आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
प्रस्तावना एवं अकाल की पृष्ठभूमि
जन्म : 27 जून 1833 (उत्तर 24 परगना, प. बंगाल)
भाषा : बांग्ला
विधाएँ : उपन्यास, वैचारिक लेख, कविता, व्यंग्य
प्रमुख कृतियाँ: उपन्यास : आनंदमठ, दुर्गेशनंदिनी, कपालकुंडला,
मृणालिनी, कृष्णकांत का वसीयतनामा, देवी चौधरानी
निबंध संग्रह : लोक रहस्य, विज्ञान रहस्य, विचित्र प्रबंध, साम्य
कविता संग्रह : ललिता ओ मानस
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय
निधन : 8 अप्रैल 1894
आनंदमठ
संन्यासी आंदोलन और बंगाल अकाल की पृष्ठभूमि पर लिखी गई बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की कालजयी कृति
‘आनंदमठ' सन 1882 ई. मे छप कर आई। इस उपन्यास की क्रांतिकारी विचारधारा ने सामाजिक व राजनीतिक
चेतना को जागृत करने का काम किया। इसी उपन्यास के एक गीत 'वंदेमातरम' को बाद मे राष्ट्रगीत का दर्जा
प्राप्त हुआ।
'आनंदमठ' मे जिस काल खंड का वर्णन किया गया है वह हन्टर की ऐतिहासिक कृति ‘एन्नल ऑफ
रूरल बंगाल', ग्लेग की 'मेम्वाइर ऑफ द लाइफ ऑफ वारेन हेस्टिंग्स' और उस समय के ऐतिहासिक
दस्तावेज मे शामिल तथ्यो मे काफी समानता है।
बहुत विस्तृत जंगल है। इस जंगल मे अधिकांश वृक्ष शाल के हैं, इसके अतिरिक्त और भी अनेक प्रकार के
है। फुनगी-फुनगी, पत्ती-पत्ती से मिले हुए वृक्षो की अनंत श्रेणी दूर तक चली गई है। घने झुरमुट के कारण
आलोक प्रवेश का हरेक रास्ता बंद है। इस तरह पल्लवो का आनंद समुद्र कोस-दर-कोस--सैकड़ों-हजारो
कोस मे फैला हुआ है, वायु की झकझोर झोके से बह रही है। नीचे घना अंधेरा, माध्याह्न के समय भी प्रकाश
नही आता-- भयानक दृश्य ! उत्सव जंगल के भीतर मनुष्य प्रवेश तक नही कर सकते, केवल पत्ते की मर्मर
ध्वनि और पशु-पक्षियो की आवाज के अतिरिक्त वहां और कुछ भी नही सुनाई पड़ता।
एक तो यह अति विस्तृत, अगम्य, अंधकारमय जंगल, उस पर रात्रि का समय ! पतंग उस जंगल मे रहते है
लेकिन कोई चूं तक नही बोलता है। शब्दमयी पृथ्वी की निस्तब्धता का अनुमान किया नही जा सकता है;
लेकिन उस अनंत शून्य जंगल के सूची-भेद्य अंधकार का अनुभव किया जा सकता है। सहसा इस रात के समय
की भयानक निस्तब्धता को भेदकर ध्वनि आई-- ‘‘मेरा मनोरथ क्या सिद्ध न होगा ।.........'’
इस तरह तीन बार वह निस्तब्ध-अंधकार अलोड़ित हुआ- 'तुम्हारा क्या प्रण है ?'
उत्तर मिला- “मेरा प्रण ही जीवन-सर्वस्व है?"
प्रति शब्द हुआ- “जीवन तो तुच्छ है, सब इसका त्याग कर सकते है !"
“तब और क्या है....और क्या होना चाहिए?'
उत्तर मिला- “भक्ति!"
“बंगाब्द सन् 1176 के गरमी के महीने मे एक दिन, पदचिन्ह नामक एक गांव मे बड़ी भयानक गरमी थी। गांव
घरो से भरा हुआ था, लेकिन मनुष्य दिखाई नही देते थे। बाजार मे कतार-पर-कतार दुकाने विस्तृत बाजार मे
लंबी-चौड़ी सड़के, गलियो मे सैकड़ो मिट्टी के पवित्र गृह, बीच-बीच मे ऊंची-नीची अट्टालिकाएं थी। आज
सब नीरव हैं; दुकानदार कहां भागे हुए है, कोई पता नही। बाजार का दिन है, लेकिन बाजार लगा नही है, शून्य
है। भिक्षा का दिन है, लेकिन भिक्षुक बाहर दिखाई नही पड़ते। जुलाहे अपने करघे बंद कर घर मे पड़े रो रहे
है। व्यवसायी अपना रोजगार भूलकर बच्चो को गोद मे लेकर विह्वल है। दाताओ ने दान बंद कर दिया है,
अध्यापको ने पाठशाला बंद कर दी है, शायद बच्चे भी साहसपूर्वक रोते नही है। राजपथ पर भीड़ नही दिखाई
देती, सरोवर पर स्नानाथिर्यो की भीड़ नही है, गृह-द्वार पर मनुष्य दिखाई नही पड़ते हैं, वृक्षो पर पक्षी दिखाई
नही पड़ते, चरनेवाली गौंओ के दर्शन मिलते नही हैं, केवल श्मशान मे स्यार और कुत्ते हैं, एक बहुत बड़ी
आट्टालिका है, उसकी ऊंची चहारदीवारी और गगन-चुंबी गुंबद दूर से दिखाई पड़ते हैं। वह अट्टालिका उस
गृह-जंगल मे शैल-शिखर-सी दिखाई पड़ती है। उसकी शोभा का क्या कहना हैं- लेकिन उसके दरवाजे बंद
हैं, गृह मनुष्य-समागम से शून्य है, वायु-प्रवेश मे भी असुविधा है। उस घर के अंदर दिन-दोपहर के समय
अंधेरा हैं; अंधकार मे रात के समय एक कमरे मे, फू ले हुए दो पुष्पो की तरह एक दंपति बैठे हुए चिंतामग्न
हैं। उनके सामने अकाल का भीषण रूप है।
1174 मे फसल अच्छी नही हुई, अत: ग्यारह सौ पचहत्तर मे अकाल आ पड़ा- भारतवासियो पर संकट आया।
लेकिन इस पर भी शासको ने पैसा-पैसा, कौड़ी-कौड़ी वसूल कर ली। दरिद्र जनता ने कौड़ी-कौड़ी करके
मालगुजारी अदा कर दिन मे एक ही बार भोजन किया। ग्यारह सौ पचहत्तर बंगाब्द की बरसात मे अच्छी वर्षा
हुई। लोगो ने समझा कि शायद देवता प्रसन्न हुए। आनंद में फिर मठ-मंदिरो मे गाना-बजाना शुरू हुआ,
किसान की स्त्री ने अपने पति से चांदी के पाजेब के लिए फिर तकाजा शुरू किया। लेकिन अकस्मात आश्विन
मास मे फिर देवता विमुख हो गए। अग्र-कार्तिक मे एक बूंद भी बरसात न हुई। खेतो मे धान के पौधे सूखकर
खंखड़ हो गए। जिसके दो-एक बीघे मे धान हुआ भी तो राजा ने अपनी सेना के लिए उसे खरीद लिया, जनता
भोजन पा न सकी। पहले एक संध्या को उपवास हुआ, फिर एक समय भी आधा पेट भोजन उन मिलने लगा,
इसका बाद दो-दो संध्या उपवास होने लगा। चैत मे जो कुछ फसल हुई वह किसी के एक ग्रास भर को भी न
हुई। लेकिन मालगुजारी के अफसर मुहम्मद रजा खां ने मन मे सोचा कि यही समय है, मेरे तपने का। एकदम
उसने दश प्रतिशत मालगुजारी बढ़ा दी। बंगाल मे घर-घर कोहराम मच गया।
पहले लोगो ने भीख मांगना शुरू किया, इसके बाद कौन भिक्षा देता है? उपवास शुरू हो गया। फिर जनता
रोगाक्रांत होने लगी। गो, बैल, हल बेचे गए, बीज के लिए संचित अन्न खा गए, घर-बार बेचा, खेती-बारी
बेची। इसके बाद लोगो ने लड़कियां बेचना शुरू किया, फिर लड़के बेचे जाने लगे, इसको बाद गृहलक्षिमयो
का विक्रय प्रारंभ हुआ। लेकिन इसके बाद, लड़की, लड़के औंरते कौन खरीदता? बेचना सब चाहते थे लेकिन
खरीदार कोई नही। खाद्य के अभाव मे लोग पेड़ो के पत्ते खाने लगे, घास खाना शुरू किया, नरस टहनियां
खाने लगे। छोटी जाति की जनता और जंगली लोग कुत्ते, बिल्ली, चूहे खाने लगे। बहुतेरे लोग भागे, वे लोग
विदेश मे जाकर अनाहार से मरे। जो नही भागे, वे अखाद्य खाकर, उपवास और रोग से जर्जर हो मरने लगे।
रोग को भी अवसर मिला- ज्वर, हैजा, क्षय, चेचकफैल पड़ा। विशेषतः चेचक का बड़ा प्रसार हुआ। घर-घर
लोग महामारी से मरने लगे। कौन किसे जल देता हैं- कौन किसे छूता? कोई किसी की चिकित्सा नही करता,
कोई किसी को नही देखता था। मर जाने पर शव कोई उठाकर फेकता नही था। अति रमणीय गृह-स्थान आप
ही सड़कर बदबू करने लगे। जिस घर में एक बार चेचक हुआ, रोगी को छोड़कर घरवाले भाग गए।
महेंद्र सिंह पदचिन्ह के बड़े धनी व्यक्ति हैं-- लेकिन आज धनी-गरीब सब बराबर हैं। इस दुःखपूर्ण अकाल
के समय रोगी होकर उसके आत्मीय-स्वजन, दासी-दास सभी चले गए है। कोई मर गया, कोई भाग गया। उस
वृहत परिवार मे उनकी स्त्री, वे और गोद मे एक शिशु-कन्या मात्र रह गई हैं। इन्ही लोगो की बात कह रहा हूं।
उनकी भार्या कल्याणी ने चिंता छोड़कर गोशाला मे जाकर गाय दुही। इसके बाद दूध गर्म कर कन्या को
पिलाया और गऊ को घास खाने के लिए डाल दिया। वह लौटकर जब काई तो महेद्र ने कहा-‘‘इस तरह कितने
दिन चलेगा?''
कल्याणी बोली-- ''ज्यादा दिन नही ! जितने दिन चले, जितने दिन मै चला पाती हूं, चला रही हूं । इसके
बाद तुम लड़की को लेकर शहर चले जाना।''
महेंद्र- ''अगर शहर ही चलना है तो तुम्हें ही इतनी तकलीफ क्यो दी जाय? चलो न, अभी चले !''
