सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

२. द्वितीय अध्याय: अमनस्क राजयोग, मनोलय प्रक्रिया एवं नाद-लय

[ ३१ ]
की स्थिति है। इस प्रकार समरस और अद्वय रूप से अवस्थान ही
नाथस्वरूप से अवस्थान है।६२. इस समरसीकरण के लिए, गुरुकृपा
से पिण्डसंवित्ति के लिए शुद्ध या दिव्यदेह की आवश्यकता है। बिना
गुरु-कृपा और शुद्ध देह के इस लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो सकती। इसी-
लिए गोरक्ष के साधनमार्ग में यह कायसिद्धि आवश्यक मानी गयी
है, जिसका लक्ष्य समरसीकरण है।६३ नाथमतानुसार मोक्ष वह
अवस्था है, जिसमें समाधि के क्रम से मन द्वारा मन का अवलोकन
किया जाता है। इसी को आगे जीवन्मुक्ति पद कहा गया है।६४
इसी प्रकार इस जीवन्मुक्ति के लिए कायसिद्धि और कायसिद्धि के
लिए पिण्डज्ञान आवश्यक है। सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार योगी
को पिण्डगत नवचक्र, षोडशाधार, तीन लक्ष्य, पंचव्योम अवश्य
जानना चाहिए। अन्यत्र गोरक्ष ने कहा है कि जो योगी पिण्डगत
एक स्तम्भ, नव द्वार, पंचदेवता आदि को नहीं जानता, वह सिद्धि
नहीं प्राप्त कर सकता। तत्त्वविज्ञान की दृष्टि से ब्रह्माण्ड का जो
समतुल्य और विकासात्मक वर्णन प्रस्तुत किया गया है, उसका यही
प्रयोजन है।
उपर्युक्त समरसीकरण के लिए 'योगबीज' योगरहित ज्ञान और
ज्ञानरहित योग की निरर्थकता बतलाते हुए योगयुक्त ज्ञान को ही
मोक्षोपाय के रूप में स्वीकार करता है।६५ उपर्युक्त विवेचन से
मिलान करने पर संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि पिण्डसिद्धि
परमपद की प्राप्ति का अनिवार्य सोपान है। अर्थात् नाथों का
लक्ष्य जीवन्मुक्तियुक्त सिद्धदेह से नाथरूप से अवस्थान या पिण्डपद
का परमपद में समरसीकरण है।६६
६२. सि० सि० ग्र० व० ना० यो०-इंट्रो०, पृ० २१।
६३. नाथ और सन्त साहित्य—पृ० २७०-२७१।
६४. अमरौघशासनम् : पृ० ६।
६५. सि० सि० प०-२.३१। गोरक्ष संहिता-१.१३-१४। गोरक्षपद्धति-
१.१३-१४।
६६. नाथ और संतसाहित्य (तु० ग्र०) पृ० २७२-२७३। योगबीजम्-
श्लो० १५-१६।

[ ३२ ]
परिपक्व देह या सिद्धदेह की प्राप्ति के लिए योग ही उपाय है।
नाथयोगी हठयोग को प्रधान मानते हैं। हठयोग से राजयोग की
सिद्धि होती है। हठयोग प्राणायामप्रधान है। मन्त्रयोग, लययोग
और राजयोग में भी प्राणायाम और हठयोग सहायक है। प्राण
अधिभूत तत्त्व है। अतः इस दृष्टि से प्राणायाम या हठयोग आधि-
भौतिक साधन है। एक सफल ध्यानयोगी शरीर और स्वास्थ्य से
क्षीण, दुर्बल अल्पायु और रोगी हो सकता है किंतु वह अपनी इच्छा
से शरीर त्याग नहीं कर सकता। हठयोग की क्रियाओं से सिद्धदेह
या परिपक्व देह की प्राप्ति होती है। मानस साधन के लिए ऐसा
शरीर सर्वाधिक उपयुक्त और उचित माध्यम हो सकता है। ऐसे
योगी की मृत्यु इच्छा-मृत्यु होती है। गोरक्षनाथादि ने हठयोग या
उससे प्राप्त सिद्धियों को भी लक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया। ६७
हठयोगप्रदीपिका में स्पष्टतः कहा गया है कि राजयोग में आरूढ़
होने के लिए हठयोगविद्या का अभ्यास करना चाहिए। ६८
इस योगाभ्यास के आरम्भ के लिए नाथाचार्यों ने संयम का
विधान किया है। घेरण्डसंहिता की तरह ही स्वात्मारामरचित
हठयोगप्रदीपिका में भी हठयोग का अभ्यास आरम्भ करने के पूर्व
आहार, अपथ्य, पथ्य, भोजन आदि से सम्बद्ध संयमों के पालन का
उपदेश किया गया है। योगाभ्यास के प्रतिबन्धकों के विवरण में
अत्याहार, परिश्रम, प्रजल्पन ( या बहुभाषण ), यमग्रहण ( स्नान,
रात्रि में ही भोजनग्रहण, फलाहारादि का नियम ग्रहण ) जनसंगम,
चंचलता इन छः की गणना की गयी है। योगसाधकों में उत्साह,
साहस, धैर्य, तत्वज्ञान, निश्चय, जगत्संगपरित्याग इन छः की गणना
की गयी है। बताया गया है कि यम में मिताहार मुख्य है तथा
नियम में अहिंसा । ६९ हठयोगप्रदीपिका के यमनियमसम्बन्धी श्लोक
मूल श्लोकों में अन्तर्गणित नहीं हैं। वे ही श्लोक थोड़े-से अन्तर
से तांत्रिक ग्रन्थ 'शारदातिलक' में मिलते हैं।
६७. नाथयोग : अक्षयकुमार बनर्जी, पृ० १६ ।
६८. हठयोगप्रदीपिका १.१ ।
६९. हठयोगप्रदीपिका—१.५७-६३, १.१५, १६, १.३८, ४० । विस्तार के लिए
द्रष्टव्य—नाथ और सन्त साहित्य , पृ० २७५-२७७ ।

