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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 535 में से

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पृष्ठ 124

सूत्र- १७ 75
वेनो नाम महाराजो महावीर्यो महाबलः ।
शरीरमथनात्तस्य तथा पृथुः समुद्भवः ॥ 11 ॥
पृथुश्चैवं समुद्भूतस्तथा ख्यातः कुलाधिपः ।
रामश्च रघुवंशोऽभूत् सूर्यवंशे महाबलः ॥ 12 ॥
उक्त वेन नामक महाराजा महा पराक्रमी और महाबली थे। इनके शरीर के
मन्थन से पृथु का जन्म हुआ। पृथु से कई एक विख्यात राजा इस कुल में हुए।
सूर्यवंश में महा बलवान रघुवंश में राम का जन्म हुआ।
इत्यमनन्तरकेत्वादीनामाह —
सूर्यपुत्रः शनिजीतः केतुकश्च समुद्भव ?।
अष्टोत्तरशतं₁₀₈ चैव केतुकश्च ब्रह्मकोद्भवः ?( दण्डकौः ) ॥ 13 ॥
शम्भुतेजोभवं चोध्वं दृश्यते ज्ञानचक्षुषा।
(अब केतु व ग्रहादि के विषय में कहा जा रहा है) सूर्य के शनि नामक पुत्र
हुआ और केतु भी हुए। केतु ब्रह्मा से भी हुए। इनकी संख्या 108 हैं।¹ ये समस्त
केतु शम्भू के तेज से ऊँचे आकाश में ज्ञानचक्षु से ही दिखाई देते हैं, सामान्य आँखों
से नहीं।
2. उक्कुसी 2. इक्ष्वाकु
3. बकुस 3. विकुक्षि
4. पुनपुन 4. पुरञ्जय
5. (नक्ष) अनेना 5. अनेना (वेन)-पृथु.... राम
यह अनेना ही मेसोपोटामिया में ओनेस नाम से और भारत में वेन नाम से पुराणों में विख्यात हुआ है।
मेसोपोटामिया के बोगजकोई नामक स्थान पर वकुस (विकुक्षि) की विशाल मूर्ति चट्टान पर खुदी हुई
है जिसके एक हाथ में गेहूँ की बाली और दूसरे हाथ में हल धारण किया हुआ है। यह आर्यों का कृषि
प्रचार है। वहीं 1360 ई. पू. का मितन्नी राजा दशरथ और मिस्र के फराहों के बीच हुआ सन्धिनामा
लिखा हुआ शिलालेख ह्यूगोविकलर को खुदाई करते हुए मिला था जिसमें आर्यदेवता- मित्र, वरुण,
इन्द्र और नासत्य को साक्षी मानकर सन्धि की गई। ये लोग भारत से गए आर्य हैं। मोहनजोदाड़ा की
खुदाई से भी यही लगता है। (बृहत्तरभारत, गुरुकुल कांगड़ी, 1939, पृष्ठ 470)

  1. नारदीय मयूरचित्रकम् में सूर्यपुत्र केतु का वर्णन आया है जो मोती व सोने के समान पचीस संख्या
    वाले, पूर्व या पश्चिम दिखाई देने वाले हैं जिनके उदय होने पर भय होता है— मुक्ता कनक संकाशाः
    पञ्चविंशतिसंख्यकाः। प्राक् परस्याञ्च ते दृष्टाः सूर्यपुत्राः भयप्रदाः॥ (1, 6) 'ब्रह्मकोद्भव' या
    'ब्रह्मदण्डको' भी केतु माने गए हैं जो ब्रह्मा के पुत्र हैं और क्रूर, तीन रङ्गवाले और तीन शिखा वाले
    तथा क्षयकारी कहे गए हैं— क्रूरस्त्रिवर्णस्त्रिशिखः क्रूरो ब्रह्मसुतः स्मृतः। सर्वास्वाशासु संदृष्टो ब्रह्मदण्डः
    क्षयावहः॥ (तत्रैव 1, 11) ग्रन्थकार ने यहाँ ब्रह्मा के पुत्र केतुओं की संख्या 108 बताई है जबकि
    मयूरचित्रकम् में इनकी संख्या 204 दी गई है।