सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

[ ११ ]
कथाओं में इन सबके प्रमाण मिलते हैं। इसी निपुणता के आधार
पर कहीं-कहीं उन्हें विद्याधर भी कहा गया है।१८
प्रायः देखा जाता है कि इस प्रकार के नैपुण्य, सौन्दर्य, गुणवत्ता
से सम्पन्न होने पर व्यक्ति चरित्र और नैतिकता की दृष्टि से क्षीण हो
जाता है अथवा उन्हें सम्हाल नहीं पाता। गोरक्षचरित्र गुण और
शक्ति दोनों का मणिकांचन योग है। ब्रह्मचर्यपरायण और हठयोगा-
चारनिष्ठ नैतिकता से सम्पन्न योगिसम्प्रदाय के विकास का मूल
श्रेय गोरक्षनाथ को ही है। ऐसे व्यक्ति की रचनाओं में प्राप्त उप-
देशों से यह बात स्पष्ट प्रकट होती है कि गोरक्ष ने इस प्रकार संयम-
पूर्ण ब्रह्मचर्यपरायण योग का उपदेश देकर यदि उसे जीवन में न
उतारा होता तो नाथयोगिसंप्रदाय का यह रूप आज न रहा होता।
उनकी कथनी और करनी में अभेद था, यह मानकर ही हम उनकी
रचनाओं के आधार पर उनके जीवनचरित्र और गुणों का निष्कर्ष
निकाल सकते हैं। चार महासिद्धों की पार्वती द्वारा जो परीक्षा ली
गयी, उसमें गोरक्ष को छोड़कर और सभी विचलित होगये। गोरक्ष
ने अविचल भाव से ऐसी अप्रतिम सुन्दरी के मातृरूप की ही
आकांक्षा की और उसकी गोद में बैठकर स्नेहामृत प्राप्त करने की
इच्छा व्यक्त की। इस कथांश के आधार पर दो बातें अनुमित की
जा सकती हैं। एक तो यह कि गोरक्ष नारी के केवल मातृरूप के
पूजक और समर्थक थे और उन्होंने जीवन के लिए ब्रह्मचर्य, संयम,
उद्वेगरहित हृदयमार्ग को उचित माना था। यदि उन्होंने इसे आच-
रित न किया होता तो वे निश्चय ही मत्स्येन्द्र के उद्धार के लिए न
जाकर स्वयं उसी में रम गये होते। उनकी रचनाओं में यह स्पष्ट
दिखायी पड़ता है कि वे कंचन और कामिनी दोनों को सहज
रहनी और साधनात्मक जीवन के लिए विघातक मानते थे। उद्धार
के बाद भी, कामिनी छूटने पर भी, कंचन के प्रति मोह मत्स्येन्द्र के
मन में शेष रह गया था। वे एक झोली में स्वर्णमुद्राएं भर लाये थे
और छिपा रखा था। गोरक्ष ने सामने के पहाड़ को ही योगबल से
स्वर्णमय बना दिया। मत्स्येन्द्र ने झोली नदी में फेंक दी। इससे
यह भी स्पष्ट है कि वे यौगिक सिद्धियों का प्रयोग परहितसाधन के
१८. वही, पृ० ४७-४८।

लिए ही करते थे। दूसरी कथाएं भी इस बात की पुष्टि करती हैं।
गोरखपुर में उन्होंने योगबल से अन्न वितरण किया। उस समय
यौगिक सिद्धियों का प्रयोग जनपीड़न के लिए करनेवाले लोग भी
थे। गोरखनाथ की उनसे नहीं पटी। दयानाथ अपनी फूँक से
पहाड़ी जंगलों में आग लगा देता था। चामत्कारिक रस्सी से
बंधवाकर रहस्यमय डंडे से लोगों को पिटवाता था। पहाड़ों को
आकाश में उड़ा देता था। अतः गोरखनाथ ने गोपीचन्द्र के आवा-
हन पर उससे कहा : 'लोगों को दुःख न दो, मैं तुम्हें और तुम्हारे
अनुवर्तियों तथा परवर्तियों को वरदान देता हूँ कि स्वच्छ श्वेत वस्त्रों
और अच्छे घोड़ों की कमी नहीं पड़ेगी।" फिर उन्होंने दयानाथ
को अपना शिष्य बनाया। कान फाड़कर कुण्डल पहनाएँ, काले
डोरों का साफा सिर पर रखा और दीनोधर वापस भेज दिया।१९
उनकी रचनाओं से और उनके सम्प्रदाय के संगठन से यह बात
सिद्ध होती है कि वे वर्णाश्रम-व्यवस्था के भेद-विभेदों को नहीं
मानते थे। स्वयं उनका सम्प्रदाय अपने को अति वर्णाश्रमी मानता
है। यवनों को भी उन्होंने अपने सम्प्रदाय में स्थान दिया था। मानव-
मात्र के प्रति समदृष्टि को वे आवश्यक मानते थे। एक कथा के अनु-
सार उन्होंने ज्वालादेवी के मंदिर में हिंसाविरहित मानसी पूजा का
सूत्रपात किया था। उनकी कुछ पंक्तियों के आधार पर यह निष्कर्ष
निकलता है कि वे भांग, मद्य, मांसादि से बहुत दूर रहते थे। एक
कथा से स्पष्ट होता है कि गोरख धनको योगी के लिए आवश्यक
नहीं मानते थे। गोरखने रांझा से कहा था—"मैं पृथ्वी पर सोता हूँ।
मेरे पास विस्तर नहीं, ओढ़ावन नहीं, कंकण पत्थरों पर सोता हूँ
और वियावान में रहता हूँ। योगी तो निर्धन होते हैं। धन उनके
पास नहीं होता।”२० उन्होंने अपने लिए कोई निवासस्थान नहीं
बनाया था। वे सदैव भ्रमणशील रहे। चार युगों में भिन्न-भिन्न
प्रदेशों में उनके निवास अथवा अवतार की जो बात कही जाती है,
वह वस्तुतः उन-उन प्रदेशों की उनकी यात्राओं का विवरण है।
रांझा की कथा में गोरख को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि
युवती स्त्रीको 'बहन' और वयस्काको 'माता' का सम्बोधन दो।
१६. गोरखनाथ और उनका युग—पृ० ५१-५२।
२०. वही—पृ० ५४ पर उद्धृत ब्रिग्स।