[ ३३ ]
हठयोग शब्द की विभिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं, जो इस
प्रकार हैं :
ह + ठ + योग = सूर्य + चन्द्र + योग
ह + ठ + योग = प्राण + अपान + योग
ह + ठ + योग = दक्षिण + वाम + योग
ह + ठ + योग = यमुना + गंगा + योग
ह + ठ + योग = पिंगला + इड़ा + योग
ह + ठ + योग = रजस् + रेतस् + योग ।७०
गोरक्षनाथ का योग षडंग है । अर्थात् इसमें आसन के बाद के
पंतजलि के ६ अंग स्वीकृत हैं । यम-नियम को सामान्यतया अनि-
वार्य समझकर छोड़ दिया है । आसनस्थैर्य के बाद प्राणायाम के
अभ्यास का विधान है । इस प्राणायाम का नाड़ीशोधन से घनिष्ठ
सम्बन्ध है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार प्राणायाम प्राण की
स्थिरता है। रेचक, पूरक, कुम्भक और संघट्टीकरण इसके चार
लक्षण हैं।७१ बताया गया है कि प्राणायाम के अभ्यास से यदि
पवन को गगन में प्रेरित किया जाय तो घंटा वाद्यादिकों की
ध्वनियां उत्पन्न होती हैं तथा सिद्धि की प्राप्ति की सम्भावना होती
है ।७२ इस प्रकार प्राणायामाभ्यास में अग्रसर होने पर उसका
संबंध नादानुसंधान से भी सिद्ध होता है । इस प्रकार आसन और
प्राणायाम के पूर्णाभ्यास से सम्पन्न होकर धारणा का अभ्यास करने
का विधान किया गया है ।७३ गोरक्षसंहिता, योगबीज आदि ग्रन्थों
में प्राणायाम के साथ मुद्रा, बन्ध, वेध का भी वर्णन सम्बद्ध भाव से
वर्णित है । किन्तु ऐसा मालूम होता है कि प्राणायाम की तुलना में
इन्हें अधिक महत्व नहीं दिया गया है । प्राणायाम से ओंकारसाधन
७०. हठयोगप्रदीपिका—१·१ तथा उसकी टीका, वही ३·१५ तथा उसकी
टीका, योगबीजम् १·८३-६०, नाथ सम्प्रदाय-पृ० १०३ ।
७१. सि० सि० प०—२·३५ ।
७२. गो० सं०—२·१८-२०; योगामार्तण्ड—१०८ ।
७३. गोरक्ष संहिता—२.२१,५२ ।

[ ३४ ]
भी सम्बद्ध है। ओंकारसाधन और अजपाजप दोनों ही प्राणायाम
में अन्तर्भूत हैं। 'ओंकार' की विस्तृत प्रतीकात्मक व्याख्या
गोरक्ष-ग्रन्थों में उपलब्ध है। गोरक्षादि सिद्धाचार्य इस प्रणव को
वेद का सार नहीं, वेद मानते हैं। इसी को शिवशक्ति-साधन भी
कहा गया है। ओंकार को आदिनाद कहा गया है। यह अनाहत
और अखण्ड है। इसका अनुसंधान ही नादानुसंधान है। अन्तस्
में इसकी सत्ता ही ब्रह्म की अन्तस् में सत्ता है। उसे नाद-ब्रह्म कहते
हैं। इसका अनुसंधान ब्रह्मानुसंधान है। ७४
सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार चैतन्य-तरंगों का प्रत्याहरण,
नाना प्रकार के विकारों से चित्त के ग्रस्त हो जाने के कारण उत्पन्न
विकारों से भी निवृत्ति प्रत्याहार का लक्षण है। गोरक्षसंहिता में
चक्षु आदि के अपने विषयों में विचरण से आहरण को प्रत्याहार
कहा गया है। प्रत्याहार से योगी अपने मानस-विकारों का मोचन
करता है। ७५ धारणा में बाह्य और अन्तस् के एकमात्र निजतत्त्वस्व-
रूप का अन्तःकरण से साधन किया जाता है। जो कुछ उत्पन्न
होता है, उसे निराकार में धारण—जीवात्मा का निर्वात दीप की
तरह धारण—ये धारणा के लक्षण हैं। इससे मानसस्थैर्य की प्राप्ति
बतायी गयी है। हृदय में पंचभूतों के पृथक् धारण तथा मानस के
निश्चलत्व के धारण के कारण ही इसे धारणा कहते हैं। भूत-तत्त्वों
के अनुसार ही यह धारणा भी पांच प्रकार की मानी जाती है। इन
धारणाओं के बाद सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार चित्त का निरा-
कार निजतत्त्व में एकत्व तथा आत्मा का निर्वातदीपत्व सिद्ध होना
चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि कुंडलिनी-योग की साधना धार-
णान्तर्गत है। इस कुंडलिनीयोग से हो लययोग, भूतजय, भूतलय,
भूतशुद्धि, षट्चक्रभेद आदि संबद्ध हैं। कुंडलिनी की मूलाधार से
से सहस्रार तक की यात्रा को पृथिवी से आकाश तक की यात्रा कहा
गया है। यह आध्यात्मिक यात्रा है। यह साधन आध्यात्मिक साधन
है। इस कुंडलिनी को षोडशी तथा उसकी साधना को षोडशीसाधना

