अधिकार नामक पन्द्रहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 15 ॥
सत्वरजस्तमः षोडश सूत्रम् ॥ 16 ॥
अपराजित उवाच -
सत्त्वं रजस्तमः कीदृक् कथं तेषां समुद्भवः।
संसारस्य समस्तस्य जननी जगमालिनी ? ॥ 1 ॥
समुद्भूता कथं देव संसारसृष्टिमालिका।
सत्त्वं रजस्तमश्चैवं कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥
अपराजित बोले – सत्व, रज और तम (गुण) क्या हैं? इनका उद्भव कैसे
होता है? इस समस्त संसार की जननी इन्हीं सत्व, रज, तम की शृङ्खला ही है? हे
सूत्र-१६ 71
देव! यह संसार की सृष्टि शृङ्खला सत्व, रज, तम की किस प्रकार उत्पन्न हुई, इसके
विषय में आप कृपा करके कहिए।
विश्वकर्मोवाच —
उत्पत्तिर्जगतो हेतुर्निर्मिता किल विष्णुना।
स्रष्टा वै सर्वशिल्पाना शङ्खशार्ङ्गादिधारिणा ॥ ३॥
तत्रोद्भूतं रजः सत्त्वं तमश्चापि तृतीयकम्।
तदुद्भवा च सृष्टिस्तु जनसन्तानसन्ततिः ॥ ४॥
विश्वकर्मा बोले — जगत की उत्पत्ति के लिए ही शङ्ख, शार्ङ्गपाणि भगवान्
विष्णु ने इन सब सत्व, रज व तम का निर्माण किया है और वे विष्णु ही समस्त
शिल्पों के सृष्टा है। श्रीविष्णु भगवान् से ही सत्व, रज और तीसरा तम उत्पन्न हुआ
है और इनसे ही सृष्टि की जन सन्तान परम्परा का उद्भव हुआ है।
रजो ब्रह्मा तमो विष्णुः सत्त्वं चैव महेश्वरः।
ततस्त्रिकं समुत्पन्नं संसारसृष्टिकोद्भवम् ॥ ५॥
इस सृष्टिक्रम में रज ब्रह्मा स्वरूप, तम विष्णु स्वरूप और सत्व महेश्वर रूप है।
इस त्रिक् से समस्त संसार की सृष्टि का उद्भव हुआ है।
चतुरशीतिलक्षाणि जीवयोनिरनेकधा।
तमस्सतामसी शक्तिस्तपस्तेजोविवर्द्धिनी ॥ ६॥
चौरासी लाख की संख्या में अनेक प्रकार की जीव योनियाँ हैं। तम से उत्पन्न
होने वाली तामसी शक्ति तप और तेज को बढ़ाने वाली है।
रजसो राजसी ख्याता रजो ज्ञाने ब्रह्मात्मजा।
माया मोहश्च तत्कार्यं वैष्णवी मोहशालिनी ॥ ७॥
रजस से राजसी शक्ति विख्यात है। वह ब्रह्मात्मजा है और ज्ञान क्षेत्र का वर्द्धन
करने वाली है। भगवान् विष्णु से उत्पन्न होने वाली तामसी शक्ति मोहशालिनी है
और उसके कार्य माया और मोह है।
सत्त्वाच्च सात्त्विकी शक्तिः सत्त्वज्ञाने शिवात्मजा।
संसारप्रीतिमुक्तानां मोक्षदा सत्त्वसात्त्विकी ॥ ८॥
सत्त्वगुण से सात्विकी शक्ति शिव से उत्पन्न हुई है और सत्त्वज्ञान का वर्द्धन
करने वाली है। यह सत्त्वज्ञान शक्ति संसार की वासनाओं से मुक्तात्माओं को मोक्ष
प्रदान करने वाली है।
72 अपराजितपृच्छा
तमः पिता रजो माता गुरुः सत्त्वं प्रतिष्ठितम् ।
एवं प्रवर्तते सृष्टिः संसारे मोहशालिनी ॥ ९ ॥
रजो रक्तं समाख्यातं तमः शुक्रं प्रतिष्ठितम् ।
सत्त्वं पवन इत्युक्तं संसारे सृष्टिमालिनी ॥ १० ॥