[ १३ ]
'वयस्का स्त्रियों के प्रति उनके हृदय में अत्यन्त श्रद्धा थी। वे उनका
माता के समान आदर करते थे। गोरखनाथने स्त्री को केवल माता
के ही रूप में देखा, जो स्नेह से बालकको पालती है, जिसमें वासना
नहीं रहती।' 'युवती स्त्रियोंको गार्हस्थ्य-धर्म में पतिव्रता के रूप में
देखने के इच्छुक थे। उसके कामिनी रूप से उन्हें चिढ़ थी। वे
उसकी वासना से घृणा करते थे। लड़कियों का शीलपूर्ण होना उन्हें
भाता था। स्त्री के प्रति उनका विचार उनके सिद्धान्तों में बड़ा हाथ
रखता है।'२१ संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए भी मस्त रहना
उनकी रहनी की विशेषता थी। ऐसी मस्ती में साधना भी निर्विघ्न
भाव से चलती रहे, यही उनकी आकांक्षा थी।२२
उनके पाण्डित्य के सम्बन्ध में भी अब प्रायः संदेह नहीं रह गया
है। 'अमरौघशासनम्' और 'महार्थमंजरी' यदि उन्हीं की रचनाएँ
हैं तो निश्चय ही उन्होंने भारतीय दर्शनों का अच्छा अध्ययन किया
था। उनकी हिन्दी रचनाओं से यह बात स्पष्ट होती है कि वे
पाण्डित्य को महत्व नहीं देते थे।२३ गोरक्ष का अपने समकालीन
सिद्धों से बहुत संघर्ष था। कहा जाता है कि गोरखनाथ और
कृष्णपाद या कान्हुपा की साधनापद्धति में भी संघर्ष था। संघर्ष का
दूसरा कारण यह था कि गोरखनाथ अपने भक्तों, अनुयायियों और
विपत्ति में पड़े लोगों की सहायता के लिए हमेशा दौड़ पड़ते थे।
२१. वही—पृ० ५६।
२२. 'हसिवा खेलिवा रहिवा रंग। काम क्रोध न करिबा संग॥
हसिबा खेलिवा गाइबा गीत। दिढ करि राखि आपना चीत ॥७॥
हसिवा खेलिवा धरिबा ध्यान। अहिनिसि कथिबा ब्रह्म गियान ॥
हसै खेलै न करै मन भंग। ते निहचल सदा नाथ के संग ॥८॥
गोरखबानी, सबदी, पृ० ३-४।
२३. 'वेद कतेव न बांणी बांणी। सब ढंकी तलि आंणी ॥
गगनि सिषर महि सबद प्रकास्या। तह बूझे अलष बिनाणी ॥४॥
वेदे न सास्त्रे कतेबे न कुराणे पुस्तके न बांच्या जाई।
ते पद जाना विरला जोगी और दुनी सब धंधे लाई ॥६॥
—गो० बा०, पृ० २-३।
५

कान्हिफा, जालन्धर, दयानाथ आदि के साथ उनका संघर्ष कथाओं
में प्रसिद्ध है। यह भी संभव है, जैसा कुछ कथाओं से मालूम पड़ता
है कि भिन्न साधनमार्ग, जो लोगों को सही रास्ते नहीं ले जाते थे,
भी इसके कारण रहे हों। तत्कालीन प्रचलित विभिन्न साधन-
संप्रदायों का उनके विरूप से उद्धार और नाथमत में उनका संग-
ठन, यह भी उनका एक लक्ष्य था। इसके लिये उन्हें विभिन्न प्रकार
के पराक्रम दिखाने पड़े और उनसे सम्बद्ध अनेक कथाएँ, किंवदन्तियाँ
तत्तत्प्रदेशों में प्रचलित हो गयीं। अपने संप्रदाय और उसके अनु-
यायियों की श्रेष्ठता के लिए उन्हें चिंता रहती थी। इसीलिए वे
अपने अनुयायियों को चित्त की दृढ़ता का उपदेश देते थे। भारत में
इतना भ्रमण करनेवाले और जनसमाज के संपर्क में आनेवाले,
दुखियों के दुःख को देखकर तुरत दौड़ पड़नेवाले के लिए भी चित्त
की दृढ़ता अत्यधिक आवश्यक थी। उनका कुछ हिंसक यवनों से
भी पाला पड़ा था और उन्होंने उन्हें हिंसा से विरत करने के लिए
उपदेश भी दिया था। प्रसिद्ध है कि बहुत से मुसलमान भी उनके
शिष्य हो गये थे। हिन्दी की रचनाओं के अनुसार विभिन्न सांप्र-
दायिक संन्यासियों के आडंबर की ओर भी उनकी दृष्टि थी और वे
नाथयोगियों को उनसे मुक्त रखने के भी अभिलाषी थे। कार्पटिक,
नागा, मौनी, दूधाधारी आदि ऐसे ही संन्यासी थे। २४
गोरक्षनाथ का व्यक्तित्व और कृतित्व विभिन्न किंवदन्तियों
और लोककथाओं से इतना आवृत है तथा साम्प्रदायिकों द्वारा इस
प्रकार की अनैतिहासिक बातें इतनी अधिक मात्रा में प्रसारित की
गयी हैं और वे परस्पर इतनी विरुद्ध हैं कि कुछ लोग गोरक्षनाथ
को पौराणिक प्रसिद्धिवाला व्यक्ति मानने लगे हैं। अब तक उनकी
ऐतिहासिकता और समय के सम्बन्ध में जितना काम हुआ है,
वह संक्षेप में नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है। इन सबके आधार पर,
मोटे तौर पर, इतना तो निश्चय हो गया है कि गोरक्षनाथ एक
ऐतिहासिक व्यक्ति थे और शंकराचार्य के पश्चात् और रामानुजा-
चार्य के पूर्व उनका आविर्भाव हुआ था। वस्तुतः गोरक्षनाथ के
समय का विचार अन्य नाथसिद्धों अथवा समकालीन सिद्धों के
कालविचार से पूर्णतया पृथक् नहीं किया जा सकता।
२४. गोरखबानी—सबदी ३६-४०, पृ० १५, सबदी ७, ९-१०, पृ० ३-४।

[ १५ ]
गोरक्षनाथ की ऐतिहासिकता और उनके काल का निर्णय
करने में बहुत सी पौराणिक कथाएँ, किंवदन्तियाँ, साम्प्रदायिक
विश्वास आदि बाधक हैं। कुछ विद्वान् इन सबका कालनिर्णयादि में
उपयोग भी करते हैं। कनफटा लोगों का कहना है कि उनका
सम्प्रदाय सृष्टि के पूर्व भी विद्यमान था। विष्णु जब कमल से प्रकट
हुए तब उस समय गोरक्ष पाताल में थे। सृष्टि की समस्या खड़ी होने
पर विष्णु पाताल गये और गोरक्षनाथ से सहायता की याचना
की। गोरक्ष ने दयाकर अपनी धूनी से एक मुट्ठी विभूति दी और
कहा कि यदि तुम इसे जल के ऊपर छिड़क दोगे तो तुम सृष्टि करने
में समर्थ होगे। विष्णु ने वैसा ही किया और ब्रह्मा, विष्णु और
शिव गोरक्ष के प्रथम शिष्य हुए। २५ विभिन्न स्थानों पर विभिन्न युगों
में गोरक्ष के अवतरित होने की कथा उनके अतिमानव होने की
ओर संकेत करती है। २६ यह भी कहा जाता है कि गोरक्षनाथ
कलियुग में शेषनाग के रूप में प्रकट हुए। २७ नेपाल से कुछ ऐसे
चित्र भी मिले हैं जिनमें गोरक्ष नागों से आवृत हैं। उनके शीर्ष
भाग पर शेषनाग की छाया है। एक परम्परा के अनुसार गोरखनाथ
का बाबा फरीद से भी सम्पर्क था जिन्होंने १२४४ ई० में गिरनार
की यात्रा की थी। उनका एक स्मारक भी गिरनार में है। २८ गोरख-
नाथ के शिष्यों की सूची काफी लम्बी है। ब्रिग्स ने हठयोगप्रदीपिका
के बहुत से सिद्धों को उनका शिष्य माना है। वह सूची इस
प्रकार है—
विरूपाक्ष, विलेशया, मन्थान, भैरव, सिद्धिवुद्ध, कंथड़ी, करएटक,
सुरानंद, सिद्धिपाद्, चर्पटी, काणेरी, पूज्यपाद, नित्यनाथ, निरंजन,
कपालि, बिंदुनाथ, कंकचंडेश्वर, अल्लाम, प्रभुदेव, घोड़ा, चोली,
भानुकी, नारदेव, खण्ड, कापालिक, तथा अन्य। २९
२५. गोरखनाथ ऐंड कनफटा योगीज–ब्रिग्स, पृ० २२८ (ब्रिग्स द्वारा कथित
इस कथा में पौराणिक असंगति है)।
२६. वही–पृ० २२६ ।
२७. वही ।
२८. वही–पृ० २३० ।
२९. वही–पृ० २३४ ।

