सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 53

[ २३ ]
२—परम : २—परा ( स्फुरणोन्मुख )
• ३—शून्य : ३—अपरा ( स्पंदित होती है )
४—निरंजन : ४—सूक्ष्मा अहंता। 'मैं'-पन का
पृथक्ता का भाव।
५--परमात्म४२—इस अवस्था : ५-कुण्डली ।४३-( अपनी पृथक्ता में
में शिव विश्वप्रपंच की में पूर्ण सचेत, इसी शक्ति की सहा-
उत्पत्ति, पालन और यता से शिव इस विश्वप्रपंच की
संहार में समर्थ होते हैं । उत्पत्ति, पालन और संहार में
समर्थ होते हैं ) ।
[' • यह कुण्डली वेदान्तिक ब्रह्म की शक्ति 'माया' से भिन्न है । यह
चिच्छक्ति चिच्छीला, चिद्रूपिणी, अनन्तरूपा और अनन्त शक्तिरूपा
है। जगत् इसी शक्ति का परिणाम है और यही शक्ति जगत्-रूप में
परिणत होती है। इसे वेदनशीला भी कहा गया है और इसके अन्य
शक्तियों के समान ही पांच गुणपूर्णता, प्रतिबिम्बता, प्रबलता, प्रोच्च-
लता, प्रत्यङ्मुखता बताये गये हैं।४४ इसके बाद यह शक्ति सृष्टि-
क्रम को अग्रसर करने के लिए क्रमशः स्थूलता की ओर अग्रसर होती
है। शिव और शक्ति के बाद तीन परवर्ती क्रमविकास हैं—३ सदा-
शिव, अहंप्रधान, ४. ईश्वर इदंप्रधान, ५. शुद्धविद्या-उभयप्रधान ।४५
शिव क्रमशः उपर्युक्त पांच अवस्थाओं ( आनन्दों ) से होते हुए
'जीव' रूप की ओर अग्रसर होते हैं। वे क्रमशः स्थूल से स्थूलतर
४२-४३. ततोऽस्मिता पूर्वमर्चिमात्रं स्यादपरं परम् । तत्स्वसंवेदनाभास द्युत्पन्नं
परमं पदम् । स्वेच्छोमात्रं ततः शून्यं सत्तामात्रं निरञ्जनम् । तस्मात्ततः
स्वसाक्षाद्भूः परमात्मपदं मतम् ।' सि० सि० सं०, पृ० २, उप०
१, श्लो० १४-१५ ।
४४ नाथ संप्रदाय—पृ० १०४, सिद्धसिद्धान्तसंग्रह—'चिच्छीला कुण्डलिभ्यतः'—
१.६, सिद्धिसिद्धान्तपद्धति—'ततो वेदनशीला कुण्डलिनी शक्तिरुद्रता ।'—
१-७, पूर्णता, प्रतिबिम्बता, प्रबलता, प्रोच्चलता, प्रत्यङ्मुखता इति
पंचगुणा कुण्डलिनी शक्तिः ॥'—१-१२ ॥
४५. नाथ संप्रदाय—पृ० १०५ तथा पादटिप्पणी ।