तम पिता के रूप में, रज माता के रूप में और सत्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित
है। इस प्रकार इन तीनों से संसार में मोहशालिनी यह सृष्टि प्रवर्तित हुई है। रज रक्त
रूप में विख्यात है और तम शुक्र के रूप में प्रतिष्ठित है। सत्व पवन रूप में कहा
गया है। इस तरह इस संसार में सृष्टि होने से इन तीनों रज, तम और सत्व की
शृङ्खला बनी हुई है।
रजः सूर्यः समाख्यातस्तमश्चैवं तु चन्द्रमाः ।
सत्त्वं पवनमित्याहुः संसारमोघमालिका ॥ ११ ॥
इसी प्रकार रज सूर्य के रूप में विख्यात है और तम चन्द्रमा के रूप में है
जबकि पवन के रूप में सत्व है। इससे संसार में अमोघ शृङ्खला चलिष्णु है।
रजः पृथ्वी समाख्याता तमश्चाकाशसम्भवम् ।
सत्त्वं पवनमित्युक्तं वर्तते मोघमालिनी ॥ १२ ॥
पुनः देखें कि रज पृथ्वी कही गई है और तम को आकाश तथा सत्व को पवन
कहा गया है। इस तरह यह पवन इस रज-तम की मोघमाला को वर्तता है अर्थात्
चलाता है।
रज आपस्तथा ख्याता तमस्तेजः समुद्भवम् ।
सत्त्वं मारुतमित्याहुस्त्रिभिः संसारसम्भवः ॥ १३ ॥
रज जो जल के रूप में विख्यात है और तम अग्नि के रूप में उद्भूत है। सत्व
मारुत के रूप में है। इन तीनों से ही यह संसार सम्भव हुआ है।
इच्छाशक्ती राजसी स्यात् तामसी तु क्रियात्मिका ।
सात्त्विकी ज्ञानशक्त्याख्या शम्भुसंसारसम्भवाः ॥ १४ ॥
इच्छा शक्ति को राजसी कहा है और क्रियात्मिका शक्ति को तामसी कहा है
जबकि ज्ञानशक्ति को सात्विकी कहा है जो शम्भू स्वरूप है और इन तीनों से ही
यह संसार हुआ है अर्थात् यह सृष्टि रचना हुई है।
शक्तिरूपे रजः ख्यातं शिवरूपे तमो मतम् ।
बीजरूपे स्थितं सत्त्वं त्रिभिः संसारसम्भवः ॥ १५ ॥
शक्ति रूप में रज विख्यात है और शिव रूप में तम विख्यात है, ऐसा समझें।
सूत्र- १७ 73
इनमें बीज रूप से सत्व स्थित है। इस प्रकार इन तीनों से इस संसार की उत्पत्ति
सम्भव हुई है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
सत्त्वरजस्तमोऽधिकारो नाम षोडश सूत्रम् ॥ 16 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सत्व-
रज-तम अधिकार नामक सोलहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 16 ॥
ग्रहादिध्रुवमण्डलं सप्तदश सूत्रम् ॥ 17 ॥
अपराजित उवाच -
कथं दिनं कथं रात्रिः संसारसृष्टिकोद्भवः ।
केन साऽऽक्रमते चेत्थं चन्द्रसूर्यभ्रमणे रता ॥ 1 ॥
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव ध्रुवाद्याश्च समस्तकाः ।
तेषां मृत्युः कथं प्रोक्तः कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥
अपराजित बोले – इस संसार में दिन कैसे उत्पन्न हुआ और रात्रि कैसे हुई
और किसके द्वारा इन चन्द्र-सूर्य को भ्रमण कराने में क्रम से शक्ति लगी हुई है ?