७४. नाथ और संत साहित्य—पृ० २८३-२८८ ।
७५. सि० सि०प०—२.३६; गो० सं०—२.२३-३१; योग-मार्तण्ड ११३-११६ ।

[ ३५ ]
कहा गया है । पिण्ड-ब्रह्माण्ड-एकत्व का सिद्धान्त इस साधन का ही
सिद्धांत पक्ष है । गोरख-मत के मान्य चक्रों की कुछ निश्चित संख्या
नहीं बतायी जा सकती । फिर भी तांत्रिकों के कुल सात चक्र अधि-
कांशतः और सामान्यतः स्वीकृत हैं ।⁷⁶
सिद्धसिद्धान्तपद्धति में कहा गया है कि ध्यान परमाद्वैतभाव
है । जिन-जिन तत्वों या पदार्थों का स्फुरण होता है, आत्मा उनकी
अपने ही स्वरूप के अनुसार भावना करती है । इस प्रकार ध्यान में
सभी भूतों में समदृष्टि हो जाती है । इस ध्यान-साधन में चित्त पूर्ण-
रूप से निश्चल रहता है । सगुण और निर्गुण नामक दो प्रकार के
ध्यान बताये गये हैं । सगुण ध्यान विभिन्न वर्णों (रंगों) वाला होता
है तथा निर्गुण ध्यान केवल ज्ञानात्मक, अनुभृत्यात्मक । स्थूल
और सूक्ष्म भेद से भी ध्यान दो प्रकार का होता है । स्थूल ध्यान के
बाद तेजोध्यान या ज्योतिर्ध्यान और सूक्ष्म ध्यान का वर्णन किया
गया है ।⁷⁷ समाधि में सभी तत्वों की सम-अवस्था रहती है, निरू-
द्यमत्व और अनायास की स्थिति रहती है । इससे मोक्ष की प्राप्ति
होती है जिसमें शुभ-अशुभ कार्यों का त्याग हो जाता है, विश्वतो-
मुख अनन्त परम ज्योति का साक्षात्कार होता है । जब प्राण सम्यक्
प्रकार से क्षीण हो जाते हैं तथा मानस भी लय को प्राप्त हो जाता
है, जब समरसत्व की प्राप्ति हो जाती है, तब कहा जाता है कि
समाधि की अवस्था प्राप्त हो गयी । इस समय अपना - पराया कुछ
भी नहीं रहता । हठयोगप्रदीपिका में इस स्थिति के विभिन्न नाम
बताये गये हैं : राजयोग, समाधि, उन्मनी, मनोन्मनी, अमरत्व,
लय, तत्व, शून्याशून्य, परमपद, अमनस्क, अद्वैत, निरालम्ब, निरं-
जन, जीवन्मुक्ति, सहजा, तुर्या । इन शब्दों की अलग-अलग विस्तृत
व्याख्याएं मिलती हैं ।⁷⁸
इस प्रकार गोरख के षडंग-योग के दो उद्देश्य बताये गये हैं ।
७६. नाथ और संत साहित्य—पृ० २८८-२६६
७७. सि० सि० प०-२.३८; योगमार्तण्ड-१०२, १५७; गो० प०-२.६५-७५;
योगमार्तण्ड-१५६-१६६; घेरण्डसंहिता-६.२-२२ ।
७८. नाथ और संत साहित्य--पृ० २६७-२६८ ।