इसके बाद दोनो अनेक तर्क-वितर्क हुए।
कल्याणी- ''शहर मे जाने से क्या विशेष उपकार होगा?''
महेंद्र- ''वह स्थान भी शायद ऐसे ही जन शून्य, प्राणरक्षा के उपाय से रहित है''
कल्याणी-''मुर्शिदाबाद, कासिम बाजार या कलकत्ता जाने से प्राणरक्षा हो सकेगी। इस स्थान से तो त्याग देना
हर तरह से उचित है?''
महेंद्र ने कहा-''यह घर बहुत दिनो से वंशानुक्रम से संचित धन से परिपूर्ण है, इन्हे तो चोर लूट ले
जाएंगे।''
कल्याणी-''यदि वह लोग लूटने के लिए आएं तो क्या हम दो जन रक्षा कर सकते है? प्राण ही न रहा तो धन
कौन भोगेगा? चलो, अभी से ही सब बंद-संद करके चल चले। अगर जिंदा रह गए तो फिर आकर भोग
करेगे।''
महेंद्र ने पूछा-'' क्या तुम राह चल सकोगी? कहार सब मर ही गए हैं। बैल हैं तो गाड़ी नही है और गाड़ी
है तो बैल नही है।''
कल्याणी -''तुम चिंता न करो, मैं पैदल चलूंगी।''
कल्याणी ने मन-ही-मन निश्चय किया- न होगा, राह मे मरकर गिर पडूंगी; यह दोनो जन तो बचे रहेगे।
दूसरे दिन सबेरे, साथ मे कुछ धन लेकर घर-द्वार मे ताला बंद कर, गायो को मुक्तकर और कन्या को गोद
मे लेकर दोनो जन राजधानी के लिए चल पड़े। यात्रा के समय महेंद्र ने कहा- ''राह बड़ी भयानक हैं। कदम-
कदम पर डाकू और लुटेरे छिपे है; खाली हाथ जाना उचित नही है।'' यह कहकर महेंद्र ने फिर घर मे वापस
जाकर बंदूक, गोली बारूद साथ मे ले ली।
यह देखकर कल्याणी ने कहा-''अगर अस्त्र की बात याद की है तो जरा लड़की को गोद मे सम्हाल लो, मै
भी हथियार ले लूं'' यह कहकर कल्याणी ने लड़की महेंद्र की गोद मे देकर घर के भीतर प्रवेश किया। महेंद्र ने
पूछा-''तुम कौन-सा हथियार लोगी''
कल्याणी ने घर मे जाकर विष की एक डिबिया अपने कपड़ो के अंदर छिपा ली।
जेठ का महीना है। भयानक गर्मी से पृथ्वी अग्निमय हो रही है; हवा मे आग की लपट दौड़ रही है, आकाश
गरम तवे की तरह जल रहा है, राह की धूल आग की चिनगारी बन गई है। कल्याणी के शरीर से पसीने की धार
बहने लगी; कभी पीपल के नीचे, कभी बड़ के नीचे, कभी खजूर के नीचे छाया देखकर तिलमिलाती हुई बैठ
जाती है। सूखे हुए तालाबो का कीचड़ से सना मैला जल पीकर वे लोग राह चलने लगे। लड़की महेंद्र की
गोद मे है- समय समय पर वे उसे पंखा हांक देते है। कभी घने हरे पत्तो से दाएं, सुगंधित फूलो वाले वृक्ष से
लिपटी हुई लता की छाया मे दोनो जन बैठकर विराम करते है। महेंद्र ने कल्याणी को इतना सहनशील देखकर
आश्चर्य किया। पास के ही एक जलाशय से वस्त्र को जल से तर कर महेंद्र ने उससे कन्या और पत्नी का जलता
माथा और मुंह धोकर कुछ शांत किया।
इससे कल्याणी कुछ आश्वस्त अवश्य हुई, लेकिन दोनो ही भूख से बड़े विह्वल हुए। वे लोग तो उसे भी
सहने लगे, लेकिन बालिका की भूख-प्यास उनसे बर्दाश्त न हुई, अतः वहां अधिक देर न ठहरकर वे लोग फिर
कोई OCR पाठ नहीं।
अपने-अपने हिस्से के गहने खींच-खीचकर दलपति के शरीर पर मारने लगे। दलपति ने भी दो-एक को मारा।
इस पर सब मिलकर आक्रमण कर दलपति पर आघात करने लगे। दलपति अनाहार से कमजोर और अधमरा तो
आप ही था, दो-चार आघार मे ही गिरकर मर गया। उन भूखे, पीड़ित, उत्तेजित और दयाशून्य डाकुओ मे से
एक ने कहा--‘‘स्यार का मांस खा चुके हैं, भूख से प्राण जा रहा है, आओ भाई आज इसी साले को खा ले।’’
इस पर सबने मिलकर ‘‘जयकाली’’ कहकर जयघोष किया--‘‘जय काली ! आज नर-मांस खाएंगे।’’ यह
कहकर वह सब नरकंकाल रूपधारी खिलखिलाकर हंस पड़े और तालियां बजाते हुए नाचने लगे। एक दलपति
के शरीर को भूनने के लिए आग जलाने का इंतजाम करने लगा। लता-डालियां और पत्ते संग्रह कर, उसने
चकमक पत्थर द्वारा आग पैदा कर उसे धधकाया; धधक कर आग जल उठी। आग की लपट के पास के आम,
खजूर, पनस, नीबू आदि के वृक्षो के कोमल हरे पत्ते चमकने लगे। कही पत्ते जलने लगे, कही घास पर रोशनी
से हरियाली हुई तो कही अंधेरा और गाढ़ा हो गया। आग जल जाने पर कुछ लोग दलपति के कंकाल को आग
मे फेकने के लिए घसीटकर लाने लगे।
इसी समय एक बोल उठा-‘‘ठहरो, ठहरो ! अगर यह मांस ही खाकर आज भूख मिटानी है, तो इस सूखे
नरकंकाल को न भूनकर, आओ इस कोमल लड़की को ही भूनकर खाया जाए’’
एक बोला-‘‘जो हो, भैया ! एक को भूनो ! हम तो भूख से मर रहे हैं।’’ इस पर सबने लोलुप दृष्टि से उधर
देखा, जिधर अपनी कन्या को लिए हुए कल्याणी पड़ी थी। उस सबने देखा कि वह स्थान सूना था, न कन्या थी
और न माता ही। डाकुओ के आपसी विवाद और मारपीट के समय सुयोग पाकर कल्याणी गोद मे बच्ची को
चिपकाए वन के भीतर भाग गई। शिकार को भागा देखकर वह प्रेत-दल मार-मार करता हुआ चारो तरफ उन्हे
पकड़ने के लिए दौड़ पड़ा। अवस्था विशेष मे मनुष्य पशुमात्र रह जाता है।
जंगल के भीतर घनघोर अंधकार है। कल्याणी को उधर राह मिलना मुश्किल हो गया। वृक्ष-लताओ के झुरमुट
के कारण एक तो राह कठिन, दूसरे रात का घना अंधेरा। कांटो से विंधती हुई कल्याणी उन आदमखोरो से
बचने के लिए भागी जा रही थी। बेचारी कोमल लड़की को भी कांटे लग रहे थे। अबोध बालिका गोद मे
चीखकर रोने लगी; उसका रोना सुनकर दस्युदल और चीत्कार करने लगा। फिर भी, कल्याणी पागलो की तरह
जंगल मे तीर की तरह घुसती भागी जा रही थी। थोड़ी ही देर मे चंद्रोदय हुआ। अब तक कल्याणी के मन मे
भरोसा था कि अंधेरे मे नर-पिशाच उसे देख न सकेगे, कुछ देर परेशान होकर पीछा छोड़कर लौट जाएंगे,
लेकिन अब चांद का प्रकाश फैलने से वह अधीर हो उठी। चन्द्रमा ने आकाश मे ऊंचे उठकर वन पर अपना
रुपहला आवरण फैला दिया, जंगल का भीतरी हिस्सा अंधेरे मे चांदनी से चमक उठा- अंधकार मे भी एक तरह
की उज्ज्वलता फैल गई- चांदनी वन के भीतर छिद्रो से घुसकर आंखमिचौनी करने लगी। चंद्रमा जैसे-जैसे
ऊपर उठने लगा, वैसे-वैसे प्रकाश फैलने लगा जंग को अंधकार अपने मे समेटने लगा। कल्याणी पुत्री को
गोद मे लिए हुए और गहन वन मे जाकर छिपने लगी। उजाला पाकर दस्युदल और अधिक शोर मचाते हुए
दौड़-धूप कर खोज करने लगे। कन्या भी शोर सुनकर और जोर से चिल्लाने लगी। अब कल्याणी भी थककर
चूर हो गई थी; वह भागना छोड़कर वटवृक्ष के नीचे साफ जगह देखकर कोमल पत्तियो पर बैठ गई और
भगवान को बुलाने लगी-‘‘कहां हो तुम? जिनकी मैं नित्य पूजा करती थी, नित्य नमस्कार करती थी, जिनके
एकमात्र भरोसे पर इस जंगल मे घुसने का साहस कर सकी.......‘‘ ...कहां हो, हे मधुसूदन !‘‘ इस समय भय
और भक्ति की प्रगाढ़ता से, भूख-प्यास से थकावट से कल्याणी धीरे अचेत होने लगी; लेकिन आंतरिक चैतन्य
से उसने सुना, अंतरिक्ष मे स्वर्गीय गीत हो रहा है-
“हरे मुरारे! मधुकैटभारे! गोपाल, गोविंद मुकुंद प्यारे! हरे मुरारे मधुकैटभारे!.......“
कल्याणी बचपन से पुराणो का वर्णन सुनती आती थी कि देवर्षि नारद हाथों मे वीणा लिए हुए आकाश पथ
से भुवन-भ्रमण किया करते है- उसके हृदय मे वही कल्पना जागरित होने लगी। मन-ही-मन वह देखने लगी-
शुभ्र शरीर, शुभ्रवेश, शुभ्रकेश, शुभ्रवसन महामति महामुनि वीणा लिए हुए, चांदनी से चमकते आकाश की राह
पर गाते आ रहे है ।
“हरे मुरारे! मधुकैटभारे!.......“