समस्त ग्रहों, नक्षत्रों और ध्रुवादिक की विलुप्ति कैसे होती है, इसे आप कृपापूर्वक
कहिए।
विश्वकर्मोवाच –
तेजसः काश्यपस्यर्कचन्द्रमृत्युसमुद्भवः ।
शिवशक्तिसमायोगात् संसारसृष्टिसम्भवः ॥ 3 ॥
शिवः सूर्यः शशी शक्तिः संसारसृष्टिकोद्भवः ।
दिवाकरः शिवो भूत्वा शशी चैव निशाकरः ॥ 4 ॥
दिवारात्रिसमायोगो योगश्च चन्द्रसूर्ययोः ।
तेजसो मृत्युसंयोगः संयोगः सृष्टिकारकः ॥ 5 ॥
विश्वकर्मा बोले – काश्यप के तेज से सूर्य-चन्द्र और मृत्यु समुद्भूत हुए।
शिव-शक्ति के सहयोग से ही यह सृष्टि सम्भव हुई है। शिव सूर्यरूप है और शक्ति
चन्द्ररूप, इन दोनों से सृष्टि उत्पन्न हुई और दिवाकर सूर्य होकर तथा निशाकर शक्ति
होकर दिन और रात्रि का समायोग करते हैं। यही योग सूर्य और चन्द्र दोनों का है।
इसी तरह तेजस से मृत्यु का संयोग होता है और इस संयोग को सृष्टिकारक भी
कहते हैं।
अथ सूर्यचन्द्रवंशानुकीर्तनम् —
सूर्यवंशोद्भवाश्चैव चन्द्रवंशोद्भवा नृपाः ।
प्रवर्तते मही राज्य नृपश्च पृथिवीपतिः ॥ 6 ॥
(प्रारम्भिक वंशों में) सूर्यवंश में उत्पन्न होने वाले राजाओं और चन्द्रवंश में
उत्पन्न होने वाले राजाओं ने इस पृथ्वी पर राज्य सञ्चालित किया और पृथिवीपति
कहलाए।
सूर्यवंशे पृथूराजा बुधः शशिकुलोद्भवः ।
सूर्यवंशसमृद्धौ तु क्षीयते सोमवंशकः ।
सोमवंशसमृद्धौ च क्षीयते सूर्यवंशकः ॥ 7 ॥
एकोत्तरशतं यावत् क्षीयते वंशकावुभौ ।
पृष्ठोरुस्पर्शभूतश्च सम्प्रवेत दूंसाधिपः ? ॥ 8 ॥
सूर्यवंश में राजा पृथु हुए और चन्द्रवंश में बुध राजा हुए। इस तरह जब-जब
सूर्यवंश समृद्ध हुआ तब-तब चन्द्रवंश क्षीण हुआ और जब चन्द्रवंश समृद्ध हुआ तो
सूर्यवंश क्षीण हुआ। इन दोनों ही वंशों में एक सौ एक वंशज जब तक क्षय होते हैं,
तब उनके पीछे, उरुस्पर्शभूत अर्थात् अन्य वंशों के विकास के साथ-अन्य नए
वंशाधिपति राजा होते हैं।
ब्रह्मापुत्रो मरीचिश्च तज्जातः कश्यपो मुनिः ।
सूर्यो जातः कश्यपाच्च सूर्यपुत्रो मनुस्तथा ॥ 9 ॥
मनोश्चैक्ष्वाकुरुत्पन्नस्ततश्च कुक्षिसम्भवः ।
कुक्षिपुत्रो विकुक्षिश्च विकुक्षेर्वेनसम्भवः ॥ 10 ॥
पितामह ब्रह्मा के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के कश्यप हुए जो मुनि हुए। कश्यप
मुनि के सूर्य हुए और सूर्य के पुत्र मनु हुए। मनु के इक्ष्वाकु उत्पन्न हुए और इक्ष्वाकु
के कुक्षिवान् हुए। कुक्षिवान के विकुक्षि हुए जबकि विकुक्षि के वेन नामक राजा
हुआ।¹
- चन्द्रगुप्त वेदालङ्कार ने अपने 'बृहत्तरभारत' में मेसोपोटामिया के सुमेर राजवंश और भारत के सूर्यवंशी
राजवंश का एक तुलनात्मक परिचय देते हुए लिखा है कि सुमेर-सुराष्ट्र भारत से गए व्यापारी थे जिनके
इतिहास में भारतीय राज्य के रूप में मेसोपोटामिया समाहित हुआ। इसी से वहाँ की वंशावली भारतीय