[ १६ ]
ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रिग्स ने हठयोगप्रदीपिका में दिये गये
नामों को ठीक से पढ़ा नहीं है। खण्ड और कापालिक वस्तुतः दो
सिद्ध नहीं हैं और वास्तविक नाम है चण्डकापालिक। उसी प्रकार
घोड़ाचौली भी एक ही सिद्ध का नाम प्रतीत होता है। ऐसे ही और
कितने दोष बताये जा सकते हैं। वस्तुतः गोरखनाथ के शिष्यों की
संख्या और नाम का संधान अभीतक ठीक से हुआ नहीं है। उड़ीसा
के उनके शिष्य मल्लिकानाथ का पता अभी अभी लगा है जिनका
जीवनवृत्त मल्लिकामकरंद नाम के ताड़पत्र के हस्तलेख के इतिहास-
खण्ड में मिलता है।३०
गोरक्षनाथ से सम्बद्ध जो कथाएं मिलती हैं, उनमें से अनेक
गूगा चौहान, राजा रसालू, पूरण भगत आदि से संबंधित हैं जिनका
उपयोग विद्वानों ने गोरखनाथ के कालनिर्णय में किया है ! गूगा
का समय १२ वीं शताब्दी के पूर्व बताया गया है। राजा रसालू का
समय आठवीं शती माना गया है। भर्तृहरि, गोपीचन्द्र, भोज,
रानी पिंगला आदि की कथाओं के आधार पर ब्रिग्स ने गोरखनाथ
का समय ११वीं ई० शती के पूर्व बताया है।३१ राजपूताने के मेवाड़
के बाप्पा से संबंधित गोरक्ष का समय ९वीं ई० शती से १२वीं ई०
शती के बीच रहा होगा।३२ नेपाली वंशावली पर्वतिया के अनुसार
मत्स्येन्द्रनाथ गोरक्षनाथ का मिलन नेपाल में नरदेव ( ९वीं ई० शती
का मध्यकाल ) के समय में हुआ था।३३ इस प्रकार की बहुत सी
सामग्रियों की परीक्षा कर ब्रिग्स ने यह निश्चय किया कि जब तक
और नयी सामग्री उद्घाटित नहीं होती तब तक तो यही निष्कर्ष है
कि गोरखनाथ का आविर्भाव १२वीं ई० शताब्दी के पूर्व हुआ था।
अधिक संभावना तो यह है कि ११वीं ई० शताब्दी के प्रारम्भ में ही
३०. नाथ और सन्त साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन—डा० नागेन्द्रनाथ
उपाध्याय, परिशिष्ट २ ।
३१. गोरखनाथ ऐंड कानफटा योगीज—ब्रिग्स—पृ० २३५-२३६, २३६, २४२,
२४४, २५१ ।
३२. वही पृ०-२४५-२४७ ।
३३. वही, पृ० २४८ ।

[ १७ ]
उनका आविर्भाव हुआ और वे वंगाल के पूर्वी भाग से आये थे ।
इसी प्रकार एक दूसरे विद्वान् डा० मोहनसिंह ने संभावना व्यक्त की
है कि वे ईसा की ६वीं शताब्दी में विद्यमान थे और पंजाब के
निवासी थे ।
नेपाल के राजनीतिक और धार्मिक इतिहास से उपलब्ध तथ्यों,
शैव धर्म और नाथयोगी सम्प्रदाय के विकास के इतिहास से उपलब्ध
तथ्यों तथा विभिन्न सम्प्रदायों की परम्पराओं के आधार पर प्रो०
सिल्वा लेवी, डा० शहीदउल्ला जैसे विद्वानोंने निष्कर्ष निकाला है कि
नाथयोगी सम्प्रदाय के संस्थापक सातवीं शताब्दी में अवश्य विद्य-
मान थे । वाक्यपदीयकार भर्तृहरि के आधार पर लोग गोरक्षनाथ
को छठीं शताब्दी का मानते हैं । एक साम्प्रदायिक परम्परा यह भी
मानती है कि जेसस क्राइस्ट ने हिमालय के एक नाथयोगी ( गोरख-
नाथ ? ) से योगशिक्षा ग्रहण की थी ।३४
डा०हजारीप्रसाद द्विवेदी ने विभिन्न दंतकथाओं और ऐतिहासिक
सामग्री के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनसे कई महत्वपूर्ण
बातों का पता चलता है । ( १ ) मत्स्येन्द्रनाथ और जालंधरनाथ
समसामयिक थे तथा इन दोनों के शिष्य थे क्रमशः गोरक्षनाथ और
कानुपा या कृष्णपाद । अतः इनमें से किसी एक का समय निश्चित
हो जाने पर शेष का समय निश्चित हो सकता है । ( २ ) कौलज्ञान-
निर्णय के लेखक मत्स्येन्द्रनाथ ११वीं शताब्दी के पूर्व हुए थे । ( ३ )
अभिनवगुप्त द्वारा संस्तुत ‘मच्छन्दविभु’ मत्स्येन्द्रनाथ ही हैं । अभि-
नवगुप्त ने ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ की बृहती वृत्ति सन् १०१५ में लिखी
थी और क्रमस्तोत्र की रचना सन् ६६१ में की थी । इस प्रकार मत्स्ये-
न्द्रनाथ इसके पूर्व आविर्भूत हुए होंगे । ( ४ ) मत्स्येन्द्रनाथ (मीनपा)
राजा देवपाल के राज्यकाल ( सन् ८०६-८४६ ई० ) में हुए थे । अतः
मत्स्येन्द्रनाथ नवीं शताब्दी के मध्यभाग और अधिकसे अधिक
अन्त्य भाग तक वर्तमान थे । ( ५ ) गोविंदचन्द्र या गोपीचन्द्र
जालंधर के शिष्य कानुपा के शिष्य थे । दक्षिण के राजा राजेन्द्र
चोल ने माणिकचन्द्र के पुत्र गोविंदचन्द्र को पराजित किया था ।
३४. नाथयोग ( अंग्रेजी ) — प्रो० अक्षयकुमार बनर्जी, पृ० ५ ।