क्रमशः गीत निकट आता हुआ, और भी स्पष्ट सुनाई पड़ने लगा-
“हरे मुरारे! मधुकैटभारे!.......“
क्रमशः और भी निकट, और भी स्पष्ट-
“हरे मुरारे! मधुकैटभारे!.......“
अंत मे कल्याणी के मस्तक पर, वनस्थली मे प्रतिध्वनित होता हुआ गीत होने लगा-
“हरे मुरारे! मधुकैटभारे!.......“
कल्याणी ने अपनी आंखे खोली। धुंधले अंधेरे की चांदी मे उसने देखा- सामने वही शुभ्र शरीर, शुभ्रवेश,
शुभ्रकेश, शुभ्रवसन ऋषिमूर्ति खड़ी है। विकृत मस्तिष्क और अर्धचेतन अवस्था मे कल्याणी ने मन मे सोचा-
- प्रणाम करूं, लेकिन सिर झुकाने से पहले ही वह फिर अचेत हो गयी और गिर पड़ी।
इसी वन मे एक बहुत विस्तृत भूमि पर ठोस पत्थरो से निर्मित एक बहुत बड़ा मठ है। पुरातत्त्ववेत्ता उसे देखकर
कह सकते हैं कि पूर्वकाल मे यह बौद्धो का विहार था- इसके बाद हिंदुओ का मठ हो गया है। दो खंडो मे
अट्टालिकाएं बनी है, उसमे अनेक देव-मंदिर और सामने नाट्यमंदिर है। वह समूचा मठ चहारदीवारी से घिरा
हुआ है और बाहरी हिस्सा ऊंचे-ऊंचे सघन वृक्षों से इस तरह आच्छादित है कि दिन मे समीप जाकर भी कोई
यह नही जान सकता कि यहां इतना बड़ा मठ है। यो तो प्राचीन होने के कारण मठ की दीवारे अनेक स्थानो से
टूट-फूट गई है, लेकिन दिन मे देखने ने से साफ पता लगेगा कि अभी हाल ही मे उसे बनाया गया है। देखने
से तो यही जान पड़ेगा कि इस दुर्भेद्य वन के अंदर कोई मनुष्य रहता न होगा। उस अट्टालिका की एक कोठरी
मे लकड़ी का बहुत बड़ा कुन्दा जल रहा था। आंख खुलने पर कल्याणी ने देखा कि सामने ही वह ऋषि महात्मा
बैठे हैं। कल्याणी बड़े आश्चर्य से चारो तरफ देखने लगी। अभी उसकी स्मृति पूरी तरह जागी न थी। यह
देखकर महापुरुष ने कहा- “बेटी! यह देवताओं का मंदिर है, डरना नही। थोड़ा दूध है, उसे पियो; फिर तुमसे
बाते होगी।“
पहले तो कल्याणी कुछ समझ न सकी, लेकिन धीरे-धीरे उसके हृदय मे जब धीरज हुआ तो उसने उठकर
अपने गले मे आंचल डालकर, जमीन से मस्तक लगाकर प्रणाम किया। महात्माजी ने सुमंगल आशीर्वाद देकर
दूसरे कमरे से एक सुगंधित मिट्टी का बरतन लाकर उसमे दूध गरम किया। दूध के गरम हो जाने पर उसे
कल्याणी को देकर बोले- “बेटी! दूध कन्या को भी पिलाओ, स्वयं भी पियो, उसके बाद बाते करना।“
कल्याणी संतुष्ट हृदय से कन्या को दूध पिलाने लगी। इसके बाद उस महात्मा ने कहा- “मै जब तक न आऊं,
कोई चिंता न करना।“ यह कहकर कमरे के बाहर चले गए। कुछ देर बाद उन्होने लौटकर देखा कि कल्याणी ने
कन्या को तो दूध पिला दिया है, लेकिन स्वयं कुछ नही पिया। जो दूध रखा हुआ था, उसमें से बहुत थोड़ा
खर्च हुआ था। इस पर महात्मा ने कहा- “बेटी! तुमने दूध नही पिया? मैं फिर बाहर जाता हूं; जब तक तुम
दूध न पियोगी, मैं वापस न आऊंगा।“
वह ऋषितुल्य महात्मा यह कहकर बाहर जा रहे थे; इसी समय कल्याणी फिर प्रणाम कर हाथ जोड़ खड़ी हो
गई।
महात्मा ने पूछा-‘‘क्या कहना चाहती हो?‘‘
कल्याणी ने हाथ जोड़े हुए कहा- ‘‘मुझे दूध पीने की आज्ञा न दै। उसमे एक बाधा है, मैं पी न
सकूंगी।.............‘‘
इस पर महात्मा ने दुःखी हृदय से कहा- ‘‘क्या बाधा है? मैं ब्रह्मचारी हूं, तुम मेरी कन्या के समान हो; ऐसी
कौन बात हो सकती है जो मुझसे कह न सको? मैं जब तुम्हे वन से उठाकर यहां ले आया, तो तुम अत्यंत
भूख प्यास से अवसन्न थी, तुम यदि दूध न पियोगी तो कैसे बचोगी?‘‘
इस पर कल्याणी ने भरी आंखे और भरे गले से कहा- ‘‘आप देवता है, आपसे अवश्य निवेदन करूंगी -
अभी तक मेरे स्वामी ने कुछ नही खाया है, उनसे मुलाकात हुए बिना या संवाद मिले बिना मैं भोजन न कर
सकूंगी। मैं कैसे खाऊंगी....‘‘
ब्रह्मचारी ने पूछा- ‘‘तुम्हारे पतिदेव कहां है?‘‘
कल्याणी बोली- ‘‘यह मुझे मालूम नही- दूध की खोज मे उनके बाहर निकलने पर ही डाकू मुझे उठा ले
गए‘‘ इस पर ब्रह्मचारी ने एक-एक बात पूछकर कल्याणी से उसके पति का सारा हाल मालूम कर लिया।
कल्याणी ने पति का नाम नही बताया, बता भी नही सकती थी, किंतु अन्याय परिचयो से ब्रह्मचारी समझ गए।
उन्होने पूछा- ‘‘तुम्ही महेंद्र की पी हो?‘‘ इसका कोई उत्तर न देकर कल्याणी सिर झुका कर, जलती हुई आग
मे लकड़ी लगाने लगी। ब्रह्मचारी ने समझकर कहा- ‘‘तुम मेरी बात मानो, मैं तुम्हारे पति की खोज करता हूं।
लेकिन जब तक दूध न पिओगी, मैं न जाऊंगा?‘‘
कल्याणी पूछा- ‘‘यहां थोड़ा जल मिलेगा?‘‘
ब्रह्मचारी ने जल का कलश दिखा दिया। कल्याणी ने अंजलि रोपी, ब्रह्मचारी ने जल डाल दिया। कल्याणी ने
उस जल की अंजलि को महात्मा के चरणो के पास ले जाकर कहा- ‘‘इसमे कृपा कर पदरेणु दे दे !‘‘ महात्मा
के अंगूठे द्वारा छू देने पर कल्याणी ने उसे पीकर कहा- ‘‘मैंने अमृतपान कर लिया है। अब और कुछ खाने-
पीने को न कहिए। जब तक पतिदेव का पता न लगेगा मैं कुछ न खाऊंगी।‘‘
इस पर ब्रह्मचारी ने संतुष्ट होकर कहा- ‘‘तुम इसी देवस्थान मे रहो। मैं तुम्हारे पति की खोज मे जाता हूं !‘‘
रात काफी बीत चुकी है। चंद्रमा माथे के ऊपर है। पूर्ण चंद्र नही है, इसलिए चांदनी भी चटकीली नही- फीकी
है। जंगल के बहुत बड़े हिस्से पर अंधकार मे धुंधली रोशनी पड़ रही है। इस प्रकाश मे मठ के इस पार से
दूसरा किनारा दिखाई नही पड़ता। मठ मानो एकदम जनशून्य है- देखने से यही मालूम होता है। इस मठ के
समीप से मुर्शिदाबाद और कलकत्ते को राह जाती है। राह के किनारे ही एक छोटी पहाड़ी है, जिस पर आम के
अनेक पेड़ है। वृक्षो की चोटी चांदनी से चमकती हुई कांप रही है, वृक्षो के नीचे पत्थर पर पड़नेवाली छाया
भी कांप रही है। ब्रह्मचारी उसी पहाड़ी के शिखर पर चढ़कर न जाने क्या सुनने लगे। नही कहा जा सकता कि
वे क्या सुन रहे थे। इस अनंत जंगल मे पूर्ण शांति थी- कही ऐसे ही पत्तो की मर्मर-ध्वनि सुनाई पड़ जाती
थी। पहाड़ की तराई मे एक जगह भयानक जंगल है। ऊपर पहाड़ नीचे जंगल बीच मे वह राह है। नही कह
सकते कि उधर कैसी आवाज हुई जिसे सुनकर ब्रह्मचारी उसी ओर चल पड़े। उन्होने भयानक जंगल मे प्रवेश
कर देखा कि वहां एक घने स्थान में वृक्षो की छाया मे बहुतेरे आदमी बैठे है। वे सब मनुष्य लंबे, काले, और
सशस्त्र थे पेड़ो की छाया को भेदकर आनेवाली चांदनी उनके शस्त्रो को चमका रही थी। ऐसे ही दो सौ आदमी
बैठे है और सब शांत, चुप है। ब्रह्मचारी उनके बीच मे जाकर खड़े हो गए और उन्होने कुछ इशारा कर दिया,
जिससे कोई भी उठकर खड़ा न हुआ। इसके बाद वह तपस्वी महात्मा एक तरफ से लोगो को चेहरा गौर से
देखते हुए आगे बढ़ने लगे, जैसे किसी को खोजते हो । खोजते-खोजते अन्त मे वह पुरुष मिला और ब्रह्मचारी
के उसका अंग स्पर्श कर इशारा करते ही वह उठ खड़ा हुआ। ब्रह्मचारी उसे साथ लेकर दूर आड़ मे चले गए।
वह पुरुष युवक और बलिष्ठ था- लंबे घुंघराले बाल कंधे पर लहरा रहे थे। पुरुष अतीव सुंदर था। गैरिक
वस्त्रधारी तथा चंदनचर्चित अंगवाले ब्रह्मचारी ने उस पुरुष से कहा- “भवानंद! महेंद्र सिंह की कुछ खबर
मिली है?”
इस पर भवानंद ने कहाझ्र-“आज सबेरे महेंद्रसिंह अपनी पी और कन्या के साथ गृह त्यागकर बाहर निकले
हैं-बस्ती मे........."
