आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 96, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ६१ ४३
अथ कथाप्रसंग ॥
गा हरकारा फिरि माड़ो को बारहदरी पहुँचा जाय ॥
बेटा जम्बै को सूरजमल तहँपर रहा रामको ध्याय १
खबरि सुनाई हरकाराने अनूपी मरण गयो सबगाय ॥
सुनिकै बातें हरकारा की मनजरिमरयो बघेलाराय २
तुरत नगड़ची को बुलवायो डंका तुरत दीन बजवाय ॥
हाथी घोड़ा औ तोपन को बबुरीबन का दीन हँकाय ३
हरियल घोड़ाकी पीठी पर आपो फांदिभयो असवार ॥
माथ नायके श्रीगणेश को औ मन सुमिरयो नन्दकुमार ४
सुमिरि भवानी जगदम्बाको औ शिव रामचन्द्रको ध्याय ॥
सूरज चलिभा बबुरीबनको औ रणखेत पहुँचा आय ५
आगे लश्कर के सूरजमल गरुई हांक दीन ललकार ॥
काकी माता नाहर जायो काके जमे करेजे बार ६
को कटवावत है बबुरीबन औ को मोहबेका सरदार ॥
कौन कहावत उदयसिंह है किसने डरा अनूपी मार ७
घोड़ा बेंदुला पर टहलत रहै यहु रणबाघु लंहुरवा भाय ॥
सुनिकै बातें सूरजमल की तुरतै बोला बनाफरराय ८
हमरी माता नाहर जायो हमरे जमे करेजे बार ॥
हम कटवावत हैं बबुरीबन हमहीं डरा अनूपी मार ६
कही सुना भा जब दूनों माँ दूनों कुँवर गये अलगाय ॥
सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतनभाय १०
बम्ब के गोला छूटन लागे धुँवना रहा सरग में छाय ॥
गोली ओलासम बरसत भइँ भन भन भन्न भन्न भन्नाय ११
छाय अँधरिया गै दिनही में औ तिलडरा भुईं ना जाय ॥