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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 535 में से

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पृष्ठ 463

418 अपराजितपृच्छा
नन्दे च द्वादशकराः शङ्करे च त्रयोदश।
एवमादिगुणोपेतो वृत्तकूपा दशोत्तमाः ॥ 7 ॥
इति दशकूपाः।
इनमें से श्रीमुख कूप 4 गज का चौड़ा, विजय कूप 5 गज का चौड़ा, प्रान्त कूप
6 गज का, दुन्दुभि 7 गज का, मनोहर 8 गज का, चूड़ामणि 9 गज का, दिग्भद्र 10
गज, जय 11 गज का, नन्द 12 गज का और शङ्कर 13 गज का होता है। इस प्रकार
से दस वृत्त कूपों के आदि से गुणों को बताया गया है।¹
कूपिका सफलमाह –
शेषास्तु कूपिका वत्स त्रिहस्ताश्चादिमादधः।
द्विहस्ता वै प्रशस्ताश्च कर्त्तव्याः सर्वकामदाः ॥ 8 ॥
हे वत्स ! शेष तो छोटी कूपिकाएँ (कुइयाँ) कहलाती है जो 3 गज की चौड़ाई
से भी कम की होती जाती हैं। इनमें 3 गज वाली, 2 गज वाली आदि कूपिकाओं में
दो गज की चौड़ाई वाली कूपिकाएँ सभी काम में शुभ होती हैं। अस्तु, उन्हें कर्तव्य
समझ कर बनाएँ²
अथ चतुर्वाप्यः –
नन्दा भद्रा जया चैव चतुर्थी विजया तथा।
एकवक्त्रा त्रिकूटा च नन्दा नाम वरप्रदा ॥ 9 ॥
चार प्रकार की वापी या बावडियाँ होती हैं— (1.) नन्दा (2.) भद्रा (3.)
जया (4.) विजया। इनमें से 'नन्दा' वापी एकमुखी होती है और तीन ओर से कूट
अर्थात् बन्द होती है। इस तरह नन्दा नाम की वापी नामानुसार वरप्रदायक है।

  1. अल्प विस्तार से जहाँ मण्डलाकृति में भूमि को खोदा जाता है और जिस गर्त में पानी मिलता है, वह
    चाहे पक्का बन्धा हुआ हो या निर्बन्ध हो, 'कूप' कहा जाता है— भूमौ खातोऽल्पविस्तारो गम्भीरो
    मण्डलाकृतिः। बद्धोऽबद्धः स कूपः स्यात्तदम्भः कौपमुच्यते ॥ (भावप्रकाश) इसी प्रकार राजवल्लभ. में
    आया है— कूपाः श्रीमुखवैजयोऽपि तदनु प्रान्तस्तथा दुन्दुभिस्तस्मादेव मनोहरश्च परतः प्रोक्तस्तु
    चूडामणिः। दिग्भद्रो जयनन्दशङ्करमतो वेदादिहस्तैर्मिता विश्रान्तैः क्रमवर्द्धितैश्च कथिता वेदादधः
    कूपिका॥ (राजवल्लभ : चक्रपाणिमिश्र, 4, 27)
    विश्वकर्मीय दीपार्णव में कहा गया है— चतुर्हस्ताद्द्विकैका यावत् हस्त त्रयोदश। श्रीमुखो विजय चैव
    प्रान्तो दुन्दुभि श्रीमनोहरः ॥ चूडामणि दिग्भद्रो जया नन्दस्तु शङ्करः। श्रीमुखो चतुर्हस्ताद्य शङ्करस्य
    त्रयोदश॥ एव नामा द्विगुणोपेत वृत्तकूपादशोगमा। सङ्ख्याहस्तद्वयं कुर्यात् कूपिका नामतद्भवेत् ॥
    (दीपार्णव उत्तर. 18, 2-4)
  2. गर्त, कूपिका, कुल्या, आलवाल आदि बिना मान के होते हैं—भवन्ति गर्तानि च कूपिकाश्च
    कुल्यालवालादि विनैव मानम्॥ (विश्ववल्लभ 2, 15)