[ १८ ]
'गोविंदचन्द्रेर गान' के अनुसार गोविंदचन्द्र का किसी दाक्षिणात्य
राजा से युद्ध १०६३-१११२ ई० में हुआ था । इस पर यह अनुमान
किया जा सकता है कि जालंधर का समय इससे सौ वर्ष पूर्व
(लगभग ६६३ई०) रहा होगा । मत्स्येन्द्रनाथ का समय इससे भी पूर्व
होना चाहिए । ( ६ ) वज्रयानी सिद्ध कह्नपा, जिन्होंने अपने गानों
में जालंधरनाथ का नाम लिया है, तिब्बती परंपरा के अनुसार राजा
देवपाल ( ८०६-८४६ ई० ) के समकालीन थे । अतः जालंधरपाद
का समय इससे कुछ पूर्व ठहरता है । ( ७ ) चालुक्यराज मूलराज
( ६६३ ई० ) ने अणहिल्लपुर के शिवमंदिर का प्रबंधक कन्थड़ी
नामक सिद्ध को बड़े छल-बल-कौशल से बनाया था । इस सिद्ध
के सारे लक्षण नाथपंथी योगी के हैं, ऐसा प्रबंधचिंतामणि से
पता चलता है । ऊपर के प्रमाणों के आधार पर नाथमार्ग के आद्य
प्रवर्तकों का समय नवीं शताब्दी का मध्यभाग ही उचित जान
पड़ता है ।३५
ऊपर के विवरण और विवेचन से यह निश्चत हो गया है कि
मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ का समय ६ वीं ई० शती के मध्य
अथवा अन्त्य भाग में होना चाहिए । अभी तक जितने भी प्रमाणों
का विचार लोगों ने किया है, उनमें उपर्युक्त विचार अपेक्षाकृत
अधिक संगत और प्रामाणिक मालूम पड़ता है। डा० कल्याणी
मल्लिक ने शताब्दी के अनुसार सामग्री का विभाजन कर यह
निश्चय करने का प्रयत्न किया है कि गोरक्षनाथ का समय १२ वीं
ई० श० के पूर्व किसी समय माना जा सकता है। उन्होंने कुछ प्रमाण
ऐसे भी दिये हैं, जिनसे डा० द्विवेदी के मत की पुष्टि होती है ।
मालवराजकन्या मयनामती के पति माणिकचन्द्र के गीत रंगपुर के
पाशुपत शैव गाते थे । वे लोग गोरक्षनाथ की गुरुरूप में पूजा करते
थे । पैग-साम-जान-ज्वैन के अनुसार शंकरदिग्विजय के परवर्ती
काल में मगध के, श्रीहर्ष के ज्येष्ठ पुत्र के राजत्वकाल में, बंगदेश में
माणिकचन्द्र के पिता राज्य करते थे । शंकर का जन्मकाल ७८८ ई०
है। गोरक्षनाथ ने नाथ संप्रदाय के दर्शन के साथ उपनिषद्दर्शन का
सामंजस्य किया है। अतएव वे शंकर के बहुत परवर्ती नहीं हो
३५. नाथसिद्धों की वानियाँ—डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, भूमिका, पृ०-५-६ ।

[ १६ ]
सकते । उनका दूसरा प्रमाण यह है कि आठवीं शताव्दी के प्रारंभ
में हिन्दू-मुसलमानों में जो संघर्ष हुआ, उसमें गोरक्ष के शिष्य राजा
रसालू ने विशिष्ट स्थान ग्रहण किया । रसालू और पूरन भगत दोनों
ही गोरक्ष के शिष्य थे ।३६ अन्यत्र डा० कल्याणी मल्लिक ने यह
स्वीकार किया है कि गोरक्षनाथ का समय दसवीं शताव्दी के बाद
निश्चय होना चाहिए।३७
इस प्रकार गोरक्षनाथ के समय के सम्बन्ध में स्पष्टतः दो मत
हैं । एक मत गोरक्षनाथ का जीवनकाल स्पष्टतः ईसा की नवीं
शताव्दी का मध्यभाग मानता है और दूसरा मत उन्हें १० वीं से
१२ वीं शताव्दी के मध्य किसी भी समय विद्यमान मानता है ।
दोनों मतों में पर्याप्त अन्तर है । डा० मल्लिक के कुछ प्रमाणों का
उपयोग प्रथम मत की पुष्टि के लिए भी किया जा सकता है । सब
देखने पर प्रथम मत ( ६ वीं ई० शताव्दी का मध्यभाग ) ही अधिक
मान्य प्रतीत होता है ।
यद्यपि गोरक्षनाथ का समय अब प्रायः निश्चित हो गया है,
लेकिन उनके नाम से मिलनेवाली सभी रचनाओं का कालनिर्णय
अभी तक नहीं हो सका है । गोरक्षनाथ के नाम से संस्कृत, अपभ्रंश
और हिन्दी तीनों भाषाओं में रचनाएँ मिलती हैं ।
ब्रिग्स ने गोरक्षनाथ के गोरक्षशतक को उनकी सबसे प्रामा-
णिक रचना माना है। इसी गोरक्षशतक के बहुत से नाम
मिलते हैं और इसी का संस्करण तथा परिवर्द्धन भी बहुत
हुआ है । प्रथम शतक के गोरक्षकल्प, गोरक्षपद्धति, गोरक्षज्ञान,
ज्ञानशतक, ज्ञानप्रकाशशतक आदि ऐसे ही नाम हैं । गोरक्षपद्धति की
हिन्दी टीका में बहुत से ऐसे श्लोक भी मिलते हैं जो उसी रूप में
हठयोगप्रदीपिका में भी मिलते हैं । गोरक्षशतक में दो शतक हैं ।
संपूर्ण ग्रंथ के गोरक्षशतक टीका, गोरक्षशतक टिप्पण, गोरक्षकल्प,
३६. नाथसंप्रदायेर इतिहास दर्शन ओ साधनाप्रणाली—डा० कल्याणी
मल्लिक, पृ० ३४-३६ ।
३७. सिद्धसिद्धान्तपद्धति ऐंड अदर वर्क्स आव नाथयोगीज—डा० कल्याणी
मल्लिक, इंट्रोडक्शन, पृ० १० ।

[ २० ]
गोरक्षपद्धति, योगसिद्धान्तपद्धति और सिद्धान्तपद्धति नामक अनेक
नामान्तर और रूपान्तर हैं। गोरक्षपद्धति में इसे गोरक्षसंहिता भी
कहा गया है। अतः व्रिग्स ने अनुमान लगाया है कि गोरक्षशतक
इस संप्रदाय का मूलग्रन्थ है। इसे प्रमाण और परम्पराएं गोरक्ष-
नाथकृत मानती हैं तथा इसे १२ वीं शताब्दी की रचना स्वीकार
करती हैं। लेकिन गोरक्षसंहिता, जो आजकल अनुपलब्ध है और
गोरक्षपद्धति का तुलनात्मक अध्ययन करने से यह बात साफ हो
जाती है कि गोरक्षसंहिता अपेक्षाकृत अधिक प्राचीन है। गोरक्ष-
पद्धति गोरक्षसंहिता के बहुत बाद का ग्रन्थ मालूम होता है। ऐसा
मालूम होता है कि गोरक्षपद्धति का संग्राहक गोरक्षसंहिता और
हठयोगप्रदीपिका दोनों को अपना आधार मानता है। गोरक्षपद्धति
में गोरक्षसंहिता का उल्लेख कई बार हुआ है। अतः गोरक्षपद्धति
एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है।
गोरक्षशतक के समान ही सिद्धसिद्धान्तपद्धति भी एक महत्वपूर्ण
ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ के आधार पर आगे चलकर सिद्धसिद्धान्तसंग्रह
और गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह जैसे ग्रन्थ बने बताये जाते हैं। इन ग्रन्थों
में सिद्धसिद्धान्तपद्धति के उद्धरण भी मिलते हैं। अमरौधशासनम्
और महार्थमंजरी ग्रन्थ भी गोरक्षकृत ही माने जाते हैं और विभिन्न
दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। शैवागमों से शैवनाथ मत का सम्बन्ध-
निरूपण करने के लिए "अमरौघशासनम्" महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इस
ग्रन्थ की रचनातिथि तथा लिपिकाल अज्ञात हैं। सांख्ययोग, काश्मीर
शैवमत और तंत्रदर्शन के ३६ तत्वों के साथ सम्बन्ध-विचार के लिए
महार्थमंजरी विचारणीय ग्रन्थ है। भाषा की दृष्टि से भी इसका
महत्व कम नहीं है। कुछ लोग इसकी भाषा काश्मीरी अपभ्रंश
मानते हैं। इन आधारों पर दार्शनिक, साधनात्मक तथा सांप्रदायिक
धारा के विवेचन की दृष्टि से गोरक्षनाथ की ये चार रचनाएँ बहुत
महत्वपूर्ण और प्रामाणिक मानी जा सकती हैं—(१) सिद्धसिद्धान्त-
पद्धति, (२) महार्थमंजरी, (३) गोरक्षसंहिता, (४) अमरौध-
शासनम्। डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सूचित किया है कि अमनस्क
नामक ग्रन्थ की एक प्रति बड़ौदा लाइब्रेरी में है और गोरक्षसिद्धांत-

