अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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हठयोग शब्द की विभिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं, जो इस
प्रकार हैं :
ह + ठ + योग = सूर्य + चन्द्र + योग
ह + ठ + योग = प्राण + अपान + योग
ह + ठ + योग = दक्षिण + वाम + योग
ह + ठ + योग = यमुना + गंगा + योग
ह + ठ + योग = पिंगला + इड़ा + योग
ह + ठ + योग = रजस् + रेतस् + योग ।७०
गोरक्षनाथ का योग षडंग है । अर्थात् इसमें आसन के बाद के
पंतजलि के ६ अंग स्वीकृत हैं । यम-नियम को सामान्यतया अनि-
वार्य समझकर छोड़ दिया है । आसनस्थैर्य के बाद प्राणायाम के
अभ्यास का विधान है । इस प्राणायाम का नाड़ीशोधन से घनिष्ठ
सम्बन्ध है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार प्राणायाम प्राण की
स्थिरता है। रेचक, पूरक, कुम्भक और संघट्टीकरण इसके चार
लक्षण हैं।७१ बताया गया है कि प्राणायाम के अभ्यास से यदि
पवन को गगन में प्रेरित किया जाय तो घंटा वाद्यादिकों की
ध्वनियां उत्पन्न होती हैं तथा सिद्धि की प्राप्ति की सम्भावना होती
है ।७२ इस प्रकार प्राणायामाभ्यास में अग्रसर होने पर उसका
संबंध नादानुसंधान से भी सिद्ध होता है । इस प्रकार आसन और
प्राणायाम के पूर्णाभ्यास से सम्पन्न होकर धारणा का अभ्यास करने
का विधान किया गया है ।७३ गोरक्षसंहिता, योगबीज आदि ग्रन्थों
में प्राणायाम के साथ मुद्रा, बन्ध, वेध का भी वर्णन सम्बद्ध भाव से
वर्णित है । किन्तु ऐसा मालूम होता है कि प्राणायाम की तुलना में
इन्हें अधिक महत्व नहीं दिया गया है । प्राणायाम से ओंकारसाधन
७०. हठयोगप्रदीपिका—१·१ तथा उसकी टीका, वही ३·१५ तथा उसकी
टीका, योगबीजम् १·८३-६०, नाथ सम्प्रदाय-पृ० १०३ ।
७१. सि० सि० प०—२·३५ ।
७२. गो० सं०—२·१८-२०; योगामार्तण्ड—१०८ ।
७३. गोरक्ष संहिता—२.२१,५२ ।