आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधीरानंद- ‘‘वहां एक परम सुंदरी रहती है?’’
भवानंद- कुछ विस्मित भी हुए डरे भी। बोले- ‘‘यह सब कैसी बाते है?’’
धीरानंद- ‘‘आप उसके साथ मुलाकात की थी?’’
भवानंद- ‘‘हसके बाद?’’
धीरानंद- ‘‘आप उस कामिनी के प्रति अति अनुरक्त है?’’
भवानंद- ‘‘(कुछ विचारकर) धीरानंद! तुमने क्यो इतनी खोज-बीन की। देखो धीरानंद! तुम जो कुछ कह
रहे हो, सब सच है। लेकिन तुम्हारे अतिरिक्त कितने लोग यह बात जानते है?’’
धीरानंद- ‘‘और कोई नही।’’
भवानंद- ‘‘तब तुम्हारा बध करने से ही मै मुक्त हो सकता हूँ।’’
धीरानंद- ‘‘कर सकते हो?’’
भवानंद- ‘‘तब आओ, इस निर्जन स्थान मे ही युद्ध करे। हो सकता तो मै तुम्हारा बध कर कलंक से बचूं या
तुम मेरा बध कर दो, ताकि सारी ज्वालाओ मे मेरी मुक्ति हो जाए। बोलो, पास मे अस्त्र है?’’
धीरानंद- ‘‘है! खाली हाथ किसकी मजाल है कि तुम्हारे सामने यह बाते करे। यदि युद्ध की ही तुम्हारी इच्छा
है तो वही सही, पर संतान-संतान मे विरोध निषिद्ध है किन्तु आत्महत्या के लिए किसी के साथ भी युद्ध करने
मे हर्ज नही। जो बात कहने के लिए मै तुम्हे खोज रहा था, क्या वह सब सुन लेने पर युद्ध करना अच्छा न
होगा?’’
भवानंद- ‘‘हर्ज क्यो है कहो!’’
भवानंद ने तलवार निकाल कर धीरानंद के कंधे पर रख दी। धीरानंद भागे नही।
धीरानंद- ‘‘मै यह कह रहा था कि तुम कल्याणी से विवाह कर लो।’’
भवानंद- ‘‘कल्याणी यह! भी जानते हो?’’
धीरानंद- ‘‘विवाह क्यों नही कर लेते?’’
भवानंद- ‘‘उसके तो पति जीवित है‘‘
धीरानंद- ‘‘वैष्णो का ऐसा विवाह होता है।’’
भवानंद- ‘‘यह नीच वैरागियो की बात है-संतानो मे नही। संतान की शादी नही होती।’’
धीरानंद- ‘‘संतान-धर्म क्या अपरिहार्य है? तुम्हारे तो प्राण जा रहे है। छिः! छिः! मेरा कंधा न कट गया।’’
(वस्तुतः धीरानंद के कंधे से रक्त निकल रहा था।)
भवानंद- ‘‘तुम किसलिए मुझे यह अधर्म-मति देने आए हो? अवश्य ही तुम्हारा कोई स्वार्थ है!‘‘
धीरानंद- ‘‘वह भी कहने की इच्छा है। तलवार न धंसना, बताता हूं। इस संतान-धर्म ने मेरी हड्डियो को
जर्जर कर दिया है। मै इसका परित्याग कर स्त्री-पुत्र का मुंह देखकर दिन बिताने के लिए उतावला हो रहा हूं।
मै इस संतान-धर्म का परित्याग करूंगा। लेकिन क्या मेरे लिए घर जाकर बैठने का अवसर है। विद्रोही के रूप
मे अनेक लोग मुझे पहचानते है। घर जाकर बैठते ही शायद राजपुरुष सर उतार ले जाएंगे। अथवा सन्तान लोग
ही विश्वासघात समझकर मार डालेगे। इसीलिए तुम्हे भी अपना साथी बना लेना चाहता है।‘‘ भवानन्द-‘‘क्यो,
मुझे क्यो?‘‘
धीरानन्द- ‘‘यही असली बात है। सन्तान गण तुम्हारे अधीन है। सत्यानन्द अभी यहां है नही; इनके नायक
हो तुम। इस सेना को लेकर युद्ध करो, तुम्हारी विजय होगी, इसका मुझे विश्वास है। युद्ध मे विजय प्राप्त कर
क्यो नही तुम अपने नाम से एक राज्य स्थापित करते? सेना तो तुम्हारी आज्ञाकारिणी है। तुम राजा हो, कल्याणी