[ २१ ]
संग्रह में बहुत से वचन उद्धृत हैं। ३८ लेकिन इसकी प्रति भी ढूंढ़े
नहीं मिलती। अमनस्क ग्रन्थ तो अब प्रकाशित ही हो रहा है।
द्विवेदी जी ने बताया है कि पं० प्रसन्नकुमार कविरत्न ने गोरक्ष-
संहिता को १८६७ में छपाया था ! हमने एक दूसरा संस्करण काशी
हिन्दू विश्वविद्यालय के गायकवाड़ ग्रन्थालय में देखा, जिसकी
टंकित प्रति मेरे पास सुरक्षित है। यह संस्करण श्री इन्द्र जी शर्मा
द्वारा संवत् १६५० में प्रकाशित कराया गया था। इसका प्रकाशन
स्थान काठियावाड़ का प्रभासपाटण स्थान है और मुद्रण स्थान
अहमदाबाद है। यह संस्करण भी बहुत जीर्ण अवस्था में मुझे मिला।
द्विवेदी जी ने आगे और बताया है कि इसकी एक प्रति नेपाल दर-
बार लाइब्रेरी में भी है जिसका कुछ अंश डा० बागची ने कौलवलि-
निर्णय की भूमिका में उद्धृत किया है। इसके बहुत से अंश मत्स्येन्द्र-
नाथ के अकुलवीरतन्त्र में भी अविकल रूप में मिलते हैं। ३९ गोरक्ष
संहिता भी बहुत महत्वपूर्ण ग्रंथ है और अब अप्राप्य है। अतः
अमनस्क के बाद, उपर्युक्त सामग्री के आधार पर, इसका भी संपादन-
प्रकाशन होना चाहिए।
गोरक्षनाथ की हिन्दी रचनाएं भी अब पर्याप्त मात्रा में प्रका-
शित हो चुकी हैं। सबसे पहले डा० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल ने हस्त-
लिखित पोथियों के आधार पर 'गोरखबानी' का प्रकाशन कराया
जिसमें प्रमुख तेरह रचनाओं में सबदी अंश को सबसे अधिक प्रामा-
णिक माना गया है। इनके अतिरिक्त १४ रचनाएं और संपादित
हैं। डा० बड़थ्वाल द्वारा संग्रहीत नाथसिद्धों की बानियों का दूसरा
भाग बहुत बाद में पर्याप्त नयी सामग्री के साथ डा० हजारीप्रसाद
द्विवेदी ने प्रकाशित कराया। इसके पूर्व ही डा० कल्याणी मलिक ने
सिद्धसिद्धान्तपद्धति और अन्य नाथयोगियों की रचनाओं के साथ
गोरक्षनाथ के नाम से प्रसिद्ध 'गोरख उपनिषद्' नाम की रचना
प्रकाशित की। कुछ लोग गोरक्षनाथ को हिन्दी का प्रथम गद्यलेखक
मानते हैं। भाषा की दृष्टि से भी गोरक्षनाथ की रचनाएं बहुत
३८. नाथ संप्रदाय — डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६८ ।
३६. वही पृ० ६६-१००

[ २२ ]
महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, यद्यपि उनकी भाषा बहुत बदल गयी
है।४०
गोरक्षनाथ के दर्शन के मूल आधार ग्रंथ संस्कृत में हैं। ऊपर
जिन संस्कृत रचनाओं की ओर संकेत किया गया है, उनमें गोरक्ष-
दर्शन का तत्त्वविज्ञान बहुत ही पुष्ट रूप में प्रकाशित हुआ है।
अन्य बहुत से भारतीय दर्शनों की तरह ही गोरक्ष-दर्शन के तत्व-
विज्ञान का मूलाधार सांख्य का तत्वविज्ञान है। सिद्धसिद्धान्त-
पद्धति में काश्मीर शैव दर्शन के ३६ तत्वों का पूरा समाहार प्रतीत
होता है। वस्तुतः इस तत्त्वविज्ञान का मुख्य लक्ष्य नाथों का 'पिण्ड-
ब्रह्माण्डवाद' है। पिण्ड और ब्रह्माण्ड की समतत्वता और सम-
पदार्थता सिद्ध करने के लिए दार्शनिक आधार के रूप में इस तत्त्व-
विज्ञान का विकास किया गया है, ऐसा प्रतीत होता है। डा०
हजारीप्रसाद द्विवेदी, डा० कल्याणी मल्लिक आदि ने इस तत्त्व-
विज्ञान का विस्तार से विवेचन किया है।
प्रलयावस्था में शिव कार्य-कारण के चक्र-संचालन से विरत, कुल
अकुल-भेद से परे और अव्यक्त रहते हैं। इस अवस्था को सिद्धसिद्धां-
तपद्धति में 'स्वयं' कहा गया है।४१ इस परम शिव में सिसृक्षा उत्पन्न
होने पर उन्हें सगुण शिव कहा जाता है। यह सिसृक्षा ही शक्ति
है जिसके उत्पन्न होते ही शिव और शक्ति दो तत्व हो जाते हैं जो
इस स्थिति में अभिन्न रहते हैं। इसके बाद इन दोनों तत्वों का पांच
अवस्थाओं में विकास होता है, जो संक्षेप में इस प्रकार है-
शिव शक्ति
१-अपर : १--निजा (स्फुरित होने की पूर्ववर्तिनी,
स्फुरित होने को उपक्रान्त)
४०. विस्तार के लिए देखिए, (१) नाथ संप्रदाय पृ० ६८-१०२, (२) नाथ
संप्रदायेर इतिहास, दर्शन ओ साधनाप्रणाली, पृ० १२१-१५०, (३) नाथ
सिद्धों की बानियां डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, (४) सिद्धसिद्धान्तपद्धति
ऐंड अदर वर्क्स-डा० कल्याणी मल्लिक, (५) नाथ और संत साहित्य :
तुलनात्मक अध्ययन-डा० ना० उपाध्याय, पृ० २७-३४।
४१. कार्यकारणकर्तृत्वं यदा नास्ति कुलाकुलम् । अव्यक्तं परमं तत्वं स्वयं नाम
तदा भवेत् ॥ १-४ । सिद्धसिद्धान्तसंग्रह, रचयिता : बलभद्र, पृ० १ ।