[ ३६ ]
प्रथम गौण उद्देश्य है सिद्धदेह या दिव्यदेह की प्राप्ति या जीवन्मुक्ति।
दूसरा मुख्य उद्देश्य है द्वैताद्वैत-विवर्जित नाथरूप में अवस्थान या
पिण्डपद का परमपद में समरसीकरण। संस्कृत-ग्रन्थों के आधार
पर उपस्थित किये गये इस गोरक्ष-योग में दो प्रधान साधन हैं :
हठयोग और लययोग। इसी प्रकार दो कार्य हैं:—विन्दुरक्षा और
नादानुसंधान। गोरक्ष योगसाधना का मुख्य तत्व है प्राणायाम।
दोनों कार्य इसी से साधित होते हैं। इसी आधार पर नाथ लोगों का
यह भी कथन है कि यह स्थूल शरीर भी मुक्ति प्राप्त करता है।
सिद्धदेह की प्राप्ति के लिए अमृतसाधन भी नाथों को स्वीकार्य है।
रस (पारद + अभ्रक) से सिद्धदेह की प्राप्ति की निन्दा गोरक्ष ने
अपनी हिन्दी रचनाओं में की है, क्योंकि उससे वास्तविक स्थिर
सिद्धदेह की प्राप्ति नहीं होती। गोरक्ष साधन में लोग वज्रोली,
सहजोली आदि की भी गणना करते हैं। किन्तु सारी सामग्री की
छानबीन करने पर ऐसा संगत प्रतीत नहीं होता कि गोरक्ष ने उनको
अपने साधन में स्थान दिया होगा अथवा उनका प्रचार किया
होगा।
इस प्रकार गोरक्षनाथ की दर्शन और साधना की परम्परा भारतीय
वैदिक परम्परा से भिन्न है। दार्शनिक और साधनात्मक दृष्टि से
विचार कर डा० गोपीनाथ कविराज ने श्री अक्षयकुमार बनर्जी के
‘फिलासफी आफ गोरक्षनाथ’ नामक ग्रन्थ की प्रस्तावना में कहा है
कि नाथों की योगसाधना का आदर्श पातंजल योग से ही तत्त्वतः
भिन्न नहीं है, प्रत्युत् पूर्ववर्ती और परवर्ती बौद्ध मतवादों के
साथ ही वह बहुत दूर तक शांकर वेदान्त से भी भिन्न है। प्राचीन
और मध्यकालीन आगमानुयायी अद्वैतवादी मतवादों से इस नाथा-
दर्श की पर्याप्त समानता है जिसे ‘सामरस्य’ कहा गया है। इसी
प्रकार नाथसिद्धों की पिण्डसिद्धि और पातंजल कायसंपत् में भी
पूर्ण साम्य नहीं है। नाथों का आदर्श है पिण्डसिद्धि से जीवन्मुक्ति
प्राप्त करना। तत्पश्चात् समरसीकरण के द्वारा परामुक्ति के आदर्श
को वे स्वीकार करते हैं। अतः अब इस निर्देश के प्रकाश में नाथ-
साधन और दर्शन के विचार की नई आवश्यकता स्पष्ट हो गयी है।
—नागेन्द्रनाथ उपाध्याय

स्वयंबोध अमनस्कयोग१
अमनस्कखण्ड२
प्रथमाध्याय३
कैलासशिखरासीनं सर्वज्ञं सर्वगं शिवम्४।
वामदेवो मुनिश्रेष्ठः प्रणम्य परिपृच्छति ॥ १ ॥
मुनिश्रेष्ठ वामदेव जी ने कैलास पर्वत के शिखर पर बैठे हुए सर्वज्ञ सर्व-
व्यापी भगवान् शिवजी को प्रणाम कर पूछा ॥ १ ॥
वामदेव उवाच-
देवदेव महादेव सर्वानुग्रहकारक५ ।
जीवन्मुक्तिप्रदोपायं कथयस्व मम प्रभो ॥ २ ॥
वामदेव जी ने कहा—सब पर अनुग्रह करनेवाले देवाधिदेव हे महादेव
जी ! हे प्रभो ! जीवन्मुक्ति प्रदान करनेवाला उपाय मुझसे कहने की कृपा
कीजिये ॥ २ ॥
१. (ख) अमनस्क योगशास्त्र । २. (ख) नहीं है । ३. (ख) नहीं
है । ४. (ख) नहीं है । ५. (ख) प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरुमापतिम् ।
जीवन्मुक्तिप्रदोपायं कथयस्वेति पृच्छति ।

[ २ ]
श्रीमहादेव उवाचः-
श्रृणु वत्स महाप्राज्ञ संसारार्णवतारकम् ।
अगम्यं सर्ववेदानां गोपितं सकलागमे ॥ ३ ॥
तदहं संप्रवक्ष्यामि तव संवीक्ष्य वासनाम् ।
अद्वैतं परमं चापि तव भक्तिरहैतुकी ॥ ४ ॥
श्री महादेव जी ने कहा—हे वत्स, हे महामते, ससार सागर से पार करने-
वाला जीवन्मुक्तिप्रद उपाय तुम सुनो, यह उपाय सब वेदों का अगम्य है, सब
आगमों में छिपाकर रखा हुआ है। तुम्हारी उत्कट अभिलाषा एवं परम
अद्वैत देखकर मैं तुमसे कहूंगा, क्योंकि तुम्हारी भक्ति अहैतुकी है ॥३॥४॥
अस्त्येकस्तारको योगः सर्वयोगोत्तमोत्तमः ।
स एव द्विविधः प्रोक्तः पूर्वापर विभागतः ॥ ५ ॥
सब योगों में परमोत्तम एक "तारक योग" है। वही "पूर्व" और
"अपर" विभाग से दो प्रकार का कहा गया है ॥ ५ ॥
पूर्वोक्तस्तारकस्तत्र अमनस्कस्तथापरः ।
प्रथमं तु प्रवक्ष्यामि पूर्वमङ्ग समासतः ॥ ६ ॥
उन योगों में 'पूर्व' जो कहा गया है उसका नाम "तारकयोग" है और
"अपर" जो कहा गया है वह "अमनस्क योग" है। पहले मैं अंगभूत 'पूर्व'
योग अर्थात् "तारक योग" को संक्षेप में कहूंगा ॥ ६ ॥
सर्वमूर्तिमयं रूपं गुणैरिन्द्रियमानदम् ।
द्विधा कृतं मनोयुक्तं तारकं सर्वसारकम् ॥ ७ ॥
सर्वमूर्तिमय, गुणों से इन्द्रियों को रुचिकर योग स्वरूप दो प्रकार
का किया गया है। उनमें मन से युक्त जो योगस्वरूप है वह 'तारक'
कहलाता है और मन से अतीत जो योगस्वरूप है वह सर्वसार 'अमनस्क' कहा
जाता है ॥ ७ ॥
१. (ख) ईश्वर उवाच । परं ज्ञानमहं वच्मि येन तत्त्वं प्रकाशते । येन
विच्छिद्यते सर्वमाशापाशादि बन्धनम् ॥ २२ ॥

