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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 535 में से

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पृष्ठ 461

416 अपराजितपृच्छा
इत्यादिसप्तदोषांश्च वर्जयेत् पुरदोषदान्।
विंशतिः सुखदाः ख्याता दोषदाः सप्त एव च ॥ 25 ॥
इस प्रकार उक्त सात पुरों के दोष होते हैं। अस्तु, इन आकारों में पुरों का
निवेशन वर्जित जानना चाहिए। यहाँ प्रजा हितावह पुरों की विंशति और सात
दोषकारक पुरों का वर्णन किया गया।
अथाकारानुसारेण पुरग्रामादीनां प्रमाणमाह —
पुरार्धेन भवेद् ग्रामो ग्रामार्धेन तु खेटकम्।
खेटकार्धेन भवेत् कूटं कूटार्धेन तु कर्वटम् ॥ 26 ॥
अब विविध नामों के आकार प्रमाण कहता हूँ। पुर के आधे भाग पर बसी हुई
बस्ती को ग्राम और ग्राम के आधे को खेटक कहा जाता है। खेट के आधे को कूट
और कूट का आधा कर्वट कहलाता है।¹
पुरे सप्तदश मार्गा ग्रामो वै नवमार्गतः ।
खेटके पञ्च मार्गाः स्युस्त्रिभिर्मार्गैश्च कूटकम् ॥ 27 ॥
पुर नामक बस्ती में 17 सड़कें होती हैं जबकि ग्राम में 9 सड़कें ही होती हैं।
खेटक में 5 मार्ग होते हैं और कूट में केवल 3 ही मार्ग होते हैं।
द्वौ मार्गौ कर्वटे ख्यातौ छन्दाः पञ्च प्रकीर्तिताः ।
पुर-ग्राम-खेटकं च कूटं च कर्वटाभिधम् ॥ 28 ॥
इसी प्रकार कर्वट में तो 2 मार्ग ही होते हैं। इस तरह इनके ये पाँच छन्द—पुर,
ग्राम, खेटक, कूट और कर्वट नाम से बताए गए हैं।²
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
पुरलक्षणाधिकारो नाम त्रिसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 73 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में पुर लक्षण
अधिकार नामक तिहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 73 ॥

  1. अग्निपुराण में ग्राम बस्तियों का विस्तार 100 धनुषों के बराबर कहा गया है। नगर का विस्तार उससे
    दुगुना अथवा तिगुना माना गया है— धनुः शतं परीणाहो ग्रामस्य तु समन्ततः ॥ द्विगुणं त्रिगुणं वाऽपि
    नगरस्य च कल्पयेत् । (अग्नि. 227, 19-20)
  2. समराङ्गणसूत्रधार में कहा गया है— खेटं तदर्धविष्कम्भामाहुर्ग्रामं तदर्धतः । योजनने पुरात् खेटं खेटाद्
    ग्रामं प्रचक्षते। गव्यूतिपरिमाणेन ग्रामाद् ग्रामं प्रचक्षते ॥ द्विक्रोशाद् विषये सीमा तदर्धेन पुरस्य सा। खेटके
    पुरसीमार्थं ग्रामे खेटार्धतः स्मृता ॥ त्रिंशद्धनूंषि विष्कम्भः पुरे दिग्वर्त्मसु स्मृतः । विंशति खेटके मार्गो ग्रामे
    दश च दर्शितः ॥ (समराङ्गण. 10, 79-82)