[ २३ ]
२—परम : २—परा ( स्फुरणोन्मुख )
• ३—शून्य : ३—अपरा ( स्पंदित होती है )
४—निरंजन : ४—सूक्ष्मा अहंता। 'मैं'-पन का
पृथक्ता का भाव।
५--परमात्म४२—इस अवस्था : ५-कुण्डली ।४३-( अपनी पृथक्ता में
में शिव विश्वप्रपंच की में पूर्ण सचेत, इसी शक्ति की सहा-
उत्पत्ति, पालन और यता से शिव इस विश्वप्रपंच की
संहार में समर्थ होते हैं । उत्पत्ति, पालन और संहार में
समर्थ होते हैं ) ।
[' • यह कुण्डली वेदान्तिक ब्रह्म की शक्ति 'माया' से भिन्न है । यह
चिच्छक्ति चिच्छीला, चिद्रूपिणी, अनन्तरूपा और अनन्त शक्तिरूपा
है। जगत् इसी शक्ति का परिणाम है और यही शक्ति जगत्-रूप में
परिणत होती है। इसे वेदनशीला भी कहा गया है और इसके अन्य
शक्तियों के समान ही पांच गुणपूर्णता, प्रतिबिम्बता, प्रबलता, प्रोच्च-
लता, प्रत्यङ्मुखता बताये गये हैं।४४ इसके बाद यह शक्ति सृष्टि-
क्रम को अग्रसर करने के लिए क्रमशः स्थूलता की ओर अग्रसर होती
है। शिव और शक्ति के बाद तीन परवर्ती क्रमविकास हैं—३ सदा-
शिव, अहंप्रधान, ४. ईश्वर इदंप्रधान, ५. शुद्धविद्या-उभयप्रधान ।४५
शिव क्रमशः उपर्युक्त पांच अवस्थाओं ( आनन्दों ) से होते हुए
'जीव' रूप की ओर अग्रसर होते हैं। वे क्रमशः स्थूल से स्थूलतर
४२-४३. ततोऽस्मिता पूर्वमर्चिमात्रं स्यादपरं परम् । तत्स्वसंवेदनाभास द्युत्पन्नं
परमं पदम् । स्वेच्छोमात्रं ततः शून्यं सत्तामात्रं निरञ्जनम् । तस्मात्ततः
स्वसाक्षाद्भूः परमात्मपदं मतम् ।' सि० सि० सं०, पृ० २, उप०
१, श्लो० १४-१५ ।
४४ नाथ संप्रदाय—पृ० १०४, सिद्धसिद्धान्तसंग्रह—'चिच्छीला कुण्डलिभ्यतः'—
१.६, सिद्धिसिद्धान्तपद्धति—'ततो वेदनशीला कुण्डलिनी शक्तिरुद्रता ।'—
१-७, पूर्णता, प्रतिबिम्बता, प्रबलता, प्रोच्चलता, प्रत्यङ्मुखता इति
पंचगुणा कुण्डलिनी शक्तिः ॥'—१-१२ ॥
४५. नाथ संप्रदाय—पृ० १०५ तथा पादटिप्पणी ।

[ २४ ]
होते जाते हैं। इसी प्रकार गोरक्ष के तत्त्वविज्ञान के अनुसार तत्त्व-
विकास (सृष्टिप्रक्रिया) में क्रमशः निम्नलिखित ३६ तत्त्व उत्पन्न
होते हैं—उपर्युक्त ५ और ६—माया, ७-११ पंचकंचुक, १२. पुरुष,
१३. प्रकृति, १४. महत्, १५. अहंकार, १६-२० पंचतन्मात्र, २१-३१
एकादश इन्द्रिय, ३२-३६ पंचभूत।४६
वस्तुतः यह सारा विकास सिद्धसिद्धान्तपद्धति में 'पिण्डोत्पत्ति'
के प्रकरण में वर्णित है। अतः इस सारे विकास को पिण्डोत्पत्ति के
अनुसार विभाजित किया गया है। १. परपिण्ड (तत्त्व १-२),
२. आद्यपिण्ड (तत्त्व ३-५), ३. साकार पिण्ड (तत्त्व ६-१३),
४. प्राकृत पिण्ड (तत्त्व १४-२०), ५. अवलोकन पिण्ड (तत्त्व २१-
३१), ६. गर्भ पिण्ड (तत्त्व ३२-३६)। गर्भपिण्ड स्थूलतम पिण्ड है
और सृष्टिप्रक्रिया में अंतिम स्थूलतम विकास है।४७
स्पष्ट है कि ऊपर की प्रक्रिया ब्रह्माण्ड और पिण्ड की समतुल्य
विकास प्रक्रिया है। भेद केवल सत्त्व, रज, तम, काल और प्राणशक्ति
की न्यूनता और अधिकता के कारण है। यहां तक कि प्रत्येक पर-
माणु तक में उन सभी तत्त्वों की सत्ता स्वीकृत है। पिण्ड मानो
ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त संस्करण है।४८ इस प्रकार परशिव (स्वयं) की
अवस्था ही परम अवस्था है।
नाथमार्ग को कुछ विद्वान् अद्वैतवादी मानते हैं। लेकिन शांकर
अद्वैतवाद से स्पष्ट भेद है। काश्मीर शैवाद्वैत दर्शन से इसका
स्पष्ट नैकट्य है। सामरस्य, शक्तिकल्पना, परमशिव, सगुण शिव,
जगत् का अमिथ्यात्व, परम शिव की इच्छाशक्ति और उसका
विकास, पिण्डब्रह्माण्डवाद आदि विचार और सिद्धान्त ऐसे ही हैं।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि नाथ सिद्धाचार्य अपना भेद स्थिर
करने के लिए सिद्धान्त की दृष्टि से अपने को द्वैताद्वैतविलक्षणवादी
४६. वही—पृ० १०६।
४७. वही -- पृ० १०७-१०८।
४८. वही- पृ० ११०, सिद्धसिद्धान्तसंग्रह-पृ० १८ 'ब्रह्माण्डवर्ति यत्किंचित्-
पिण्डेऽप्यस्ति सर्वथा।"

कहते हैं, क्योंकि नाथतत्व द्वैत और अद्वैत दोनों से परे है। वह
निरुपाधि है और संख्या उपाधि है। वह अवाच्य पद है। जगत्
का प्रपंच शक्ति के स्फोट के बाद शुरू होता है। इसलिए शक्ति ही
जगत्कर्त्री है, शिव नहीं। इस संप्रदाय में ब्रह्म या शिव की शक्ति
को चित्स्वभावा माना गया है और वेदान्तियों में जड़स्वभावा।
इसीलिए नाथदर्शन में जगत् चिच्छक्ति का विकास है। धर्मी शिव
और धर्म शक्ति को केवल व्यवहारानुरोध से भिन्न मान लिया गया
है। चित् ब्रह्म की शक्ति भी चिद्रूपा ही होनी चाहिए। शिव का
स्वरूपनिर्धारण अशक्य होने से अभिन्न-भिन्नरूपा शक्ति ही उपास्य
हो सकती है। नाथयोगी साधक का लक्ष्य है, शिव और शक्ति का
सामरस्यरूप सहज समाधि ' इस प्रकार की शक्ति की उपासना
अन्ततः शिवोपासना ही है। व्यवहारानुरोध से ही शक्ति की उपा-
सना कही जाती है।
डा० कल्याणी मल्लिक ने बताया है कि गोरक्ष का दर्शन प्राचीन-
काल के शैवमत के अद्वैतवाद पर आधृत है। किन्तु उनका नाथ
तत्व द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार से अतीत है। शिव शुद्ध
चिद्रूप हैं और शक्ति उसका 'परिवर्तन और विकास का पक्ष है।
नाथ लोग जगत्प्रपंच के अद्वितीय परम कारण को शिव या
आदिनाथ के नाम से अभिहित करते हैं। वे स्वरूपतः अनादि,
अनन्त, स्वयंसिद्ध, स्वप्रकाश, नित्य तत्त्व, देशकालातीत, सर्व-
अवच्छेदहीन और सकल भेद-बाधाशून्य है। वह सर्वथा निरपेक्ष
सत्ता है। वे स्वयं निष्कारण और समस्त चराचर के एकमात्र कारण
हैं। यह कारणता ही उनकी शक्ति है। इस शक्ति के साथ वे नित्य-
युक्त रहते हैं। शिवशक्तिसम्बन्ध के विषय में नाथगण कहते हैं-
शिवस्याभ्यन्तरे शक्तिः शक्तेरभ्यन्तरे शिवः।
अन्तरं नैव पश्यामि चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥४६
४६. सिद्धसिद्धातपद्धति ऐंड अदर वर्क्स-भूमिका, पृ० १६, नाथ संप्रदायेर
इतिहास०-पृ० २२८; सिद्धसिद्धान्तसंग्रह--पृ० २६-२७, ४.३७; सिद्ध-
सिद्धांतपद्धति--४.२६ ।