[ ३ ]
तारे ज्योतिषि संयोज्य किञ्चिदुन्नमयन् भ्रुवौ ।
पूर्वयोगस्य मार्गोऽयमुन्मनीकारकः क्षणात् ॥ ८ ॥१
तारों ( आंख की पुतलियों ) को ज्योति में लगा कर भौंहो को कुछ ऊंची
करे ( चढ़ा ले ) । यह पूर्वयोग ( तारकयोग ) का मार्ग क्षणभर में उन्मनी-
भाव को उत्पन्न करता है ॥ ८ ॥
एष योगो मया प्रोक्तः पूर्वापरविभागतः ।
सर्वमंगल सिद्धार्थं न देयो यस्य कस्यचित् ॥ ६ ॥२
इस योग का पूर्वयोग और अपरयोग के विभाग से सब कल्याणों की
सिद्धि के लिए मैंने प्रतिपादन किया है। इसे जिस किसीको योग्यता का
विचार किये बिना नहीं देना चाहिये ॥ ६ ॥
मन्त्रयोगरताः ३ केचित् केचिद् ध्यान विमोहिताः ।
जपेन केचित् क्लिश्यन्ति नैव जानन्ति तारकम् ॥ १० ॥
कोई लोग मन्त्रयोग की साधना में लगे हुए हैं, कोई ध्यान के मोह में
पड़े हुए हैं, कोई जप योगसे क्लेश पा रहे हैं, ये सब तारक योग को नहीं
ही जानते हैं ॥ १० ॥
केचिदागमजालेन केचिन्निगमसंकुलैः ।
केचित्तर्केण मुह्यन्ति नैव जानन्ति तारकम् ॥ ११ ॥
कोई आगम-समुदाय से, कोई निगमराशियों से और कोई तकों से मोहित
हैं। ये सब तारक को नहीं ही जानते हैं ॥ ११ ॥
१. गंगायमुनयोर्मध्ये बालरण्डा तपस्विनी ।
बलात्कारेण गृह्णीयात् तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ हठयोगप्रदीपिका ३ :
१०६ के इस श्लोक में उपर्युक्त श्लोक के भावानुसार ही उन्मनी भाव
अथवा विष्णु पद का व्याख्यान है।
२. ( ख ) श्लोक सं० ५ से ६ तक नहीं है।
३. (ख) 'तन्त्र योगरताः' पाठ है। इसके पूर्व (ख) में-
आधारादिषु चक्रेषु सुषुम्णादिषु नाडिषु ।
प्राणादिषु शरीरेषु परं तत्वं न तिष्ठति ॥ -यह श्लोक है।

[ ४ ]
तारको यं भवाम्भोधौ तारणे गुरुशिष्ययोः १ ।
तारकोन्मेषयुक्तत्वादपि तारक उच्यते ॥ १२ ॥
यह तारक योग भवसागर में गुरु और शिष्य दोनों का तारण करता है।
तारिका के उन्मेष२ से युक्त होने के कारण यह “तारक” कहा जाता है ॥१२॥
न मीमांसातर्कग्रह३गणितसिद्धान्तपठनै -
र्न वेदैर्वेदान्तैः स्मृतिभिरभिधानैरपि न च ।
न चापिच्छन्दोव्याकरणकवितालंकृतिगणै४ -
र्मुनेस्तद्व्याप्ति५र्निजगुरुमुखादेव विहिता ॥ १३ ॥
मुनि को तारक योग की विशिष्टरूप से प्राप्ति न तो मीमांसा, तर्क (न्याय)
तथा फलित, गणित और सिद्धान्तरूप त्रिस्कन्ध ज्योतिष पढ़ने से होती है,
न वेद, वेदान्त, स्मृति और कोषों के अनुशीलन से होती है एवं न छन्दःशास्त्र,
व्याकरण, काव्य और अलंकारों के अध्ययन से होती है। एकमात्र अपने गुरु
के मुखारविन्द से उसकी विशिष्ट प्राप्ति शास्त्रों में कही गई है ॥ १३ ॥
दृष्टिः स्थिरा यस्य विनैव दृश्यं,
वायुः स्थिरो यस्य विना प्रयत्नम् ।
चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बं,
स एव योगी स गुरुः स सेव्यः ॥ १४ ॥
दृश्य के बिना ही जिसकी दृष्टि स्थिर हो जाय, विना किसी प्रकार के
प्रयत्न के जिसका वायु स्थिर हो जाय एवं विना किसी अवलम्बन के जिसका
चित्त स्थिर हो जाय, वही योगी, है वह गुरु होने योग्य है, उसी की सेवा
करनी चाहिये ॥ १४ ॥
१. (ख) ११ और १२ वाँ श्लोक नहीं है ।
२. संसार सागर से उत्तीर्ण करनेवाली शक्ति का जागरण । इस शक्ति को
चित्-शक्ति, बोध शक्ति या कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं ।
३. (ख) तर्कसंग्रह । ४. (ख) लंकृतिमयै-
५. (ख) तत्वं प्राप्ति ।