इतना सुनते ही ब्रह्मचारी ने बात काटकर कहा-‘बस्ती मे जो घटना हुई है, मै जानता हूं। किसने ऐसा
किया?‘‘
भवानंद-‘गांव के ही किसान लोग थे। इस समय तो गांवो के किसान भी पेट की ज्वाला से डाकू हो गए
है। आजकल कौन डाकू नही हैं? हम लोगो ने भी आज लूट की है- दारोगा साहब के लिए दो मन चावल जा
रहा था, छीनकर वैष्णवो को भोग लगा दिया है।‘‘
ब्रह्मचारी ने कहा-‘चोरो के हाथ से तो हमने स्त्री-कन्या का उद्धार कर लिया है। इस समय उन्हे मठ मे
बैठा आया हूं। अब यह भार तुम्हारे ऊपर हैं कि महेंद्र को खोजकर उनकी स्त्री-कन्या उनके हवाले कर दो।
यहां जीवानंद के रहने से काम हो जाएगा।‘‘
भवानंद ने स्वीकार कर लिया। तब ब्रह्मचारी दूसरी जगह चले गए।
बस्ती मे बैठे रहने और सोचते रहने का कोई प्रतिफल न होगा- यह सोचकर महेंद्र वहां से उठे। नगर में जाकर
राजपुरुषो की सहायता से स्त्री-कन्या का पता लगवाएं- यह सोचकर महेंद्र उसी तरफ चले। कुछ दूर जाकर राह
मे उन्होने देखा कि कितनी ही बैलगाड़ियो को घेरकर बहुतेरे सिपाही चले आ रहे है।
बंगला सन् 1173 मे बंगाल प्रदेश अंग्रेजो के शासनाधीन नही हुआ था। अंग्रेज उस समय बंगाल के
दीवान ही थे। वे खजाने का रुपया वसूलते थे, लेकिन तब तक बंगालियो की रक्षा का भार उन्होने अपने ऊपर
लिया न था। उस समय लगान की वसूली का भार अंग्रेजो पर था, और कुल सम्पत्ति की रक्षा का भार पापिष्ठ,
नराधम, विश्वासघातक, मनुष्य-कुलकलंक मीरजाफर पर था। मीरजाफर आत्मरक्षा मे ही अक्षम था, तो बंगाल
प्रदेश की रक्षा कैसे कर सकता था? मीरजाफर सिर्फ अफीम पीता था और सोता था, अंग्रेज ही अपने जिम्मे
का सारा कार्य करते थे। बंगाली रोते थे और कंगाल हुए जाते थे।
अतः बंगाल का कर अंग्रेजो को प्राप्य था, लेकिन शासन का भार नवाब पर था। जहां-जहां अंग्रेज अपने
प्राप्य कर की स्वयं अदायगी कराते थे, वहां-वहा उन्होने अपनी तरफ से कलेक्टर नियुक्त कर दिए थे। लेकिन
मालगुजारी प्राप्त होने पर कलकत्ते जाती थी। जनता भूख से चाहे मर जाए, लेकिन मालगुजारी देनी ही पड़ती
थी। फिर भी मालगुजारी पूरी तरह वसूल नही हुई थी- कारण, माता-वसुमती के बिना धन-प्रसव किए, जनता
अपने पास के कैसे गढ़कर दे सकती थी? जो हो, जो कुछ प्राप्त हुआ था, उसे गाड़ियो पर लादकर सिपाहियो
के पहरे मे कलकत्ते भेजा जा रहा था- धन कंपनी के खजाने मे जमा होता। आजकल डाकुओ का उत्पात बहुत
बढ़ गया है, इसीलिए पचास सशस्त्र सिपाही गाड़ी के आगे-पीछे संगीन खड़ी किए, कतार मे चल रहे थे :
उनका अध्यक्ष एक गोरा था जो सबसे पीछे घोड़े पर था। गरमी की भयानकता के कारण सिपाही दिन मे न
चलकर रात को सफर करते थे। चलते-चलते उन गाड़ियो और सिपाहियो के कारण महेंद्र की राह रुक गई।
इस तरह राह रुकी होने के कारण थोड़ी देर के लिए महेंद्र सड़क के किनारे खड़े हो गए। फिर भी सिपाहियो के
शरीर से धक्का लग सकता था, और झगड़ा बचाने के ख्याल से वे कुछ हटकर जंगल के किनारे खड़े हो गए।
इसी समय एक सिपाही बोला--“यह देखो, एक डाकू भागता है!” महेंद्र के हाथ मे बंदूक देखकर उसका
विश्वास दृढ़ हो गया। वह दौड़कर पहुंचा और एकाएक महेंद्र का गला पकड़कर साले चोर! कहकर उन्हे एक
घूंसा जमाया और बंदूक छीन ली। खाली हाथ महेंद्र ने केवल घूंसे का जवाब घूंसे से दिया। महेंद्र को
अचानक इस बर्ताव पर क्रोध आ गया था, यह कहना ही व्यर्थ है! घूंसा खाकर सिपाही चक्कर खाकर गिर पड़ा
और बेहोश हो गया। इस पर अन्य चार सिपहियो ने आकर महेंद्र को पकड़ लिया और उन्हे उस गोरे सेनापति
के पास ले गए। अभियोग लगाया कि इसने एक सिपाही का खून किया है। गोरा साहब पाइप से तमाखू पी रहा
था, नशे के झोके मे बोला--“साले को पकड़कर शादी कर लो।” सिपाही हक्का-बक्का हो रहे थे कि बंदूकधारी
डाकू से सिपाही कैसे शादी कर ले? लेकिन नशा उतरने पर साहब का मत बदल सकता है कि शादी कैसे
होगी- यही विचार कर सिपहियो ने एक रस्सी लेकर महेंद्र के हाथ-पैर बांध दिए और गाड़ी पर डाल दिया।
महेंद्र ने सोचा कि इतने सिपहियो के रहते जो लगाना व्यर्थ है, इसका कोई फल न होगा; दूसरे स्त्री-कन्या के
गायब होने के कारण महेंद्र बहुत दुःखी और निराश थे; सोचा-- अच्छा है, मर जाना ही अच्छा है! सिपहियो
ने उन्हे गाड़ी के बल्ले से अच्छी तरह बांध दिया और इसके बाद धीर-गंभीर चाल से वे लोग फिर पहले की तरह
चलने लगे।
ब्रह्मचारी की आज्ञा पाकर भवानंद धीरे-धीरे हरिकीर्त्तन करते हुए उस बस्ती की तरफ चले, जहां महेंद्र का
कन्या-पत्नी से वियोग हुआ था। उन्होने विवेचन किया कि महेंद्र का पता वही से लगना संभव है।
उस समय अंग्रेजो की बनवायी हुई आधुनिक राहे न थी। किसी भी नगर से कलकत्ते जाने के लिए मुगल-
सम्राटो की बनायी राह से ही जाना पड़ता था। महेंद्र भी पदचिह्न से नगर जाने के लिए दक्षिण से उत्तर जा रहे
थे। भवानंद ताल-पहाड़ से जिस बस्ती की तरफ आगे बढ़े, वह भी दक्षिण से उत्तर पड़ती थी। जाते-जाते
उनका भी उन धन-रक्षक सिपहियो से साक्षात हो गया। भवानंद भी सिपहियो की बगल से निकले। एक तो
सिपहियो का विश्वास था कि इस खजाने को लूटने के लिए डाकू अवश्य कोशिश करेगे, उस पर राह मे एक
डाकू- महेंद्र को गिरफ्तार कर चुके थे, अतः भवानंद को भी राह मे पाकर उनका विश्वास हो गया कि यह भी
डाकू है। अतएव तुरंत उन सबने भवानंद को भी पकड़ लिया। भवननंद ने मुस्करा कर कहा--“ऐसा क्यो
भाई?”
सिपाही बोला--“तुम साले डाकू हो!”
भवानंद--“देख तो रहे तो, गेरुआ कपड़ा पहने मैं ब्रह्मचारी हूं....... डाकू क्या मेरे जैसे होते हैं?”
सिपाही--“बहुतेरे साले ब्रह्मचारी-संन्यासी डकैत रहते है।”
यह कहते हुए सिपाही भवानंद के गले पर धक्का दे खींच लाए। अंधकार मे भवानंद की आंखो से आग निकलने
लगी, लेकिन उन्होने और कुछ न कर विनीत भाव से कहा--“हुजूर! आज्ञा करो, क्या करना होगा?”