[ २६ ]
एकही अद्वितीय परमतत्त्व दृष्टिभेद से शिव या शक्ति आख्या
को प्राप्त करता है । शिव शक्तिरूप होकर सर्वाकारों में स्फुरित होते
हैं। दोनों ही अन्योन्याश्रयभूत हैं । धर्म के बिना धर्मी अकल्पनीय
है । इस प्रकार दोनों तत्त्वतः अभिन्न हैं--
प्रसरं भासते शक्तिः संकोचं भासते शिवः ।
तयोः संयोगकर्त्ता यः स भवेद्योगयोगराट् ॥५०
इस प्रसार और संकोच का जो आदि और अन्त है, वही
साम्यावस्था है और वही निराभास है, वही शिवावस्था है। जब यह
साम्य भंग होता है, अर्थात् शक्ति के स्फुरण या प्रसर में स्तरानुसार
विश्व का आविर्भाव होता है, तब शक्ति परिणाम लाभ करती है या
जगत् आभासित होता है। शक्ति की संकोचन क्रिया के अवसान-
काल तक जगत् क्रमशः स्थूल-सूक्ष्म-भेद से आभासित होता है।
अतएव जगत् का आभास ही शक्तिभाव और निराभास ही शिव-
भाव है। शिव एकरस और अपरिणामी हैं। शक्ति का तिरोभाव
ही जगत् का लय है। फिर भी शिव और शक्ति सूर्य और सूर्यकिरण
के समान अभिन्न हैं। अतएव शक्ति की साधना से शिवकी उपलब्धि
होती है। शक्तिउपासना साधन है और शिवत्वलाभ उसका फल ।
विमर्श ही शिवकी शक्ति है। इस प्रकार नाथसिद्ध सगुण-सक्रिय,
अर्थात् विचित्र ब्रह्माण्डरूपी शिव और निर्गुण, निष्क्रिय शिव नामक
ये दो तत्त्व स्वीकार करते हैं। सगुण-निर्गुण, सक्रिय-निष्क्रिय की
मिलनभूमि को ही वे नाथस्वरूप कहते हैं।५१
परब्रह्म के स्वरूप के सम्बन्ध में नाथसिद्धान्त यह है कि ईश्वर
में क्रिया और अक्रिया, दोनों प्रकार की शक्तियाँ विद्यमान हैं।
पूर्णब्रह्म सक्रिय अथवा निष्क्रिय नहीं है। नाथ और निर्गुण ब्रह्म में
भेद है। नाथस्वरूप निर्गुण-सगुण दोनों से अतीत है। नाथ लोग
सभी देवताओं से शिवको उत्तम मानते हैं और शिव से भी उत्तम
नाथ को। गोरखसिद्धान्तसंग्रह का कथन है कि गोरख के अनुसार
५०. नाथ सम्प्रदायेर इतिहास०-पृ० २२८-२२६, सिद्धसिद्धान्तसंग्रह-पृ०
३६-३७, ६.६ ।
५१. नाथ सम्प्रदायेर इतिहास०--पृ० २३०-२३१ ।

[ २७ ]
विश्वकर्तृत्व नाथ का नहीं है, शिव का है। शिव ही विश्वकर्ता हैं
और नाथ निर्गुण निरुपाधिरूप हैं। अतः उनके लिए प्राकृतिक
कार्य-कारण का कोई माहात्म्य नहीं है। विश्व के सृष्टिकर्ता सगुण
सोपाधि शिव हैं। ५२ सिद्धमत में परमतत्त्व को द्वैताद्वैतविवर्जित
कहा गया है। यही सिद्धमत का वैशिष्ट्य है। यह विवर्जितत्व ही
पूर्ण सत्य है। निर्गुण ब्रह्म और सिद्धों के नाथ में भेद-प्रभेद यह है
कि नाथ अद्वैतोपरि और निराकार-साकारातीत हैं। इसी नाथ से
निराकार ज्योतिर्नाथ और साकार नाथ का जन्म होता है। साकार
नाथ से सदाशिव, भैरव और उनकी शक्ति भैरवी का जन्म होता
है। नाथ सर्वविलक्षण अर्थात् 'यादृश एव तादृश एव' हैं। उनकी
कोई तुलना नहीं। वे ही महासिद्धों के लक्ष्य हैं। ५३
नाथदर्शन के अनुसार जीवन्मुक्ति की ही अवस्था आदर्श अवस्था
है। देहपात में जो मुक्ति होती है, उसे यथार्थ मुक्ति नहीं कहा गया
है। कारण यह है कि यह मुक्ति देहपातरूप प्रतिबन्धक द्वारा बाधित
है। नाथ गण कहते हैं कि जिस देह से परमपदप्राप्ति होती है,
उसी देह की रक्षा, अजर-अमर करना कर्तव्य है। विदेह-मुक्ति में
इस देह का ही त्याग हो जाता है। 'योगबीज' में कहा गया है-
"अजरामरपिण्डो यो जीवन्मुक्तः स एव हि।"
जीवन्मुक्तियोग में दैहिक परिवर्तन साधित होता है। इस सिद्ध-
देह का लाभ होने पर योगी के लिए इच्छामृत्युवरण संभव हो जाता
है। वेदान्त का आत्मसाक्षात्कार नाथमार्ग की परमपद प्राप्ति है,
किन्तु साथ ही नाथ लोग उस देह को ही स्थायी करने के लिए
सचेष्ट हैं। योग से सिद्धयोगी प्रारब्ध का क्षय करता है। तत्पश्चात्
देह को रखे या न रखे, यह उसकी इच्छा पर निर्भर है। सिद्धमत
में देह ही आत्मा है। विक्षेप के दूर न होने पर शुद्ध देहलाभ नहीं
होता। शक्तियुक्त चैतन्य को सिद्ध लोग स्वीकार करते हैं। उसको
जीतकर विशेष रूप से अज्ञान को दूर कर मुक्तिलाभ होता है। योगी
चैतन्यशक्ति का जय करके कालजयी होता है। योगी का शरीर ही
योगदेह है। सिद्धमत है कि जो मृत्यु को प्राप्त करता है, वह मुक्त
५२. वही-पृ० २५४-२५६ ।

[ २८ ]
नहीं है। परामुक्त का देहपात नहीं होता ।⁵⁴ नाथमत में मोक्ष वह
अवस्था मानी गयी है जिसमें समाधि के क्रम से मन द्वारा मन का
अवलोकन किया जाता है। इसी को जीवन्मुक्ति पद कहा गया
है ।⁵⁵ नाथयोगी का लक्ष्य होता है ऐसे शरीर की प्राप्ति जिसका
पतन न हो, जिसके बाहर प्राण न जाता हो। इनका लक्ष्य वह
अवस्था है जिसमें शरीर भी ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। शरीर
चिन्मय हो जाता है और फिर अनन्यता की प्राप्ति होती है। यह
पिंडसिद्धि परमपद की प्राप्ति का अनिवार्य सोपान है। इस प्रकार
संक्षेप में नाथों का लक्ष्य है जीवन्मुक्तियुक्त सिद्ध देह से नाथरूप में
अवस्थान या पिंडपद का परमपद में समरसीकरण ।⁵⁶ महामहो-
पाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज ने नाथों के जीवन्मुक्तिक्रम का
इस प्रकार व्याख्यान किया है—“इस मत के अनुसार सद्गुरु की
कृपा से चित्तविश्रांतिलाभ सबसे पहले होना चाहिए, क्योंकि बिना
उसके सामरस्यप्राप्ति नहीं हो सकती। जबतक चित्त देहात्मबोध
मूलक क्षोभ से मुक्त न हो, तब तक इसमें शांति नहीं होती और
यथार्थ साधना का प्रारंभ नहीं होता। चित्त-विश्रांति से स्वभावतः
भगवदानंद और अनंत ज्योतियों का आविर्भाव होता है। इस अद्वय
प्रकाश से द्वैत भाव निवृत्त हो जाता है। इसके बाद चित् शक्ति
का प्रकाश होता है और योगी निज देह के पूर्णज्ञान को प्राप्त करता
है। इसका फल है देह सिद्धि या पिंडसिद्धि। इसका नामान्तर
है देह का अमरत्व । इसे नामान्तर से सिद्ध अवस्था कह सकते हैं।
परन्तु अभी भी जो यथार्थ अंतिम लक्ष्य है, वह दूर है। इस समय
योगी की देह ज्योतिर्मय आकार को लेकर प्रकाशमान होती है। यह
चैतन्य की सारभूत सत्ता है। परमपद के नित्य सिद्ध प्रकाश के
साथ इस प्रकाशमय आकार का एकत्वसंपादन ˙˙˙ सुदीर्घकाल तक
आत्मा के स्वरूपानुसंधान में तल्लीन रहने से हो सकता है। यही
५३. नाथ संप्रदायेर इतिहास०-पृ० २६६, २७१ ।
५४. वही—पृ०२६२, २६३, २६६-२६७, ३०१, ३०३ ।
५५. अमरौघशासनम्—पृ० ६ ।
५६. नाथ और संत साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन-डा० ना० उपाध्याय,
पृ० २७३ ।

