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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 535 में से

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पृष्ठ 462

सूत्र-७४ 417
वापीकूपतडादिनिर्णयो नाम चतुःसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 74 ॥
विश्वकर्मोवाच —
पुरस्य बाह्याभ्यन्तरे विविधाः स्युर्जलाशयाः ।
वापी-कूप-तडागानि कुण्डानि विविधानि च ॥ 1 ॥
विश्वकर्मा बोले कि नगर के बाहर और अन्दर की ओर भी विविध प्रकार के
जलाशयों की व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि जैसा कहा है कि जल ही जीवन है
अस्तु, वहाँ वापी, कूप, तड़ाग, कुण्ड आदि विविध प्रकार के जलस्रोत बनाएँ।¹
दश₁₀ कूपांश्चतु₄र्वाप्यश्चत्वारि₄ कुण्डकानि च।
तडागाः षड्विधाश्चैव₆ कथयाम्यपराजित ॥ 2 ॥
हे अपराजित ! अब मैं तुम्हें दस प्रकार के कूप, चार प्रकार की वापियाँ, चार
प्रकार के कुण्डों और छह प्रकार के तड़ागों के बारे में कहता हूँ।
दशविध कूपमाह —
श्रीमुखो विजयः प्रान्तो दुन्दुभिश्च मनोहरः ।
चूडामणिश्च दिग्भद्रो जयो नन्दश्च शङ्करः ॥ 3 ॥
चतुर्हस्तादितो वृद्ध्यार्वद्धस्तस्त्रयोदशम् ।
श्रीमुखाद्याः शङ्करान्ता दश कूपाः प्रकीर्तिताः ॥ 4 ॥
(1.) श्रीमुख, (2.) विजय, (3.) प्रान्त, (4.) दुन्दुभि, (5.) मनोहर, (6.)
चूडामणि, (7.) दिग्भद्र, (8.) जय, (9.) नन्द और (10.) शङ्कर— ये चार गज
की चौड़ाई से लेकर क्रमशः एक-एक बढ़ते-बढ़ते तेरह गज की चौड़ाई के
श्रीमुखादि से शङ्करान्त दस प्रकार के कूपों के लक्षण बताए गए हैं।²
चतुर्हस्तः श्रीमुखः स्याद् विजयः पञ्चहस्तकः ।
षड्भिर्हस्तैर्भवेत् प्रान्तो दुन्दुभिः सप्तहस्तकः ॥ 5 ॥
मनोहरश्चाष्टहस्तश्चूडामणिर्नवकरः ।
दिग्भद्रो दशहस्तश्च ह्येकादशकरो जयः ॥ 6 ॥

  1. आदित्यपुराण में आए इसी प्रकार के वचनों को जलाशयतत्त्व में उद्धृत किया गया हैं— सेतुबन्धरता ये
    च तीर्थशौचरताश्च ये। तडागकूपकर्त्तारो मुच्यन्ते ते तृषाभयात्॥ (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 2, पृष्ठ 170)
    विष्णुधर्मोत्तर में कहा गया है कि जो तडाग, कूप को बनवाता है, कन्यादान करता है, छत्र, उपानह देता
    है वह व्यक्ति स्वर्ग को जाता है— तडागकूपकर्त्तारस्तथा कन्या प्रदायिनः। छत्रोपानहदातारन्ते नराः
    स्वर्गगामिनः॥ (तत्रैवोद्धृत)
  2. चक्रपाणि मिश्र ने भी कहा है— श्रीमुखो विजयः प्रान्तो दुन्दुभिश्च मनोहरः। चूडामणिश्च भद्रो जयो
    नन्दश्च शङ्कर॥ आरभ्य यावच्चतुष्करं ते व्यासेक्रमादेकक साभिवृद्ध्या। (विश्ववल्लभ 2, 14-15)