भवानंद की वाणी से संतुष्ट होकर सिपाही ने कहा--“लो साले! सिर पर यह बोझ लादकर चलो।” यह कहकर
सिपाही ने भवानंद के सिर पर एक गठरी लाद दी। यह देख एक दूसरा सिपाही बोला--“नही-नही भाग जाएगा।
इस साले को भी वहां पहलेवाले की तरह बांधकर गाड़ी पर बैठा दो।” इस पर भवानंद को और उत्कंठा हुई कि
पहले किसे बांधा है, देखना चाहिए। यह विचार कर भवानंद ने गठरी फेक दी और पहले सिपाही को एक
थप्पड़ जमाया। अतः अब सिपहियो ने उन्हे भी बांधकर गाड़ी पर महेंद्र की बगल मे डाल दिया। भवानंद
पहचान गए कि यही महेंद्रसिंह हैं।
प्रथम खण्ड: महेन्द्र, कल्याणी व भवानन्द मिलन
सिपाही फिर निश्चिंत हो कोलाहल मचाते हुए आगे बढ़े। गाड़ी का पहिया ‘घड़-घड़’ शब्द करता हुआ घूमने
लगा। भवानंद ने अतीव धीमे स्वर मे, ताकि महेंद्र ही सुन सके, कहा-‘‘महेंद्रसिंह! मैं तुम्हे पहचानता हूं।
तुम्हारी सहायता करने के लिए ही यहां आया हूं। मैं कौन हूं यह भी तुम्हे सुनने की जरूरत नही। मै जो कहता
हूं, सावधान होकर वही करो! तुम अपने हाथ के बंधन गाड़ी के पहिये के ऊपर रखो।’’
महेंद्र विस्मित हुए, फिर भी उन्होंने बिना कहे-सुने भवानंद के मतानुसार कार्य किया- अंधकार मे गाड़ी के
चक्के की तरफ जरा खिसककर उन्होने अपने हाथ के बंधनो को पहिये के ऊपर लगाया। थोड़ी ही देर मे उनके
हाथ के बंधन कटकर खुल गए। इस तरह बंधन से मुक्त होकर वे चुपचाप गाड़ी पर लेट रहे। भवानंद ने भी उसी
तरह अपने को बंधनो से मुक्त किया। दोनों ही चुपचाप लेटे रहे।
जिस जगह जंगल के समीप राज-पथ पर खड़े होकर ब्रह्मचारी ने चारो ओर देखा था उसी राह से इन लोगो को
गुजरना था। उस पहाड़ी के निकट पहुंचने पर सिपाहियो ने देखा कि एक शिलाखंड पर जंगल के किनारे एक
पुरुष खड़ा है। हलकी चांदनी मे उस पुरुष का काला शरीर चमकता हुआ देखकर सिपाही बोला--‘‘देखो एक
साला और यहां खड़ा है।’’ इस पर उसे पकड़ने के लिए एक आदमी दौड़ा, लेकिन वह आदमी वही खड़ा रहा,
भागा नही- पकड़कर हवलदार के पास ले आने पर भी वह व्यक्ति कुछ न बोला। हवलदार ने कहा-‘‘इस साले
के सिर पर गठरी लादो!’’ सिपाहियो के एक भारी गठरी देने पर उसने भी सिर पर ले ली। तब हवलदार पीछे
पलटकर गाड़ी के साथ चला। इसी समय एकाएक पिस्तौल चलने की आवाज हुई- हवलदार माथे मे गोली
खाकर गिर पड़ा।
‘‘इसी साले ने हवलदार को मारा है!’’ कहकर एक सिपाही ने उस मोटिया का हाथ पकड़ लिया। मोटिये के
हाथ मे तब तक पिस्तौल थी। मोटिये ने अपने सिर का बोझ फेककर और तुरंत पलटकर उस सिपाही के माथे
पर आघात किया, सिपाही का माथा फट गया और जमीन पर गिर पड़ा। इसी समय ‘‘हरि! हरि! हरि!’’ पुकारता
दो सौ व्यक्तियो ने आकर सिपाहियो को घेर लिया। सिपाही गोरे साहब के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। साहब
भी डाका पड़ा है- विचार कर तुरंत गाड़ी के पास पहुंचा और सिपाहियो को चौकोर खड़े होने की आज्ञा दी।
अंग्रेजों का नशा विपद् के समय नही रहता। सिपाहियो के उस तरह खड़े होते ही दूसरी आज्ञा से उन्होने
अपनी-अपनी बंदूके संभाली। इसी समय एकाएक साहब की कमर की तलवार किसी ने छीन ली और फौरन
उसने एक बार मे साहब का सिर भुट्टे की तरह उड़ा दिया- साहब का धड़ घोड़े से गिरा। फायर करने का हुक्म
वह दे न सका। तब लोगो ने देखा कि एक व्यक्ति गाड़ी पर हाथ मे नंगी तलवार लिए हुए ललकार रहा है-
‘‘मारो, सिपाहियो को मारो.........मारो! साथ ही हरि हरि!’’ का जय नाद भी करता जाता है। वह व्यक्ति और
कोई नही भवानंद था।
एकाएक अपने साहब को मरा हुआ देख और अपनी रक्षा के लिए किसी को आज्ञा देते न देखकर सरकारी
सिपाही डटकर भी निश्चेष्ट हो गए। इस अवसर पर तेजस्वी डाकुओ ने अपने सिपाहियो को हताहत कर आगे
बढ़, गाड़ी पर रखे हुए खजाने पर अधिकार जमा लिया। सरकारी फौजी टुकड़ी भयभीत होकर भागी।
अंत मे वह व्यक्ति सामने आया जो दल का नेतृत्व करता था और पहाड़ी पर खड़ा था। उसने आकर भवानंद
को गले लगा लिया। भवानंद ने कहा-‘‘भाई जीवानंद! तुम्हारा नाम सार्थक हो?’’
इसके बाद अपहृत धन को यथास्थान भेजने का भार जीवानंद पर रहा। वह अपने अनुचरो के साथ खजाना
लेकर शीघ्र ही किसी अन्य स्थान मे चले गए। भवानंद अकेले खड़े रह गए।
बैलगाड़ी पर से कूदकर एक सिपाही की तलवार छीनकर महेंद्र सिंह ने भी चाहा कि युद्ध मे योग दे। लेकिन
इसी समय उन्हे प्रत्यक्ष दिखाई दिया कि युद्ध मे लगा हुआ दल और कुछ नही, डाकुओ का दल है-धन छीनने
के लिए इन लोगो ने सिपाहियो पर आक्रमण किया है। यह विचार कर महेंद्र युद्ध से विरत हो दूर जा खड़े हुए।
उन्होने सोचा कि डाकुओ का साथ देने से उन्हे भी दुराचार का भागी बनना पड़ेगा। वे तलवार फेककर धीरे-
धीरे वह स्थान त्यागकर जा रहे थे, इसी समय भवानंद उसके पास आकर खड़े हो गए। महेंद्र ने पूछा-
‘‘महाशय! आप कौन है?’’
भवानंद ने कहा-‘‘इससे तुम्हे क्या प्रयोजन है?’’
महेंद्र-‘‘मेरा कुछ प्रयोजन है- आज आपके द्वारा मैं विशेष उपकृत हुआ हूं।’’
भवानन्द-‘‘मुझे ऐसा नही था कि तुम्हे इतना ज्ञान है। हाथो मे हथियार रहते हुए भी तुम युद्ध से विरत
रहे..... जमीदारो के लड़के घी-दूध का श्राद्ध करना तो जानते है, लेकिन काम के समय बंदर बन जाते है!’’
भवानंद की बात समास होते-न-होते महेंद्र घृणा के साथ कहा-‘‘यह तो अपराध है, डकैती है’’
भवानंद ने कहा-‘‘ हां डकैती! हम लोगो के द्वारा तुम्हारा कुछ उपकार हुआ था, साथ ही और भी कुछ
उपकार कर देने की इच्छा है!’’
महेंद्र-‘‘तुमने मेरा कुछ उपकार अवश्य किया है लेकिन और क्या उपकार करोगे? फिर डाकुओ द्वारा उपकृत
होने के बदले अनुपकृत होना ही अच्छा है।’’
भवानंद-‘‘उपकार ग्रहण न करो, यह तुम्हारी इच्छा है। यदि इच्छा हो तो मेरे साथ आओ, तुम्हारी स्त्री-कन्या
से मुलाकात करा दूंगा!’’
महेंद्र पलटकर खड़े हो गए, बोले-‘‘क्या कहा?’’
भवानंद ने इसका कोई जवाब न देकर पैर बढ़ाया।
अंत मे महेंद्र भी साथ-साथ आने लगे, साथ ही मन-ही-मन सोचते जाते थे-यह सब कैसे डाकू है?.......
स चांदनी रात मे दोनो ही जंगल पार करते हुए चले जा रहे थे। महेंद्र चुप, शांत, गर्वित और कुछ कौतूहल मे
भी थे।
सहसा भवानंद ने भिन्न रूप रूप धारण कर लिया। वे अब स्थित-मूर्ति, धीर-प्रवृत्ति सन्यासी न रहे- वह
रणनिपुण वीरमूर्ति, अंग्रेज सेनाध्यक्ष का सिर काटने वाला रुद्ररूप अब न रहा। अभी जिस गर्वित भाव से वे
महेंद्र का तिरस्कार कर रहे थे, अब भवानंद वह न थे- मानो ज्योत्सनामयी, शांतिमयी पृथिवी की तरु-कानन-
नद-नदीमय शोभा निरखकर उसके चित्त मे विशेष परिवर्तन हो गया हो। चन्द्रोदय होने पर समुद्र मानो हंस
उठा। भवानंद हंसमुख, मुखर, प्रियसंभाषी बन गए और बातचीत के लिए बहुत बेचैन हो उठे। भवानंद ने
बातचीत करने के अनेक उपाय रचे, लेकिन महेन्द्र चुप ही रहे। तब निरुपाय होकर भवानंद ने गाना शुरू किया-
‘‘वन्दे मातरम् !
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलां मातरम्............।’’
महेंद्र गाना सुनकर कुछ आश्चर्य मे आए। वे कुछ समझ न सके- सुजलां, सुफलां, मलयजशीतलां,
शस्यश्यामला माता कौन है? उन्होने पूछा-‘‘यह माता कौन है?’’
कोई उत्तर न देकर भवानंद गाते रहे-
‘‘शुभ्रज्योत्सना पुलकित यामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्
सुहासिनी सुमधुरभाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम् । ''.....
महेद्र बोले-‘ ‘यह तो देश है, यह तो मां नही है। ’’
भवानंद ने कहा-‘ ‘हमलोग दूसरी किसी मां को नही मानते। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’- हमारी
माता, जन्मभूमि ही हमारी जननी है- हमारे न मां है, न पिता है, न भाई है- कुछ नही है, स्त्री भी नही, घर भी
नही, मकान भी नही, हमारी अगर कोई हैं तो वही सुजला, सुफला, मलयजसमीरण-शीतला,
शस्यश्यामला.....’’
अब महेंद्र ने समझकर कहा-‘ ‘तो फिर गाओ !’’
भवानंद फिर गाने लगे-
‘‘वन्दे मातरम् !
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम
शस्यश्यामलां मातरम्............।’’
‘‘शुभ्र ज्योत्स्ना-पुलकित यामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनी सुमधुरभाषिणीम्
सुखदां, वरदां मातरम् ।।
वन्दे मातरम्.........
सप्तकोटिकण्ठ-कलकल निनादकराले,
द्विसप्तकोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
अबला केनो मां तुमि एतो बले !
बहुबलधारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥ वन्दे........
तुमी विद्या, तुमी धर्म,
तुमी हरि, तुमी कर्म,
त्वं हि प्राण : शरीरे।
बाहुते तुमी मां शक्ति,
हृदये तुमी मां भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गड़ी मन्दिरे-मन्दिरे।
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरण धारिणी,
कमला कमल-दल-विहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी नमामि त्वं
नमामि कमलां, अमलां, अतुलाम,
सुजलां, सुफलां, मातरम्
वन्दे मातरम् ॥
श्यामलां, सरलां, सुस्मितां, भूषिताम्
धरणी, भरणी मातरम् ॥ वन्दे मातरम्...’’
महेद्र ने देखा दस्यु गाते-गाते रोने लगा। तब महेद्र ने विस्मय से पूछा- "तुमलोग कौन हो?"
भवानंद ने उत्तर दिया - "हमलोग संतान है।"
महेद्र - "संतान क्या? किसकी संतान है?"
भवानंद - "माता की संतान!"
महेद्र - "ठीक ! तो क्या संतान लोग चोरी-डकैती करके मां की पूजा करते है? यह कैसी मातृभक्ति?"
भवानंद - "हम लोग चोरी-डकैती नही करते........"
महेद्र - "अभी तो गाड़ी लूटी है......?"
भवानंद - "यह क्या चोरी-डकैती है! किसके रुपये लुटे है?"
महेद्र - "क्यो ? राजा के !"
भवानंद - "राजा के ! वह क्यो इन रुपयो को लेगा- इन रुपयो पर उसका क्या अधिकार है?"
महेद्र - "राजा का राज-भाग।"
भवानंद- "जो राजा राज्य प्रबंध न करे, जनता-जनार्दन की सेवा न करे, वह राजा कैसे हुआ?"
महेद्र- "देखता हूं, तुम लोग किसी दिन फौजी की तोपो के मुंह पर उड़ जाओगे।"
भवानंद - "अनेक साले सिपाहियो को देख चुका हूं, अभी आज भी तो देखा है!"
