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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 535 में से

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पृष्ठ 120

सूत्र-१६ 71
देव! यह संसार की सृष्टि शृङ्खला सत्व, रज, तम की किस प्रकार उत्पन्न हुई, इसके
विषय में आप कृपा करके कहिए।
विश्वकर्मोवाच —
उत्पत्तिर्जगतो हेतुर्निर्मिता किल विष्णुना।
स्रष्टा वै सर्वशिल्पाना शङ्खशार्ङ्गादिधारिणा ॥ ३॥
तत्रोद्भूतं रजः सत्त्वं तमश्चापि तृतीयकम्।
तदुद्भवा च सृष्टिस्तु जनसन्तानसन्ततिः ॥ ४॥
विश्वकर्मा बोले — जगत की उत्पत्ति के लिए ही शङ्ख, शार्ङ्गपाणि भगवान्
विष्णु ने इन सब सत्व, रज व तम का निर्माण किया है और वे विष्णु ही समस्त
शिल्पों के सृष्टा है। श्रीविष्णु भगवान् से ही सत्व, रज और तीसरा तम उत्पन्न हुआ
है और इनसे ही सृष्टि की जन सन्तान परम्परा का उद्भव हुआ है।
रजो ब्रह्मा तमो विष्णुः सत्त्वं चैव महेश्वरः।
ततस्त्रिकं समुत्पन्नं संसारसृष्टिकोद्भवम् ॥ ५॥
इस सृष्टिक्रम में रज ब्रह्मा स्वरूप, तम विष्णु स्वरूप और सत्व महेश्वर रूप है।
इस त्रिक् से समस्त संसार की सृष्टि का उद्भव हुआ है।
चतुरशीतिलक्षाणि जीवयोनिरनेकधा।
तमस्सतामसी शक्तिस्तपस्तेजोविवर्द्धिनी ॥ ६॥
चौरासी लाख की संख्या में अनेक प्रकार की जीव योनियाँ हैं। तम से उत्पन्न
होने वाली तामसी शक्ति तप और तेज को बढ़ाने वाली है।
रजसो राजसी ख्याता रजो ज्ञाने ब्रह्मात्मजा।
माया मोहश्च तत्कार्यं वैष्णवी मोहशालिनी ॥ ७॥
रजस से राजसी शक्ति विख्यात है। वह ब्रह्मात्मजा है और ज्ञान क्षेत्र का वर्द्धन
करने वाली है। भगवान् विष्णु से उत्पन्न होने वाली तामसी शक्ति मोहशालिनी है
और उसके कार्य माया और मोह है।
सत्त्वाच्च सात्त्विकी शक्तिः सत्त्वज्ञाने शिवात्मजा।
संसारप्रीतिमुक्तानां मोक्षदा सत्त्वसात्त्विकी ॥ ८॥
सत्त्वगुण से सात्विकी शक्ति शिव से उत्पन्न हुई है और सत्त्वज्ञान का वर्द्धन
करने वाली है। यह सत्त्वज्ञान शक्ति संसार की वासनाओं से मुक्तात्माओं को मोक्ष
प्रदान करने वाली है।