गोरक्षासन ( आगेकी बाजू )
ऊर्ध्व पद्मासन
शीर्षासन
गोरक्षासन ( पीछेकी बाजू )

अर्ध मत्स्येन्द्रासन ( पीछेकी बाजू )
पद्मासन
पूर्ण मत्स्येन्द्रासन ( आगेकी बाजू )
कर्णपीडासन

[ ५ ]
एवंविधगुरोः१शब्दात् सर्वचिन्ताविवर्जितः ।
स्थित्वा मनोहरे देशे योगमेव समभ्यसेत् ॥ १५ ॥
इस प्रकार के गुरु के उपदेशानुसार सब प्रकार की चिन्ताओं से
रहित होकर सुन्दर प्रदेश में बैठकर योग का ही सम्यक् अभ्यास करना
चाहिये ॥१५॥
विविक्तदेशे सुखसंनिविष्टः
समासने किञ्चिदुपेत्य पश्चात् ।
बाहुप्रमाणं स्थिरदृक् स्थिराङ्ग-
श्चिन्ताविहीनोऽभ्यसनं कुरुष्व ॥ १६ ॥
सब प्रकार की चिन्ताओं से रहित हो एकान्त स्थान में सम आसन पर
कुछ पीछे की ओर झुक कर यानी तन कर स्थिर अंग हो सुख पूर्वक बैठ कर
एक हाथ तक स्थिर दृष्टिकर योग का अभ्यास करो ॥ १६ ॥
एवमभ्यसतो योगं मनो भवति सुस्थिरम् ।
वायुवाक्कायदृष्टीनां स्थिरता च तथा तथा ॥ १७ ॥
इस प्रकार योग का सभ्यास करते करते मन सुस्थिर हो जाता है, क्रमशः
वायु, वाणी, देह और दृष्टि में भी स्थिरता आ जाती है ॥ १७ ॥
जायमानामनस्कस्य उदासीनस्य सर्वतः ।
मृदुत्वं च लघुत्वं च शरीरस्योपजायते ॥ १८ ॥
जिसको अमनस्क योग की प्राप्ति हो रही हो और जो सब ओर से
उदासीन हो ऐसे योगी के शरीर में मृदुता ( कोमलता ) लघुत्व ( हल्कापन )
हो जाता है ॥ १८ ॥
१. ऐसे सद्गुरु के विषयमें हठयोगप्रदीपिका में लिखा है कि—
“दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥

[ ६ ]
काषायग्रहणं कपालधरणं केशावलीलुंचनं¹।
पाखण्डव्रतभस्मचीवरजटाधारित्वमुन्मत्तता ॥
नग्नत्वं निगमागमादिकवितागोष्ठीसभाभ्यन्तरे,
सर्वं चोदरपूरणाय² पठनं न श्रेयसः कारणम् ॥ १६ ॥
काषाय ( गेरुवे ) वस्त्र धारण करना, खप्पर धारण करना, केशों को
नोचना, पाखण्डव्रत लेना, भस्म, कन्था और जटा धारण करना, उन्मत्तवत्
रहना, नग्न रहना, सभाओं में निगम और आगमों पर व्याख्यान
झाड़ना, काव्य गोष्ठी में भाग लेना यह उदरपूर्ति के लिए है। पढ़ना
निःश्रेयस् का साधन नहीं है। अर्थात् पठन से निःश्रेयस् की प्राप्ति नहीं हो
सकती ॥ १६ ॥
³द्वेषोच्चाटनमारणादि कुहकैर्मन्त्रैः प्रपंचोद्गमः⁴
सर्वाभ्यास⁵ विचित्रदन्धकरणाद्यज्ञानयोगः परः⁶।
ध्यानं देहपदेषु नाडिषु षडाधारे च चेतोभ्रम-
स्तस्मात् तत्सकलं मनोविरचितं त्यक्त्वाऽमनस्कं भज ॥२०॥
द्वेष ( विद्वेषण ), उच्चाटन, मारण आदि प्रवचनाओं से युक्त मन्त्रों से
प्रपंच की उत्पत्ति होती है, पूर्ण अभ्यास, भाँति भाँति के आसनबन्धों का
करना केवल अज्ञान ही ह, देहस्थित नाड़ियों में तथा षडाधार चक्रों में
ध्यान केवल चित्त का विभ्रम है, इसलिए मन से कल्पित इन सब का त्याग
कर अमनस्क का सेवन करो ॥ २० ॥
१. (ख) मुंचनं । यही पाठ अच्छा प्रतीत होता है। उसका अर्थ होगा केशों का
त्याग अर्थात् मुण्डित होना ।
२. (ख) पूरणार्थपठनम् ।
३. (ख) रक्षोच्चाटन ।
४. (ख) मन्त्रप्रपंचोद्गमैः ।
५. (क) पूर्णाभ्यास ।
६. (क) अज्ञानबोधिः परम् (ख) अज्ञानभोगः परः ।