महेद्र - "अच्छी तरह नही देखा, एक दिन देखोगे!"
भवानंद - "सब देख चुका हूं। एक बार से दो बार तो मनुष्य मर नही सकता।"
महेद्र - "जान-बूझकर मरने की क्या जरूरत है?"
भवानंद - "महेद्र सिंह! मेरा ख्याल था कि तुम मनुष्यो के समान मनुष्य होगे। लेकिन देखा- जैसे सब है,
वैसे तुम भी हो- घी-दूध खाकर भी दम नही। देखो, सांप मिट्टी मे अपने पेट को घसीटता हुआ चलता है-
उससे बढ़कर तो शायद हीन कोई न होगा; लेकिन उसके शरीर पर भी पैर रख देने पर वह फन काढ लेता है।
तुम लोगो का धैर्य
क्या किसी तरह भी नष्ट नही होता? देखो, कितने देशी शहर है- मगध, मिथिला, काशी, कराची, दिल्ली,
काश्मीर- उन जगहो की ऐसी दुर्दशा है? किस देश के मनुष्य भोजन के अभाव मे घास खा रहे हैं? किस देश
की जनता कांटे खाती है, लता-पत्ता खाती हैं? किस देश के मनुष्य स्यार, कुत्ते और मुर्दे खाते है? आदमी
अपने संदूक मे धन रखकर भी निश्चित नही है- सिंहासन पर शालिग्राम बैठाकर निश्चित नही है- घर मे बहू-
नौकर-मजदूरनी रखकर निश्चित नही है! हर देश का राजा अपनी प्रजा की दशा का, भरण-पोषण का ख्याल
रखता है; हमारे देश का मुसलमान राजा क्या हमारी रक्षा कर रहा है? धर्म गया, जाति गई, मन गया- अब तो
प्राणो पर बाजी आ गई है। इन नशेबाज दाड़ीवालो को बिना भगाए क्या हिंदू हिंदू रह जाएंगे?"
महेद्र- "कैसे भगाओगे?"
भवानंद - "मारकर!"
महेद्र- "तुम अकेले भगाओगे- एक थप्पड़ मारकर क्या?"
भवानंद ने फिर गाया-
"सप्तकोटि कण्ठ कलकल निनादकराले,
द्विसप्तकोटिभुजैर्धृत खरकरवाले,
अबला केनो मां एतो बले।"
महेंद्र -“किंतु देखता हूं, तुम तो अकेले हो?’’
भवानंद-“क्यो, अभी तो दो सौ आदमियो को देख चुके हो।”
महेंद्र-“क्या वे सब संतान है?’’
भवानंद-“हां सब संतान है।”
महेंद्र-“और कितने लोग है?’’
भवानंद-“इसी तरह हजारो है। धीरे-धीरे और बढ़ेगे।”
महेंद्र-“बहुत होगा, दस-बीस हो जाओगे- लेकिन क्या इतने से ही मुसलमान भाग जाएंगे? क्या वे सहज
ही राज्यच्युत होगे?’’
भवानंद-‘‘पलासी में अंग्रेजो की फौज कितनी थी?’’
महेंद्र -‘‘अंग्रेज और बंगाली बराबर है?’’
भवानंद -‘‘न कैसे बराबर होगे? शरीर मे अधिक बल होने से क्या गोला ज्यादा तेज चलता है?’’
महेंद्र-‘‘तब अंग्रेजो और मुसलमानो मे इतना अंतर क्यो है?’’
भवानंद -‘‘मान लो एक अंग्रेज प्राण जाने पर भी भागता नही, लेकिन एक मुसलमान पसीना होते ही
भागता है, शरबत की खोज करता है। इसके बाद मान लो, अंग्रेज जो करना चाहते है, करके छोड़ते है, उनमें
लगन होती है, लेकिन मुसलमान आरामतलब होते हैं, रुपयो के लिए प्राण देते हैं- उस पर तनखाह भी तो नही
पाते। सबसे अंतिम बात यह है कि अंग्रेज साहसी होते है। एक गोला एक ही जगह जाकर गिरेगा, दस जगह
नही, अतः एक गोले को देखकर दस आदमियो के भागने की क्या जरूरत है? एक गोले के छूटते ही
मुसलमान फौज-की-फौज भागती है। लेकिन सैकड़ो गोले देखकर भी एक अंग्रेज तो नही भागता।.....’’
महेंद्र-‘‘तुम लोग मे ये सब गुण हैं’’ भवानंद -‘‘नही, लेकिन गुण पेड़ो मे फलते तो नही, अभ्यास से
ही आते हैं’’
महेंद्र -‘‘तुम लोग क्या अभ्यास करते हो??’’
भवानंद -‘‘देखते नही हो, हम लोग सन्यासी हैं! हमारा सन्यास इसी अभ्यास के लिए है। कार्योंद्धार होने
पर, अभ्यास पूरा होने पर, हम लोग फिर गृहस्थ हो जाएंगे। हम लोगो के भी स्त्री-कन्या सब है।”
महेंद्र -‘‘तुम लोग उन सबको त्यागकर माया-मोह से परे हो सके हो?’’
भवानंद -‘‘संतान झूठ नही बोला करते- तुम्हारे सामने मे मिथ्या बड़ाई करना नही चाहता- माया से परे
कौन हो सकता है? जो कहे कि हमने माया काट दी है, शायद उसे माया-ममता कभी रही ही नही, या वह
मिथ्यावादी है। हम माया से परे नही हुए है, लेकिन हम लोग अपने इस व्रत की रक्षा करते है। तुम संतान
बनोगे?’’
महेंद्र -‘‘बिना अपनी स्त्री-कन्या का पता पाए और मिले, मैं कुछ नही कर सकता।”
भवानंद -‘‘चलो, तुम अपनी स्त्री-कन्या को देखोगे? चलो!’’
दोनो शांत राह चुपचाप तय करने लगे। भवानंद ने फिर वंदेमातरम् गाना शुरू किया। महेंद्र का गला भी
सुरीला था, संगीत मे कुछ अभ्यास और रुचि भी थी, अतः वे भी साथ ही गाने लगे। उन्होने देखा कि यह
अपूर्व देशगीत गाते-गाते आंखो मे जल आने लगता है। तब महेंद्र ने कहा -‘‘यदि स्त्री-कन्या का त्याग न
करना पड़े तो इस व्रत मे मुझे भी दीक्षित कर लो!’’
भवानंद -‘‘यह व्रत जो लेता है, उसे स्त्री-कन्या का त्याग करना ही पड़ता है। तुम यदि यह व्रत लेना
चाहोगे, तो स्त्री-कन्या से मुलाकात करने न पाओगे! उनकी रक्षा के लिए उपयुक्त प्रबंध कर दिया जाएगा,
लेकिन व्रत की सफलता तक उनका मुखदर्शन नही मिलेगा।''
महेन्द्र-‘‘तब मैं यह व्रत ग्रहण न करूंगा।’’
सबेरा हो गया है। वह जनहीन कानन अब तक अंधकारमय और शब्दहीन था। अब आलोकमय प्रातः काल मे
आनंदमय कानन के ‘आनंद-मठ’ सत्यानंद स्वामी मृगचर्म पर बैठे हुए संध्या कर रहे हैं। पास मे भी
जीवानंद बैठे हैं। ऐसे ही समय महेन्द्र को साथ में लिए हुए स्वामी भवानंद वहां उपस्थित हुए। ब्रह्मचारी
चुपचाप संध्या मे तल्लीन रहे, किसी को कुछ बोलने का साहस न हुआ। इसके बाद संध्या समाप्त हो जाने पर
भवानंद और जीवानंद दोनो ने उठकर उनके चरणो मे प्रणाम किया, पदधूलि ग्रहण करने के बाद दोनों बैठ
गए। सत्यानंद इसी समय भवानंद को इशारे से बाहर बुला ले गए। हम नही जानते कि उन लोगो मे क्या बाते
हुई। कुछ देर बाद उन दोनों के मंदिर मे लौट आने पर मंद-मंद मुसकाते हुए ब्रह्मचारी ने महेन्द्र से कहा-
‘‘बेटा! मैं तुम्हारे दुःख से बहुत दुःखी हूं। केवल उन्हीं दीनबंधु प्रभु की ही कृपा से कल रात तुम्हारी स्त्री और
कन्या को किसी तरह बचा सका।’’ यह उन्ही ब्रह्मचारी ने कल्याणी की रक्षा का सारा वृत्तांत सुना दिया। इसके
बाद उन्होंने कहा-‘'चलो वे लोग जहां हैं वही तुम्हे ले चले !’’
यह कहकर ब्रह्मचारी आगे-आगे और महेन्द्र पीछे देवालय के अंदर घुसे। प्रवेश कर महेन्द्र ने देखा- बड़ा ही
लंबा चौड़ा और ऊंचा कमरा है। इस अरुणोदय काल मे जबकि बाहर का जंगल सूर्य के प्रकाश मे हीरों के
समान चमक रहा हैं, उस समय भी इस कमरे मे प्रायः अंधकार है। घर के अंदर क्या है- पहले तो महेन्द्र यह
देख न सके, किंतु कुछ देर बाद देखते-देखते उन्हे दिखाई दिया कि एक विराट चतुर्भुज मूर्ति है, शंख-चक्र-
गदा-पद्मधारी, कौस्तुभमणि हृदय पर धारण किए, सामने घूमता सुदर्शनचक्र लिए स्थापित है। मधुकैटभ जैसी
दो विशाल छिन्नमस्तक मूर्तियां खून से लथपथ सी चित्रित सामने पड़ी हैं। बाएं लक्ष्मी आलुलायित-
कुंतला शतदल-मालामाणिडता, भयत्रस्त की तरह खड़ी हैं। दाहिने सरस्वती पुस्तक, वीणा और मूर्तिमयी राग-
रागिनी आदि से घिरी हुई स्तवन कर रही हैं। विष्णु की गोद मे एक मोहिनी मूर्ति-लक्ष्मी और सरस्वती से
अधिक सुंदरी, उनसे भी अधिक ऐश्वर्यमयी- अंकित हैं। गंधर्व, किन्नर, यक्ष, राक्षसगण उनकी पूजा कर रहे हैं।
ब्रह्मचारी ने अतीव गंभीर, अतीव मधुर स्वर मे महेन्द्र से पूछा-‘‘सब कुछ देख रहे हो?’’
महेन्द्र ने उत्तर दिया-‘‘देख रहा हूं’’
ब्रह्मचारी-‘‘विष्णु की गोद मे कौन हैं, देखते हो?’’
महेन्द्र-‘‘देखा, कौन हैं वह?’’
ब्रह्मचारी -‘‘मां!’’
