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सर्वकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 78 में से

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पृष्ठ 54

है। ऐसी रूपराशि जीवन मे कभी देखूंगा, यदि यह जानता तो कभी सन्तान-धर्म ग्रहण न करता। यह धर्म इस
अग्नि मे जलकर क्षार हो जाता है। धर्म जल गया है-प्राण है। आज चार वर्षों से प्राण भी जल रहा है, बचना
नही चाहता। दाह! कल्याणी! दाह! ज्वाला! लेकिन जलने वाला, ईंधन अब बच नही गया है। प्राण जा रहा है।
चार बरस से सह रहा हूं; अब सहा नही जाता। क्या तुम मेरी होगी?’’
कल्याणी-‘‘तुम्हारे ही मुंह से सुना है कि सन्तान-धर्म का एक यह भी नियम है कि जिसकी इन्द्रिय परवश
हो जाए, उसका प्रायश्चित मृत्यु है। क्या यह सच है?’’
भवानन्द-‘‘यह सच है।’’
कल्याणी-‘‘तो तुम्हारे लिए भी वही प्रायश्चित मृत्यु है?’’
भवानन्द-‘‘मेरे लिए एकमात्र प्रायश्चित मृत्यु है।’’
कल्याणी-‘‘तुम्हारी मनोकामना पूरी होने पर मरोगे?’’
भवानन्द-‘‘निश्चय मरूंगा!’’
कल्याणी-‘‘और यदि मै मनोकामना पूरी न करूं?’’
भवानन्द-‘‘तब भी मृत्यु निश्चय है। कारण, मेरी इन्द्रियां परवश हो चुकी है। आगामी युद्ध मे.....’’
कल्याणी-‘‘तुम अब विदा हो! मेरी कन्या भिजवा दोगे?’’
भवानन्द ने आंसू भरी आंखो से कहा-‘‘भिजवा दूंगा। क्या मेरे जाने पर भी मुझे हृदय मे याद रखोगी?’’
कल्याणी-‘‘याद रखूंगी-ब्रम्हच्युत विधर्मी के रूप मे याद रखूंगी।’’
भवानन्द विदा हुए। कल्याणी पुस्तक पढ़ने लगी।
भवानन्द विचार-सागर मे गोते लगाते हुए मठ की तरफ चले। वे राह मे अकेले चले आ रहे थे। वन मे भी
अकेले ही उन्होंने प्रवेश किया। अब उन्होने देखा कि वन मे उनके आगे-आगे एक आदमी चला जा रहा है।
भवानन्द ने पूछा-‘‘कौन हो भाई?‘‘
अग्रगामी व्यक्ति ने कहा-‘‘जानना चाहते हो? उत्तर देता हूं-एक पथिक‘‘
भावानन्द-‘‘वन्दे-‘‘
वह आदमी बोला-‘’मातरम् ।‘‘
भवानन्द-‘‘मै भवानन्द स्वामी हूं ।‘‘
अग्रगामी-‘‘मै धीरानंद ।‘‘
भवानन्द-‘‘धीरानंद! कहां गये थे?‘‘
धीरानंद-‘‘आपकी ही खोज मे ।‘‘
भवानन्द-‘‘क्यो?‘‘
धीरानंद-‘‘एक बात कहने ।‘‘
भवानन्द-‘‘कौन-सी बात?‘‘
धीरानंद-‘‘अकेले मे कहने की है ।‘‘
भवानन्द-‘‘यही बताओ न, यह तो निर्जन स्थान है ।‘‘
धीरानंद- ‘‘ आप नगर मे गए थे‘‘
भवानंद- ‘‘हाँ ।‘‘
धीरानंद- ‘‘गौरी के घर?‘‘
भवानंद- ‘‘तुम भी नगर मे गए थे क्या?‘‘