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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

सूत्र- १३ ६१
यावन्न चालयेद्योगी ह्यक्षसूत्रकरस्थितम्।
सप्तकोटिजपं कृत्वा हंसस्त्वेवं निवर्तते ॥ 15 ॥
एवं विश्वगतश्चारः प्राणिनां शुभदायकः।
हंसरूपे स्थिताः प्राणाः प्राणास्तत्त्वैः प्रकीर्तिताः ॥ 16 ॥
इस प्रकार के हंसयोग के जाप में योगी अपने हाथ में अक्षमाला नहीं चलाता
है तथापि उसके जाप सात करोड़ इस हंसत्व से पूरे निवर्त हो जाते हैं। इस प्रकार
का विश्वगत सञ्चार समस्त प्राणियों के लिए शुभदायक है। इसीलिए हंस रूप में इन
प्राणों के स्थित होने से ही इनको प्राणतत्त्व नाम से कहा गया है।
अथ हृदयकमलमाह —
हृदये सहजं पद्ममष्टपत्रं सबिन्दुकम्।
इच्छाशक्तिस्तथा मध्ये दलान्ते कुलदेवताः ॥ 17 ॥
शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः।
बीभत्साद्भुतशान्ताश्चाल्पाष्टौ ? कमले स्थिताः ॥ 18 ॥
कुलदेव्यष्टकोपेतमिच्छाशक्तिर्हदिस्थिता।
अब हृदय के भावों का विशेष परिचय दिया जा रहा है— हृदय में सहज ही
आठ पँखड़ियों और मध्य में बिन्दू युक्त कमल कहा गया है। इसमें बिन्दू रूप मध्य
में तो इच्छा शक्ति है और आठों दलों-पँखड़ियों में कुल देवता हैं। इस कमल में
(1.) शृङ्गार, (2.) हास्य, (3.) करुणा, (4.) रौद्र, (5.) वीर, (6.) भयानक,
(7.) वीभत्स, (8.) अद्भुत- ये आठ (अल्परूप से शान्त भी) रस और मध्य
बिन्दु में कुल देवियाँ भी स्थित हैं तथा इच्छा शक्ति भी हृदय में ही स्थित हैं।
ऊर्ध्वाकारैः स्थिता ख्यातेन्द्रियैर्बुद्धिरनुक्रमात् ॥ 19 ॥
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः।
मनो बुद्धिरहंकारः सत्त्वं रजस्तमस्तथा ॥ 20 ॥
इस हृदय में ही ऊर्ध्वाकार में स्थित इन्द्रियाँ भी बुद्धि के अनुक्रम में स्थित हैं।
इसी हृदय-कमल में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध तथा मन, बुद्धि और
आठवाँ अहङ्कार तथा सत्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण युक्त स्थित है।
कामः क्रोधश्च मोहश्च लोभो हर्षो मदो भयम्।
विषादश्चाष्टमः प्रोक्त इत्यष्टौ च गुणाः स्मृताः ॥ 21 ॥
इसी प्रकार हृदय कमल की अष्ट पँखड़ियों में ही काम, क्रोध, मोह, लोभ,
हर्ष, मद, भय और आठवाँ विषाद स्थित हैं। इन्हीं आठों को गुण भी कहा गया है।