[ ७ ]
अन्ये च जगतो भावा ये च तिष्ठन्त्यनेकधाः।
तेषां तु लक्षकेणापि परतत्त्वं न मीयते¹ ॥ २१ ॥
और भी जगत् के जो विविध प्रकार के पदार्थ हैं उनके लक्ष से भी परम
तत्त्व की बराबरी नहीं की जा सकती। अर्थात् उनकी लाख लाख संख्या से
भी पर तत्त्व की समता नहीं की जा सकती, क्योंकि जागतिक पदार्थों में और
परतत्त्व में अत्यन्त विलक्षणता है। मूल में 'परतत्त्वं न गीयते' यह पाठ
मानने पर 'लाखों जागतिक पदार्थों से परतत्त्व का निरूपण नहीं किया जा
सकता' यह अर्थ होगा ॥ २१ ॥
अथाहं वच्मि मोक्षाय ज्ञानरागजितां² नृणाम्।
निष्कलं निष्प्रपञ्चं च³ परतत्त्वं तदुच्यते ॥ २२ ॥
अब मैं ज्ञान से राग पर विजय प्राप्त करनेवाले लोगों की मुक्ति के लिये
परतत्त्व का निरूपण करता हूँ। निष्कल और निष्प्रपंच जो तत्त्व है वह
परतत्त्व कहा जाता है ॥ २२ ॥
यस्मादुत्पद्यते सर्वं यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम्।
यस्मिन् विलीयते सर्वं परतत्त्वं⁴ तदुच्यते ॥ २३ ॥
जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है, जिसमें सब स्थित हैं और जिसमें सब
लीन होते हैं वह "पर तत्त्व" कहा जाता है ॥ २३ ॥
भावाभावविनिर्मुक्तं विनाशोत्पत्तिवर्जितम्।
सर्वसंकल्पनातीतं परतत्त्वं⁵ तदुच्यते ॥ २४ ॥
सत् (अस्ति), असत् (नास्ति), सदसत् (अस्तिनास्ति) और असत्-
असत् (नास्तिनास्ति) इस चतुष्कोटि से विनिर्मुक्त, विनाश और उत्पत्ति से
रहित एवं सर्व कल्पनाओं से अतीत जो तत्त्व है वह "परतत्त्व" कहा
जाता है ॥ २४ ॥
१. (ख) तेषां तु लक्षणेनापि परं तत्त्वं न गीयते। (क) परतत्त्वं न गीयते ।
२. (ख) ज्ञानं रागजिताम् । ३. (ख) निष्प्रपंचं यत् परं तत्त्वं ।
४. (ख) परं तत्त्वं तदुच्यते ।
५. (ख) परं तत्त्वं तदुच्यते ।

[ ८ ]
अनाकारमविच्छिन्नमग्राह्यमचलं ध्रुवम् ।
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सर्वकामविवर्जितम् ॥ २५ ॥
परम तत्त्व निराकार, अविच्छिन्न अर्थात् जन्म, मरण आदि से रहित
अर्थात् शाश्वत, मन और वाणी का अगम्य, निश्चल, अविनश्वर, सब उपा-
धियों से रहित एवं सब कामनाओं से शून्य है ॥ २५ ॥
प्रथमं पृथिवीतत्त्वं जलतत्त्वं द्वितीयकम् ।
तेजस्तत्त्वं तृतीयं च¹ वायुतत्त्वं चतुर्थकम् ॥ २६ ॥
आकाशं पंचमं तत्त्वं मनः षष्ठमुदीरितम् ।
सप्तमं परमं तत्त्वं यो जानाति स मोक्षभाक् ॥ २७ ॥
पहला पृथिवी तत्त्व कहा गया है, दूसरा जलतत्त्व, तीसरा तेजस्तत्त्व,
चौथा वायुतत्त्व, पाँचवाँ आकाश तत्त्व, एवं छठाँ मनस्तत्त्व कहा गया
है । सातवाँ परम तत्त्व है उसे जो जानता है वह मोक्ष को प्राप्त
होता है ॥ २६ ।: २७ ॥
परं तत्त्वं समाख्यातं जन्मबन्धविनाशनम् ।
तस्याभ्यासं प्रवक्ष्यामि येन संजायते लयः ॥ २८ ॥
“परतत्त्व” जन्मरूप बन्धन का विनाशक कहा गया है। मैं उसके अभ्यास
की विधि बतलाऊंगा जिससे लय होता है ॥ २८ ॥
विविक्तदेशे सुखसंनिविष्टः
समासने किंचिदुपेत्य पश्चात् ।
बाहुप्रमाणं स्थिरदृक् स्थिरांग-
श्चिन्ताविहीनोऽभ्यसनं² कुरुष्व ॥२६॥³
निर्जन और पवित्र स्थान में सम आसन पर कुछ पीछे की ओर झुक कर
अर्थात् तन कर सुख से बैठे हुए तुम एक हाथ दूर तक दृष्टि को स्थिर कर
निश्चल शरीर और चिन्ताविहीन होकर उस परमतत्त्व का अभ्यास
करो ॥ २६ ॥
१. (ख) स्यात् ।
२. (ख) स्थिरांगं । ३. श्लोक १६ की यहाँ पर जो पुनरावृत्ति हुई है
इसका कारण आसन के पश्चात् ही ध्यान की प्रक्रिया द्वारा अमनस्क
योग का निरूपण करना है ।