[ २६ ]

सामरस्य है । ' ' ' सामरस्य और निरुत्थान दशा, दोनों के अंतराल में
कुछ अवस्थाओं का पता चलता है । पूर्ण स्वातन्त्र्य से समन्वित
आत्मा का स्फुरण निरुत्थान दशा के नाम से प्रसिद्ध है । ' ' ' नाथयो-
गियों का लक्ष्य यह है कि पहले पिंडसिद्धि के द्वारा जीवन्मुक्ति की
प्राप्ति हो । इस समय में कालवंचन सिद्ध होता है । अर्थात् काल
के प्रभाव से योगी मुक्त हो जाता है । इसके अनन्तर समरसीकरण
के द्वारा परा मुक्ति की सिद्धि होती है । प्रकारान्तर से कहा जा
सकता है कि पिंडसिद्धि या जीवन्मुक्ति के अनन्तर ओंकार साधना
के द्वारा परामुक्ति का आविर्भाव होता है ।५७
ऊपर बतायेगये नाथों के लक्ष्य से यह बात स्पष्ट हो गयी कि
नाथों के दो लक्ष्य हैं—प्रथम गौण और द्वितीय मुख्य । गौण लक्ष्य है
पिण्डसिद्धियुक्त जीवन्मुक्ति और मुख्य लक्ष्य है पिण्डपद का परमपद
में समरसीकरण । यदि पहले की दार्शनिक तत्त्वज्ञानात्मक विचारणा
को ध्यान में रखा जाय तो यह दूसरा लक्ष्य पूर्णतया स्पष्ट हो
जायगा । इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए नाथसंप्रदाय में विशेषकर
गोरक्षनाथ के ग्रंथों में साधनाक्रम का पूर्ण प्रकाशित रूप मिलता है ।
गोरक्ष के साधनमार्ग में 'गुरु' को बहुत महत्व दिया गया है ।
परमपद में समरसीकरण, जो नाथों का चरम लक्ष्य है, गुरु की कृपा
से ही होता है । गुरुचरणों में रत रहने से स्वसंवेद्य परमपद की
सिद्धि सम्भव बतलायी गयी है । केवल इसी साधन से योगियों
को पिण्ड के निरुत्थान का अनुभव होता है तथा उसके पश्चात्
समरसीकरण की सिद्धि होती है ।५८ सिद्धसिद्धान्तपद्धति में कहा
गया है कि सिद्धपुरुष अदैहिक साधनों का आश्रयण कर परमपद
को प्राप्त करते हैं और इन साधनों में स्थिति गुरु के दृक्पात से
होती है । इसलिए गुरु से बड़ा कोई नहीं है । वह अपनी करुणा
के खड्गपात से पशु (साधक) के आठों प्रकार के पाशों का छेदन

५७. वही—प्राक्कथन—म० म० डा० गोपीनाथ कविराज, पृ० ५-६ ।
५८. नाथ और सन्त-साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन—डा० ना० उपाध्याय,
पृ० २६७; सि० सि० प० अ० ना० यो० : सम्पादक—डा० कल्याणी
मल्लिक, सिद्धसिद्धान्तपद्धति, ५.१-१२ ।
५

[ ३० ]
करता है। उसकी इस प्रकार की क्रिया से साधक सम्यक् आनन्द में
मग्न हो जाता है। उसकी यह कृपा विश्रांतिकारक होती है। बिना
स्वात्मगत विश्रांति के पिंडपद का परमपद में समरसीकरण नहीं
हो सकता। शास्त्र, अनुमान, तर्क आदि से भ्रांत करनेवाला
गुरु गुरु नहीं। उपर्युक्त गुण-धर्मों से समलंकृत गुरु को प्राप्त
कर शिष्य जन्म और संसार-बंधन से मुक्त हो जाता तथा
परानन्दमय होकर निष्कल शिवत्व की उपलब्धि करता है।५९
प्रकृति के सभी विकारों का अवधूनन करनेवाला सिद्ध ही, अवधूत
योगी ही सद्गुरु का पद प्राप्त कर सकता है। सिद्धसिद्धान्तपद्धति
में सिद्ध योगी अवधूत को अत्याश्रमी, योगी, सिद्धयोगी, जितेन्द्रिय
आदि कहा गया है।६० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह में षोडशनित्यातन्त्र का
उद्धरण देकर गुरु रूप में शिव को नमस्कार किया गया है। गुरु
की ही कृपा से स्वल्प कल्प मात्र से सहज सिद्धि प्राप्त होती है।
इस गुरु को ३६ लक्षणों से सम्पन्न होना चाहिए। अधिक तत्वों से
गुरु कहा जाता है। गुरु से शिष्य के ४ लक्षण कम होते हैं अर्थात्
उसमें ३२ लक्षण आवश्यक माने गये हैं। इनसे कम लक्षणों से
युक्त सिद्ध व्यक्ति को गुरु रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए। ३२
से कम लक्षणों से युक्त व्यक्ति को शिष्य भी नहीं बनाना चाहिए।
इन ३२ लक्षणों के लिए आठ परीक्षाएं स्वीकार की गयी हैं। गोरक्ष-
सिद्धान्तसंग्रह में वर्णित ये लक्षण अवधूत-सम्प्रदाय के अनुसार
बताये गये हैं।६१ संक्षेप में हम इसे 'गोरक्षनाथ का गुरु-शिष्यवाद
और अधिकार-भेदवाद' कह सकते हैं।
नाथ मार्ग का परमपद 'नाथ' है। गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहकार ने
'नाथस्वरूपेणावस्थानम्' को ही लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया है।
नाथ के सम्बन्ध में पहले ही कहा गया है कि प्रसार और संकोच का
जो आदि अन्त है, वही साम्यावस्था है, वही निराभास है, वही
शिवावस्था है। यह समरसावस्था ही अद्वयावस्था है और यही समाधि
५९. सि० सि० ग्र० व० ना० यो० में सिद्धसिद्धान्तपद्धति, ५.५४-८१ ।
६०. वही, सिद्धसिद्धान्तपद्धति : सम्पूर्ण षष्ठ उपदेश ।
६१. गो० सि० सं०, पृ० ३१-३२, ४५, ४६, १४, ४०, ५६-५७ । नाथ
और सन्त साहित्य : पृ० २६८-७० ।