महेन्द्र -‘‘यह मां कौन है?’’
ब्रह्मचारी ने उत्तर दिया -‘‘हम जिनकी संतान हैं। ’’
महेन्द्र -‘‘कौन हैं वह?’’
ब्रह्मचारी -‘‘समय पर पहचान जाओगे। बोलो, वंदे मातरम्! अब चलो, आगे चलो !’’
ब्रह्मचारी अब महेन्द्र को एक दूसरे कमरे मे ले गए। वहां जाकर महेंद्र ने देखा- एक अद्भुत शोभा-संपन्न,
सर्वाभरणभूषित जगद्धात्री की मूर्ति विराजमान है। महेन्द्र ने पूछा-‘‘यह कौन हैं?’’
ब्रह्मचारी-‘‘मां, जो वहां थी।’’
महेन्द्र-‘‘यह कौन हैं?’’
ब्रह्मचारी -‘‘इन्होने यह हाथी, सिंह आदि वन्य पशुओ को पैरो से रौंदकर उनके आवास-स्थान पर अपना
पद्मासन स्थापित किया। ये सर्वालंकार-परिभूषिता हास्यमयी सुंदरी है- यही बालसूर्य के स्वर्णिम आलोक आदि
ऐश्वर्यों की अधिष्ठात्री हैं- इन्हे प्रणाम करो !’’
महेंद्र ने भक्तिभाव से जगद्धात्री-रूपिणी मातृभूमि-भारतमाता को प्रणाम किया। तब ब्रह्मचारी ने उन्हे एक
अंधेरी सुरंग दिखाकर कहा-‘‘इस राह से आओ!’’ ब्रह्मचारी स्वयं आगे-आगे चले। महेंद्र भयभीत चित्त से
पीछे-पीछे चल रहे थे। भूगर्भ की अंधेरी कोठरी मे न जाने कहां से हलका उजाला आ रहा था। उस क्षीण
आलोक मे उन्हे एक काली मूर्ति दिखाई दी।
ब्रह्मचारी ने कहा-‘‘देखो अब मां का कैसा स्वरूप है !’’
महेंद्र ने कहा-‘‘काली?’’
ब्रह्मचारी-‘‘हां मां काली- अंधकार से घिरी हुई कालिमामयी समय हरनेवाली है इसीलिए नग्न है। आज देश
चारो तरफ श्मशान हो रहा है, इसलिए मां कंकालमालिनी हैं- अपने ‘शिव’ को अपने ही पैरो तले रौंद रही हैं।
हाय मां ! ब्रह्मचारी की आंखे से आंसू की धारा-बहने लगी।’’
ब्रह्मचारी -‘‘हमलोग संतान हैं। अपनी मां के हाथो मे अभी केवल अस्त्र रख दिए हैं। बोलो- वन्देमातरम् !‘‘
‘वन्देमातरम्- कहकर महेंद्र ने मां काली को प्रणाम किया।‘
अब ब्रह्मचारी ने कहा-‘‘इस राह से आओ !‘‘ यह कहकर वे दूसरी सुरंग मे चले। सहसा उन लोगो के
सामने प्रातः सूर्य की किरणे चमक उठी, चारो तरफ मधुर से पक्षी कूंज उठे। सामने देखा, एक संगमर्मर से
निर्मित विशाल मंदिर के बीच सुवर्ण-निर्मित दशभुज-प्रतिमा नव-अरूण की किरणा से ज्योतिर्मयी होकर हंस
रही हैं। ब्रह्मचारी ने प्रणाम कर कहा-‘‘ये हैं मां, जो भविष्यत मे उनका रूप होगा। इनके दशभुज दशो
दिशाओ मे प्रसारित हैं, उनमे नाना आयुधरूप मे नाना शक्तियां शोभित हैं। पैरो के नीचे शत्रु दबे हुए हैं, पैरो
के निकट वीर-केशरी भी शत्रु-पीड़न से मग्न है।’‘ दिक्भुजा-‘‘कहते-कहते सत्यानंद गद्गद् हो रोने लगे-
‘‘दिक्भुजा- नानाप्रहरणधारिणी, शत्रुविमर्दिनी, वीरेन्द्रपृष्ठविहारिणी, दाहिने लक्ष्मी भाग्यरूपिणी, बाएं वाणी
विद्याविज्ञानदायिनी- साथ मे शक्ति के आधार कार्तिकेय, कार्यसिद्धिरूपी गणेश- आओ, हम दोनो मां को प्रणाम
करे !‘‘ इस पर दोनो ही हाथ जोड़कर माता का रूप निहारते हुए प्रार्थना करने लगे-
‘‘सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुते ॥‘‘
दोनो के भक्ति-भाव से प्रणाम कर चुकने के बाद, भरे हुए गले से महेंद्र ने पूछा-‘‘ मां की ऐसी मूर्ति कब
देखने को मिलेगी?‘‘
ब्रह्मचारी ने कहा -‘‘जिस दिन मां की सारी सन्ताने एक साथ मां को बुलाएंगी, उसी दिन मां प्रसन्न होगी।‘‘
एकाएक महेंद्र ने पूछा -‘‘मेरी स्त्री-कन्या कहां हैं ?‘‘
ब्रह्मचारी-‘‘चलो, देखोगे? चलो !‘‘
महेंद्र -‘‘उन लोगो से भी एक बार मैं मिलूंगा, इसके बाद उन्हे बिदा कर दूंगा।‘‘.........
ब्रह्मचारी-‘‘क्यो बिदा करोगे?‘‘
महेंद्र -‘‘मै भी यह महामंत्र ग्रहण करूंगा!‘‘
ब्रह्मचारी -‘‘उन्हे कहां विदा करोगे?‘‘
महेंद्र ने विचारकर कहा-‘‘मेरे घर पर कोई नही है, मेरा दूसरा कोई स्थान भी नही है। इस महामारी के समय
और कहां स्थान मिलेगा।'
ब्रह्मचारी-''जिस राह से यहां आये हो, उसी राह से मंदिर से बाहर जाओ! मंदिर के दरवाजे पर तुम्हे स्त्री-
कन्या दिखाई देगी। कल्याणी अभी तक निराहार है। जहां वे दोनों बैठी है वही भोजन की सामग्री पाओगे। उसे
भोजन कराके तुम्हारी जो इच्छा हो करना। अब हम लोगो में से किसी से कुछ देर मुलाकात न होगी। यदि
तुम्हारा मन इधर होगा तो समय पर मै तुमसे मिलूंगा।''
इसके बाद ही किसी तरह से एकाएक ब्रह्मचारी अंतर्हित हो गए। महेंद्र ने पूर्व-परिचित राह से लौटकर
देखा- नाट्य मंदिर मे कल्याणी कन्या को लिए हुए बैठी है।
इधर सत्यानंद एक दूसरी सुरंग मे जाकर एक अकेली भूगर्भस्थित कोठरी मे उतर पड़े। वहां जीवानन्द और
भुवानंद बैठे हुए रुपये गिन-गिनकर रख रहे थे। उस कमरे मे ढेरो सोना, चांदी, तांबा, हीरे, मोती, मूंगे रखे हुए
थे। गत रात खजाने की लूट का माल ये लोग गिन-गिनकर रख रहे थे।
सत्यानंद ने कमरे मे प्रवेश कर कहा-''जीवानंद! महेंद्र हमारे साथ आएगा। उसके आने से संतानो का
विशेष कल्याण होगा। कारण आने से उसके पूर्वजो का संचित धन मां की सेवा मे अर्पित होगा। लेकिन जब
तक वह तन-मन-वचन से मातृभक्त न हो, तब तक उसे ग्रहण न करना। तुम लोगो के हाथ का काम समाप्त होने
पर तुम लोग भिन्न-भिन्न समय मे उसका अनुसरण करना, उचित समय पर उसे श्रीविष्णुमंडप मे उपस्थित
करना, और समय हो या कुसमय हो, उन लोगो की रक्षा अवश्य करना। कारण, जैसे दुष्टो का दमन और दलन
संतानो का धर्म है, वैसे ही शिष्टो की रक्षा करना भी संतानो का धर्म है!''
अनेक दुःखों के बाद महेंद्र और कल्याणी मे मुलाकात हुई। कल्याणी रोकर पछाड़ खा गिरी। महेंद्र और भी
रोए। रोने-गाने के बाद आंखो के पोछने की धूम मच गई। जितने बार आंखे पोंछी जाती थी, उतनीही बार
आंसू आ जाते थे। आंसू बंद करने के लिए कल्याणी ने भोजन की बात उठाई। ब्रह्मचारीजी के अनुचर जो
खाना रख गए थे, कल्याणी ने उसे खाने के लिए महेंद्र से कहा। दुर्भिक्ष के दिनो मे इधर अन्न भोजन की कोई
संभावना नही थी, फिर भी आसपास जो कुछ है, संतानो के लिए वह सुलभ है। वह जंगल साधारण मनुष्यो के
लिए अगम्य है जहां जिस वृक्ष मे जो फल होते है, उन्हे भूखे लोग तोड़कर खाते है, किंतु इस अगम्य वन के
वृक्षो का फल कोई नही पाता इसलिए ब्रह्मचारी के अनुचर ढेरो फल और दूध लाकर रख जाने में समर्थ हुए।
संन्यासीजी की सम्पत्ति मे अनेक गौएं भी है। कल्याणी के अनुरोध पर महेंद्र ने पहले कुछ भोजन किया, इसके
बाद बचा हुआ भोजन अकेले मे बैठकर कल्याणी ने खाया। उन लोगों ने थोड़ा दूध कन्या को पिलाया, बाकी
बचा हुआ रख लिया- फिर पिलाने की आशा ही तो माता-पिता का संतान के प्रति धर्म है। इसके बाद थकावट
और भोजन के कारण दोनों ने निंद्राभिभूत होकर आराम किया।
नीद से उठने के बाद दोनो विचार करने लगे-''अब कहां चलना चाहिए?'' कल्याणी ने कहा-''घर पर
विपद की संभावना समझकर हमने गृहत्याग किया था, लेकिन अब देखती हूं कि घर से भी अधिक कष्ट बाहर
है। न हो तो चलो, घर ही लौट चले!'' महेंद्र की भी यही इच्छा थी। महेंद्र की इच्छा है कि कल्याणी को घर
पर बैठाकर, कोई एक विश्वासी अभिभावक नियुक्त कर, इस परमरमणीय, अपार्थिव पवित्र मातृसेवा-व्रत को
ग्रहण करेगे। अतः इस बात पर वे सहज ही सहमत हो गए। अब दोनो ही प्राणियो ने थकावट दूर होने पर कन्या
को गोद मे लेकर फिर पदचिन्ह की तरफ यात्रा की।
किंतु पदचिन्ह जाने के लिए किस राह से जाना होगा- उस दुर्भेद्य वन मे वे कुछ भी समझ न सके। उन्होने
समझा था कि जंगल पार होते ही हमे राह मिल जाएगी और पदचिन्ह पहुंच सकेगे। लेकिन वहां तो बन का ही
थाह नही लगता है। बहुत देर तक वे लोग वन के अंदर इधर-उधर चक्कर लगाते रहे और बार-बार घूम-फिरकर
वे लोग मठ मे ही पहुंच जाते थे। उन्हे जंगल से पार होनेवाली राह मिलती ही न थी। यह देखते हुए सामने एक
वैष्णव वेशधारी खड़े हंस रहे थे। यह देखकर महेद्र ने रुष्ट होकर उनसे कहा-‘‘गोस्वामी! खड़े-खड़े हंसते
क्यो हो?’’
