सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 78 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 39

लिए उपयुक्त नही है। मायारज्जु से जिस का चित बंधा रहता है, खूंटे मे बंधी घोड़ी की तरह वह कभी स्वर्ग मे
पहुंच नही सकता।‘‘
महेन्द्र-‘‘महाराज ! बात मैंने ठीक-ठीक समझी नही। जो स्त्री-पुत्र का मुंह देखता है, वह क्या किसी गुरुतर
कार्य का अधिकारी नही हो सकता?‘‘
सत्यानन्द-‘‘पुत्र-कलत्र का मुंह देखने से हम देव कार्य भूल जाते है। सन्तान-धर्म का नियम काम और
किसी के लिए उपयुक्त नही है।‘‘
महेन्द्र-‘‘तो क्या न देखने से ही कन्या को भूल जाऊंगा?‘‘
सत्यानन्द-‘‘यदि न भूल सको तो यह व्रत ग्रहण न करो !‘‘
सत्यानन्द- ‘‘सन्तान दो तरह के हैं-दीक्षित और अदीक्षित। जो अदीक्षित है, वे या तो संसारी है अथवा
भिखारी। वे लोग केवल युद्ध के समय आकर उपस्थित हो जाते हैं ; लूट का हिस्सा या पुरस्कार पाकर फिर चले
जाते हैं। जो दीक्षित होते हैं, वे सर्वस्वत्यागी हैं। यही लोग सम्प्रदाय के कर्त्ता हैं। तुम्हें मैं अदीक्षित सन्तान
होने का अनुरोध न करूंगा। युद्ध के समय लाठी-लकड़ीवाले अनेक लोग हैं। बिना दीक्षित हुए सम्प्रदाय के
किसी गुरुतर कार्य के अधिकारी तुम हो नही सकते।‘‘
महेन्द्र- ‘‘दीक्षा क्या है? दीक्षित क्यो होना होगा? मै तो अब से पहले ही मन्त्र ग्रहण कर चुका हूं।‘‘
सत्यानंद- ‘‘उस मंत्र का त्याग करना होगा।‘‘
महेन्द्र- ‘‘मन्त्र का त्याग करूंगा कैसे?‘‘
सत्यानन्द- ‘‘मै वह पद्धति बता देता हूं।‘‘
महेन्द्र- ‘‘नया मन्त्र क्यो लेना होगा?‘‘
सत्यानन्द- ‘‘सन्तागण वैष्णव हैं।‘‘
महेन्द्र- ‘‘यह मैं समझ नही पाता हूं कि सन्तान वैष्णव कैसे है। वैष्णवो का तो अहिंसा ही परमधर्म होता
है।‘‘
सत्यानन्द- ‘‘वह चैतन्य देव का वैष्णव-धर्म है। नास्तिक बौद्ध धर्म के अनुकरण से जो वैष्णवता उत्पन्न
हुई थी, उसी का लक्षण है। प्रकृत वैष्णव-धर्म का लक्षण दुष्टो का दमन और धरित्री का उद्धार है। कारण,
भगवान विष्णु ही संसार के पालक हैं। उन्होने दस बार शरीर धारणकर पृथ्वी का उद्धार किया था। केशी,
हिरण्यकशिपु, मधु-कैटभ, पुर, नरक आदि दैत्यो का, रावणादि राक्षसो का तथा शिशुपाल आदि का संहार
उन्होने किया हैं। वही जेता, जयदाता, पृथ्वी के उद्धारकर्ता और सन्तानो के इष्ट देवता हैं। चैतन्यदेव का वैष्णव
धर्म वास्तविक वैष्णव-धर्म नही है-वह धर्म अधूरा है। चैतन्यदेव के विष्णु केवल प्रेममय है- लेकिन भगवान
केवल प्रेममय ही नही हैं, वे अनंत शक्तिमय भी हैं। चैतन्यदेव के विष्णु केवल प्रेममय ही नही हैं,वे अनंत
शक्तिमय भी है। चैतन्यदेव के विष्णु केवल प्रेममय हैं, सन्तानो के विष्णु केवल शक्तिमय है। हम दोनो ही
वैष्णव है-लेकिन दोनो ही अधूरे हैं। बात समझ गये?‘‘
महेन्द्र- ‘‘नही! यह तो कैसी नयी-नयी-सी बाते हैं। कासिमबाजार मे एक पादरी के साथ मेरी मुलाकात
हुई थी। उसने भी कुछ ऐसी ही बाते कही थी। अर्थात ईश्वर प्रेममय हैं-तुम लोग यीशु से प्रेम करो-यह भी
ऐसी ही बाते हैं!‘‘
सत्यानन्द- ‘‘जिस तरह की बातो से हमारे चौदह पुरखे समझते आते हैं-उसी तरह की बातो से हम तुम्हे
समझा रहे हैं। ईश्वर त्रिगुणात्मक हैं- यह सुना है?‘‘
महेन्द्र- ‘‘हा, सत्व, रजस, तमस-यही तीन गुण हैं।‘‘