वंशावली ही है:—
सुमेरिया की वंशावली भारत की सूर्यवंशावली
1.................... 1. वैवस्वत मन
सूत्र- १७ 75
वेनो नाम महाराजो महावीर्यो महाबलः ।
शरीरमथनात्तस्य तथा पृथुः समुद्भवः ॥ 11 ॥
पृथुश्चैवं समुद्भूतस्तथा ख्यातः कुलाधिपः ।
रामश्च रघुवंशोऽभूत् सूर्यवंशे महाबलः ॥ 12 ॥
उक्त वेन नामक महाराजा महा पराक्रमी और महाबली थे। इनके शरीर के
मन्थन से पृथु का जन्म हुआ। पृथु से कई एक विख्यात राजा इस कुल में हुए।
सूर्यवंश में महा बलवान रघुवंश में राम का जन्म हुआ।
इत्यमनन्तरकेत्वादीनामाह —
सूर्यपुत्रः शनिजीतः केतुकश्च समुद्भव ?।
अष्टोत्तरशतं₁₀₈ चैव केतुकश्च ब्रह्मकोद्भवः ?( दण्डकौः ) ॥ 13 ॥
शम्भुतेजोभवं चोध्वं दृश्यते ज्ञानचक्षुषा।
(अब केतु व ग्रहादि के विषय में कहा जा रहा है) सूर्य के शनि नामक पुत्र
हुआ और केतु भी हुए। केतु ब्रह्मा से भी हुए। इनकी संख्या 108 हैं।¹ ये समस्त
केतु शम्भू के तेज से ऊँचे आकाश में ज्ञानचक्षु से ही दिखाई देते हैं, सामान्य आँखों
से नहीं।
2. उक्कुसी 2. इक्ष्वाकु
3. बकुस 3. विकुक्षि
4. पुनपुन 4. पुरञ्जय
5. (नक्ष) अनेना 5. अनेना (वेन)-पृथु.... राम
यह अनेना ही मेसोपोटामिया में ओनेस नाम से और भारत में वेन नाम से पुराणों में विख्यात हुआ है।
मेसोपोटामिया के बोगजकोई नामक स्थान पर वकुस (विकुक्षि) की विशाल मूर्ति चट्टान पर खुदी हुई
है जिसके एक हाथ में गेहूँ की बाली और दूसरे हाथ में हल धारण किया हुआ है। यह आर्यों का कृषि
प्रचार है। वहीं 1360 ई. पू. का मितन्नी राजा दशरथ और मिस्र के फराहों के बीच हुआ सन्धिनामा
लिखा हुआ शिलालेख ह्यूगोविकलर को खुदाई करते हुए मिला था जिसमें आर्यदेवता- मित्र, वरुण,
इन्द्र और नासत्य को साक्षी मानकर सन्धि की गई। ये लोग भारत से गए आर्य हैं। मोहनजोदाड़ा की
खुदाई से भी यही लगता है। (बृहत्तरभारत, गुरुकुल कांगड़ी, 1939, पृष्ठ 470)
- नारदीय मयूरचित्रकम् में सूर्यपुत्र केतु का वर्णन आया है जो मोती व सोने के समान पचीस संख्या
वाले, पूर्व या पश्चिम दिखाई देने वाले हैं जिनके उदय होने पर भय होता है— मुक्ता कनक संकाशाः
पञ्चविंशतिसंख्यकाः। प्राक् परस्याञ्च ते दृष्टाः सूर्यपुत्राः भयप्रदाः॥ (1, 6) 'ब्रह्मकोद्भव' या
'ब्रह्मदण्डको' भी केतु माने गए हैं जो ब्रह्मा के पुत्र हैं और क्रूर, तीन रङ्गवाले और तीन शिखा वाले
तथा क्षयकारी कहे गए हैं— क्रूरस्त्रिवर्णस्त्रिशिखः क्रूरो ब्रह्मसुतः स्मृतः। सर्वास्वाशासु संदृष्टो ब्रह्मदण्डः
क्षयावहः॥ (तत्रैव 1, 11) ग्रन्थकार ने यहाँ ब्रह्मा के पुत्र केतुओं की संख्या 108 बताई है जबकि
मयूरचित्रकम् में इनकी संख्या 204 दी गई है।