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सर्वकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 78 में से

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पृष्ठ 38

सत्यानंद-“ भगवान ने स्वप्न में उसे प्राण-त्याग करने का आदेश किया था।”
भवानंद-“वह स्वप्नादेश क्या सन्तानो के कार्यों के लिए ही हुआ था?”
सत्यानंद-“महेन्द्र से मैंने ऐसा ही सुना है। अब संध्या समय उपस्थित है, मैं संध्यादि कृत्य के लिए जाता हूं।
इसके बाद नये सन्तानो की दीक्षा की व्यवस्था करूंगा।”
भवानंद-“सन्तानो की? क्या महेन्द्र के अतिरिक्त और भी कोई सन्तान-सम्प्रदाय मे सम्मिलित हुआ चाहता
है?”
सत्यानंद-“हां, एक और नय आदमी है। अब से पहले मैने उसे कही देखा नही था। आज ही मेरे पास
आया है। वह बहुत कोमल युवा पुरुष है। उसकी भाव-भंगी और बातो से मैं बहुत प्रसन्न हूं- खरा सोना जान
पड़ता है वह! उसके संतान- कार्य की शिक्षा का भार जीवानंद पर है। जीवानन्द लोगो को चित्त-आकर्षण कर
लेने मे बहुत पटु है।.... अब मैं जाऊंगा। तुम लोगो के प्रति मेरा एक उपदेश बाकी है। बहुत मन लगाकर उसे
सुनो!”
दोनो ही शिष्यो ने करबद्ध हो निवेदन किया-“आज्ञा दीजिये।”
सत्यानन्द ने कहा-“तुम दोनो से यदि कोई अपराध हुआ हो, या आगे करो, तो मेरे वापस आ जाने के पहले
प्रायश्चित न करना। मेरे आ जाने पर अवश्य ही प्रायश्चित करना होगा।”
यह कहकर सत्यानन्द स्वामी अपने स्थान पर चले गये। भवानन्द और जीवानन्द ने एक-दूसरे का मुंह ताका।
भवानन्द ने पूछा-“तुम्हारे ऊपर इशारा है क्या?”
जीवानन्द-“जान तो पड़ता है! बहन के घर में कन्या को पहुंचाने गया था।”
भवानन्द-“इसमे क्या दोष है? यह तो निषिद्धि नही है! ब्राह्मणी के साथ मुलाकात तो नही की है?”
जीवानन्द-“जान पड़ता है, गुरुदेव ऐसा ही समझते हैं?”
(4)
सायंकृत्य समाप्त करने के उपरान्त सत्यानन्द स्वामी ने महेन्द्र को बुलाकर कहा-“तुम्हारी कन्या जीवित है।”
महेन्द्र-“कहां है महाराज?”
सत्यानन्द-“तु मुझे महाराज क्यों कहते हो?”
महेन्द्र-“सब यह कहते है, इसलिए। मठ के अधिकारियो को भी राजा शब्द से सम्बोधित किया जाता है।
मेरी कन्या कहां है, महाराज?”
सत्यानन्द-“इसे सुनने के पहले एक बात का ठीक उत्तर दो- तुम सन्तान-धर्म ग्रहण करोगे?”
महेन्द्र-“इसे मैंने मन-ही-मन निश्चित कर लिया है।”
सत्यानन्द-“तब कन्या कहां है, सुनने की इच्छा न करो!”
महेन्द्र-“क्यो महाराज?”
सत्यानन्द-“जो यह व्रत ग्रहण करता है, उसे अपनी पी, पुत्र, कन्या, स्वजनो से किसी से भी सम्बन्ध नही
रखना पड़ता-स्त्री, पुत्र, कन्या का मुंह देखने से भी प्रायश्चित करना होता है। जब तक सन्तानो की मनोकामना
सिद्ध न हो, तब तक तुम कन्या का मुंह देख न सकोगे। अतएव यदि सन्तान-धर्म ग्रहण करना निश्चित हो, तो
कन्या का पता पूछकर क्या करोगे? देख तो पाओगे नही।....“
महेन्द्र-“यह कठिन नियम क्यो, प्रभु?”
सत्यानन्द-“संतानो का काम बहुत ही कठिन है। जो सर्वत्यागी है, उसके अतिरिक्त यह काम और किसी के