भुजंगासन
पश्चिमोत्तानासन
मत्स्यासन

पृर्वोत्तानासन ( हलासन )
शवासन
मयूरासन ( सव्य )

[ ६ ]
सुखासने समासीनस्तत्त्वाभ्यासं समाचरेत् ।
सदाभ्यासेन तत्कुर्यात् परतत्त्वप्रकाशनम्१ ॥ ३० ॥
सुखासन पर बैठकर परतत्त्व का अभ्यास करना चाहिये । साधक को
चाहिये कि सदा के अभ्यास द्वारा उस परतत्त्व को प्रकाश में लावे ॥ ३० ॥
ब्रह्माण्डं पंचभूतस्थं पंचभूतमयी तनुः ।
सर्वं भूतमयं चेति२ त्यक्त्वा नास्तीति चिन्तय३ ॥३१॥
सारा ब्रह्माण्ड पंचभूतों पर आधृत है, शरीर भी पंचभूतमय है, यही
क्यों सब कुछ भूतमय है, इसलिए उन सबका परित्याग कर “ये है ही नहीं”
ऐसी भावना करो ॥ ३१ ॥
न किंचिन्मनसा ध्यायेत्सर्वचिन्ता विवर्जितः ।
सबाह्याभ्यन्तरे योगी जायते तत्त्वसंमुखः ॥ ३२ ॥४
सब तरह की चिन्ताओं से रहित होकर मन से किसी का भी चिन्तन न
करे ऐसे योगी के बाहर और भीतर तत्त्व सम्मुख हो जाता है अर्थात् उसे
बाहर और भीतर तत्त्व का स्फुरण हो जाता है ॥ ३२ ॥
तत्त्वस्य संमुखे जाते अमनस्क५ प्रजायते ।
असनस्केऽपि संजाते चित्तादि६विलयो भवते ॥ ३३ ॥
तत्त्व के संमुख होने पर७ अमनस्क योग हो जाता है । अमनस्क योग की
प्राप्ति होने पर चित्त आदि का भली भांति लय हो जाता है ॥ ३३ ॥
१. (ख) परं तत्त्वं प्रकाशते ।
२. (ख) वेति ।
३. (ख) भावयेत् ।
४. हठयोगप्रदीपिका में भी लिखा है कि :-
बाह्यचिन्ता न कर्तव्या तथैवान्तरचिन्तनम् ।
सर्वचिन्ता परित्यज्य न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥
५. (ख) त्वमनस्कं ।
६. (ख) चिन्तादिविलयो ।
७. आत्मा के संमुख होने पर ।

[ १० ]
चित्तादिविलये जाते पवनस्य लयो भवेत्¹ ।
मनःपवनयोर्नाशादिन्द्रियार्थं विमुञ्चति ॥ ३४ ॥
चित्त आदि का विलय हो जाने पर पवन ( वायु ) का लय हो जाता
है । मन और पवन दोनों का विनाश ( विलय ) होने पर साधक इन्द्रियार्थों
( रूप, शब्द, गन्ध, रस और स्पर्श ) का त्याग कर देता है । 'इन्द्रियार्थाद्
विमुच्यते' ऐसा पाठ मानने पर इन्द्रियार्थों से मुक्त हो जाता है, यह अर्थ
करना चाहिये ॥ ३४ ॥
इन्द्रियार्थैर्यदा मुक्तो² बाह्यज्ञानं न जायते ।
बाह्यज्ञाने विनष्टे च ततः सर्वसमो भवेत् ॥ ३५ ॥
जब साधक इन्द्रियार्थों से ( रूप, शब्द, गन्ध आदि से ) मुक्त हो जाता
है तब उसे बाहरी ज्ञान नहीं होता है । बाहरी ज्ञान के विनष्ट होने पर वह
“सर्वसम” यानी विषमता रहित हो जाता है ॥ ३५ ॥
यदा सर्वसमे जाते³ भवेद् व्यापारवर्जितः ।
परब्रह्मणि⁴ सम्पन्नो⁵ योगी प्राप्तलयस्तदा ॥ ३६ ॥
जब साधक सर्वसम होने पर व्यापाररहित होता है तब परब्रह्म में सम्पन्न
योगी लय को प्राप्त कहा जाता है । ३६ ॥
सदाभ्यासरतानां च यः परो जायते लयः ।
तस्याहं संप्रवक्ष्यामि लक्षणं मुक्तचेतसः ॥ ३७ ॥
सदा परतत्त्व के अभ्यास में निरत योगियों का जो उत्कृष्ट लय होता
है उसका, जिसमें चित्त मुक्त हो जाता है, लक्षण मैं आगे कहूँगा ॥ ३७ ॥
१. ( ख ) यह पूरी पंक्ति नहीं है ।
२. (ख) इन्द्रियार्थे विनिर्मुक्ते ।
३. (ख) यदासर्वसमो जातो ।
४. (ख) परे ब्रह्मणि ।
५. (ख) संबुद्धः ।