अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७४ 419
द्विवक्त्रा च षट्कूटा भद्रा नाम सुशोभिता।
त्रिवक्त्रा नवकूटा च जया वै देवदुर्लभा ॥ 10 ॥
दूसरी 'भद्रा' नामक वापी के दो ओर मुख होते हैं अर्थात् उसमें दो ओर से
आवागमन होता है, उनके छह ओर से रोक होती है— इस प्रकार भद्रा सुशोभित
है।¹ तीन ओर के आवागमन या मार्ग के मुखों वाली तीसरी 'जया' नामक वापी के
नौ ओर रोक होती है। यह बड़ी ही उत्तम होती है। देवताओं को भी ऐसी वापी
दुर्लभ मानी जाती है।
चतुर्वक्त्रा सूर्यकूटा विजया सर्वतोमुखी।
वाप्यश्च कथिता वत्स कुण्डानि शृणु सम्प्रति ॥ 11 ॥
इति चतुर्वाप्यः।
'विजया' वापी के चारों और मुख होते हैं अर्थात् आवागमन योग्य सीढ़ियाँ
होती हैं जिसके बारह रोक होती है²— ऐसे हे वत्स! मैंने बावड़ियों के बारे में
कहा। अब तुम कुण्डों के बारे में सुनो।
चतुर्विधकुण्डानि —
भद्रकं सुभद्रकं च नन्दाख्यं परिघं तथा।
कुण्डानि देवताग्रेषु कार्याणि शान्तिमिच्छता ॥ 12 ॥
(1.) भद्रक, (2.) सुभद्रक, (3.) नन्दाख्य व (4.) परिघ— ये चार प्रकार
के कुण्ड होते हैं, शान्ति के इच्छुकों को इनको देवमन्दिरों के आगे बनाना चाहिए।¹
चतुरस्रं भद्रकं स्यात् सुभद्रं भद्रसंयुतम्।
नन्दाख्यं प्रतिभद्रेषु परिघं मध्यभिट्टकम् ॥ 13 ॥
भद्रक कुण्ड चौकोर होता है और सुभद्र कुण्ड के चारों ओर दीवारें या भद्र
होते हैं। नन्दाख्य कुण्ड के भी प्रतिभद्र होती है और परिघ कुण्ड के मध्य में भिट्ट
- राजवल्लभ में कहा गया है— भद्राख्यकुण्डं चतुरस्रकं च सुभद्रकं भद्रयुतं द्वितीयम्। नन्दाख्यकं स्यात्
प्रतिभद्रयुक्तं मध्ये सभिट्टं परिघं चतुर्थम्॥ (राजवल्लभ. 4, 31) दीपार्णव में कहा गया है— कुण्डानां
लक्षणं चैव चतुर्विध मुदाहृतः ॥ चतुरश्र भद्रकं नाम सुभद्र भद्रसंयुत। नन्दा क्षौ प्रतिभद्रेषु परिघो
मध्यभिट्टोद्भवं ॥ प्रवेशा निर्गमा चैव कर्तव्यास्तेरनेकधाः । (दीपार्णव 18, 7-9) - राजवल्लभ में कहा गया है—वापी च नन्दैकमुखी त्रिकूटा षट्कूटिका युग्ममुखा च भद्रा। जया त्रिवक्त्रा
नवकूटयुक्तास्त्वर्कैस्तु कूटैर्विजया मता सा॥ (वही 4, 28) अपराजित के अनुसार ही दीपार्णव में
वापियों के लक्षण व भेद इस प्रकार स्पष्ट किए गए हैं— एक वक्त्रां त्रिकूटाश्चं नन्दा नाम वरप्रदा।
द्विवक्त्रा षटकूटाश्च भद्रा नाम सुशोभना॥ त्रिवक्त्रा नवकूटाश्च जयास्तु देवदुर्लभा। चर्तुवक्त्रा द्वादशकूटा
विजया सर्वतो मुख ॥ चतुर्वापि भवेत्प्राज्ञ नन्दाद्या शुभलक्षणम् ॥ (दीपार्णव 18, 5-7)