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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 128 में से

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महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, यद्यपि उनकी भाषा बहुत बदल गयी
है।४०
गोरक्षनाथ के दर्शन के मूल आधार ग्रंथ संस्कृत में हैं। ऊपर
जिन संस्कृत रचनाओं की ओर संकेत किया गया है, उनमें गोरक्ष-
दर्शन का तत्त्वविज्ञान बहुत ही पुष्ट रूप में प्रकाशित हुआ है।
अन्य बहुत से भारतीय दर्शनों की तरह ही गोरक्ष-दर्शन के तत्व-
विज्ञान का मूलाधार सांख्य का तत्वविज्ञान है। सिद्धसिद्धान्त-
पद्धति में काश्मीर शैव दर्शन के ३६ तत्वों का पूरा समाहार प्रतीत
होता है। वस्तुतः इस तत्त्वविज्ञान का मुख्य लक्ष्य नाथों का 'पिण्ड-
ब्रह्माण्डवाद' है। पिण्ड और ब्रह्माण्ड की समतत्वता और सम-
पदार्थता सिद्ध करने के लिए दार्शनिक आधार के रूप में इस तत्त्व-
विज्ञान का विकास किया गया है, ऐसा प्रतीत होता है। डा०
हजारीप्रसाद द्विवेदी, डा० कल्याणी मल्लिक आदि ने इस तत्त्व-
विज्ञान का विस्तार से विवेचन किया है।
प्रलयावस्था में शिव कार्य-कारण के चक्र-संचालन से विरत, कुल
अकुल-भेद से परे और अव्यक्त रहते हैं। इस अवस्था को सिद्धसिद्धां-
तपद्धति में 'स्वयं' कहा गया है।४१ इस परम शिव में सिसृक्षा उत्पन्न
होने पर उन्हें सगुण शिव कहा जाता है। यह सिसृक्षा ही शक्ति
है जिसके उत्पन्न होते ही शिव और शक्ति दो तत्व हो जाते हैं जो
इस स्थिति में अभिन्न रहते हैं। इसके बाद इन दोनों तत्वों का पांच
अवस्थाओं में विकास होता है, जो संक्षेप में इस प्रकार है-
शिव शक्ति
१-अपर : १--निजा (स्फुरित होने की पूर्ववर्तिनी,
स्फुरित होने को उपक्रान्त)
४०. विस्तार के लिए देखिए, (१) नाथ संप्रदाय पृ० ६८-१०२, (२) नाथ
संप्रदायेर इतिहास, दर्शन ओ साधनाप्रणाली, पृ० १२१-१५०, (३) नाथ
सिद्धों की बानियां डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, (४) सिद्धसिद्धान्तपद्धति
ऐंड अदर वर्क्स-डा० कल्याणी मल्लिक, (५) नाथ और संत साहित्य :
तुलनात्मक अध्ययन-डा० ना० उपाध्याय, पृ० २७-३४।
४१. कार्यकारणकर्तृत्वं यदा नास्ति कुलाकुलम् । अव्यक्तं परमं तत्वं स्वयं नाम
तदा भवेत् ॥ १-४ । सिद्धसिद्धान्तसंग्रह, रचयिता : बलभद्र, पृ० १ ।