गोस्वामी बोले-‘‘तुमलोग इस वन मे आए कैसे?’’
महेद्र बोले-‘‘जैसे भी हो आ ही गए है!‘‘
गोस्वामी-‘‘प्रवेश कर सके तो बाहर क्यो नही निकल पाते हो?‘‘ यह करकर वैष्णव फिर हंसने लगे।
महेद्र ने वैसे ही रुष्ट स्वर में कहा-‘‘हंसते तो हो, लेकिन क्या तुम इसके बाहर निकल सकते हो?‘‘
वैष्णव ने कहा-‘‘मेरे साथ आओ, मै राह बता देता हूं। अवश्य ही तुम लोग ब्रह्मचारीजी के संग आए होगे,
अन्यथा न तो कोई यहां आ सकता है, न निकल ही सकता है। अपरिचितो के लिए यह भूल-भुलैया है।‘‘
यह सुनकर महेद्र ने कहा-‘‘आप भी सन्तान है?‘‘
वैष्णव ने कहा-‘‘हां, मैं भी सन्तान हूं। मेरे साथ आओ। तुम्हे राह दिखाने के लिए ही मैं यहां खड़ा हूं।‘‘
महेद्र ने पूछा -‘‘आपका नाम क्या है?‘‘
वैष्णव ने उत्तर दिया-‘‘मेरा नाम धीरानंद स्वामी है।‘‘
यह कहकर धीरानंद आगे-आगे चले और कल्याणी के साथ महेद्र पीछे-पीछे। धीरानंद ने एक बड़ी सी
दुर्गम राह से उन्हे जंगल के बाहर कर दिया और आगे की राह बता दी। इसके बाद वे फिर जंगल मे पलटकर
गायब हो गए।
आनंद-वन से बाहर निकल आने पर कुछ दूर तक राह चलने मे तो जंगल उनके एक बाजू रहा। जंगल की
बगल से ही शायद वह राह गई है। एक जगह जंगल मे से ही एक छोटी नदी कलकल कर बहती है। जल बहुत
ही साफ है, लेकिन देखने पर जंगल की छाया से जल भी काला दिखाई देता है। नदी के दोनो बाजू सघन
बड़े-बड़े वृक्ष मनोरम छाया किए हुए है, विभिन्न पक्षी उन पेड़ो पर बैठे कलरव कर रहे है। उनका कलरव-
कूजन, नदी की कलकल-ध्वनि से मिलकर अपूर्व श्रुतिमधुर जान पड़ता है। वैसे ही वृक्ष के रंग से नदी-जल
का रंग भी वैसा ही झलक रहा है। कल्याणी का मन भी शायद उस रंग मे मिल गया। कल्याणी नदी तट के एक
वृक्ष से लगकर बैठ गई। उन्होने अपने पति को भी बैठने को कहा। कल्याणी अपने पति के हाथो को अपने
हाथो मे लिए बैठी रही। फिर बोली-‘‘तुम्हे आज बहुत उदास देखती हूं। विपद जो आयी थी, उससे तो उद्धार
मिल गया है, अब इतना दुःख क्यो?‘‘
महेद्र ने एक ठंढी सांस लेकर कहा-‘‘मै अब अपने आपे मे नही हूं। मैं क्या करूं- कुछ समझ मे नही
आता।‘‘.....
कल्याणी-‘‘क्यो?‘‘
महेद्र-‘‘तुम्हारे खो जाने पर मेरा क्या हाल हुआ, सुनो!‘‘......
यह कहकर महेद्र ने अपनी सारी कहानी सविस्तार वर्णन कर दी।
कल्याणी ने कहा-‘‘मुझे भी बड़ी विपदो का सामना करना पड़ा, बहुत तकलीफ उठाई। तुम उन्हे सुनकर
क्या करोगे! इतने दुःखो पर भी मुझे कैसे नीद आई थी, कह नही सकती- कल आखिर रात भी मैं सोई थी।
नीद मे मैंने स्वप्न देखा। देखा- नही कह सकती, किस पुण्यबल से मैं एक अपूर्व स्थान मे पहुंच गई हूं। वहां
मिट्टी नही है, केवल प्रकाश- अति शीतल- बादल हट जाने पर जैसा प्रकाश रहता है, वैसा ही प्रकाश! वहां
मनुष्य नही थे, केवल प्रकाशमय मूर्तियां थी, वहां शब्द नही होता था, केवल दूर अपूर्व संगीत जैसी ध्वनि
सुनाई पड़ती थी। सदाबहार मल्लिका-मालती-गंधराज की अपूर्व सुगंध फैली थी। वहां सबसे ऊंचे दर्शनीय
स्थान पर कोई बैठा था, मानो आग मे तपा हुआ नील-कमल धधकता हुआ बैठा हो। उसके माथे पर सूर्य के
प्रकाश जैसा मुकुट था; उसके चार हाथ थे। उसके दोनो बाजू कौन था, मै पहचान न सकी, लेकिन कोई स्त्री-
मूर्ति थी। लेकिन उनमे इतनी ज्योति, इतना रूप, इतना सौरभ था कि मै उधर देखते ही विह्वल हो गई- उधर
ताक न सकी, देख न सकी कि वे कौन है? उन्ही चतुर्भुज के सामने एक स्त्री और खड़ी थी- वह भी
ज्योतिर्मयी थी, लेकिन चारो तरफ मेघ जैसा छाया था, आभा पूरी तरह दिखाई नही देती थी। अस्पष्ट रूप मे
जान पड़ता था कि वह नारीमूर्ति अति दुर्बल, मर्मपीड़ित, अनन्य-सुंदरी, लेकिन रो रही है। वहां के मंद-सुगंध
पवन ने मानो मुझे घुमाते-फिराते वहां चतुर्भुज मूर्ति के सामने ला खड़ा किया। उस मेघमंडिता दुर्बल स्त्री ने
मुझे देखकर कहा- यही है, इसी के कारण महेंद्र मेरी गोद मे आता नही है।‘........
इसके बाद ही एक अपूर्व वंशी जैसी मधुर ध्वनि सुनाई पड़ी। वह शब्द उन चतुर्भुज का था, उन्होने मुझे
कहा-‘‘तुम अपने पति को छोड़कर मेरे पास चली आओ! यह तुम लोगो की मां है महेंद्र इसकी सेवा करेगा।
तुम यदि पति के पास रहोगी तो वह इनकी सेवा न कर सकेगा। तुम चली जाओ।‘ मैंने रोकर कहा-‘‘पति को
छोड़कर मैं कैसे चली आऊं?‘‘ इसके बाद ही फिर उसी अपूर्व स्वर में उन्होने कहा-‘‘मै ही स्वामी, मै ही
पुत्र, मैं ही माता, मैं ही पिता और मैं ही कन्या हूं, मेरे पास आओ!‘‘ ‘‘मैंने क्या उत्तर दिया, मुझे याद नही,
लेकिन इसके बाद ही नीद खुल गई।‘‘ यह कहकर कल्याणी चुप हो रही।
महेंद्र विस्मित, स्तम्भित होकर चुप हो रहे। ऊपर पेड़ पर कोई पक्षी बोल उठा, पपीहा अपनी बोली से आकाश
गुंजाने लगा, कोकिल सप्त-स्वरो मे गाने लगी, भृंगराज की झनकार से जंगल गूंज उठा। पैरो के नीचे तरिणी
मृदु कल्लोल कर रही थी। बहुतेरे वन्य पुष्पो के सौरभ से मन हरा हो रहा था। कही-कही नदी-जल को सूर्य-
रश्मि चमका रही थी। कही ताड़ के पत्ते हवा के झोके से मरमरा रहे थे। दूर नीली पर्वत-श्रेणी दिखाई पड़ रही
थी। दोनो ही जन मुग्ध-नीरव हो यह सब देखते रहे। बहुत देर बाद कल्याणी ने फिर पूछा-‘‘क्या सोच रहे
हो?‘‘
महेंद्र-‘‘यही सोचता हूं कि क्या करना चाहिए? यह स्वप्न केवल विभीषिका मात्र है, अपने ही हृदय मे पैदा
होकर अपने ही मे लीन हो जाता है। चलो, घर चले!‘‘
कल्याणी-‘‘जहां ईश्वर तुम्हे जाने को कहते हैं, तुम वही जाओ!‘‘
यह कहकर कल्याणी ने कन्या अपने पति की गोद मे दे दी। महेंद्र ने उसे अपने गोद मे लेकर पूछा-‘‘और
तुम......तुम कहां जाओगी?‘‘
कल्याणी अपने दोनो हाथो से दोनो आंखो को ढंके हुए, साथ ही मस्तक पकड़े हुए बोली-‘‘मुझे भी
भगवान ने जहां जाने को कहा है वही जाऊंगी।‘‘
महेंद्र चौंक उठे। बोले-‘‘वहां कहां? कैसे जाओगी?‘‘
कल्याणी ने अपने पास की वही जहर की डिबिया दिखाई।
महेंद्र ने डरते हुए भौंचक्क होकर कहा-‘‘यह क्या? जहर खाओगी?‘‘
कल्याणी-‘‘मन मे तो सोचा था, खाऊंगी, लेकिन......‘‘
कल्याणी चुप होकर विचार मे पड़ गई, महेंद्र उसका मुं ह ताकते रहे- प्रति निमेष वर्ष-सा प्रतीत होने
लगा। उन्होने देखा कि कल्याणी ने बात पूरी न कही, अतः बोले-‘‘लेकिन के बाद आगे क्या कह रही थी?‘‘
कल्याणी-‘‘मन मे था कि खाऊंगी, लेकिन तुम्हे छोड़कर, सुकुमारी कन्या को छोड़कर बैकुंठ जाने की भी
मेरी इच्छा नही होती। मैं न मरूंगी!‘‘
यह कहकर कल्याणी ने विष की डिबिया जमीन पर रख दी। इसके बाद दोनो ही पी-पुरुष भूत-भविष्य की