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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

४४ आल्हखण्ड । ६२
कौंधालपकनिविजुलीचमकनि रणमाँचमकिचमकिरहिजाय१२
ऐसि सिरोही मलखाने कै ठाकुर समरधनी मलखान ॥
काटि गिरायो राजपूतन को हाथिनमारि कीन खरिहान १३
जैसे भेड़िन भेड़हा पैठे जैसे अहिर विडारै गाय ॥
जैसे भाई आसमान में चन्दै राहु गरासै जाय १४
जैसे अर्ज्जुन के देखत में कौरव फौज जाय थराय ॥
जैसे पूजे शिवशंकर के दारिद तुरतै जाय नशाय १५
तैसे मलखे ज्यहिदिशि जावैं सो गलियार परै दिखलाय ॥
मलखे केरे भइ मुर्चा में कउ राजपूत न रोकै पायँ १६
सूरजमल औ ऊदन बाँकुड़ा दोऊ करें बराबर मार ॥
बैस बराबर है दोऊ कै दोऊ समरधनी सरदार १७
गदा बनेठी दोऊ खेलें कसरत करें नटन के साथ ॥
भाला बलछी दोनों बाँधे लीन्हे कड़ाबीन दोउहाथ १८
करें पैतड़ा रण खेतन में दोऊ रहे दुहुँन ललकार ॥
हनि हनि मारैं एक एक को दोऊ लेयँ ढालपर वार १६
बड़ी लड़ाई दोऊ कीन्ह्यो मानो छुटे जँगल के बाघ ॥
हारि न मानैं कोउ कोऊ ते दोऊ बड़े लड़ैया घाघ २०
खेंचि सिरोही सूरज लीन्ह्यो करिकै रामचन्द्रको ध्यान ॥
ऐंचि कै मारा बघऊदन के दोऊ हाथ सँभरिकै ज्वान २१
टूटि सिरोही गै सूरज कै खाली मूठि हाथ रहिजाय ॥
सूरज सोच्यो अपने मनमाँ हमरी मृत्यु गई नगच्याय २२
ऊदन बोल्यो तब सूरज सों मानो कही बघेलोराय ॥
कोदो देकें बाढ़ी धरायो तुम्हरे मरे चढ़ै ना घाय २३
सँभरिके बैठो अब घोड़ापर क्षत्री खबरदार है जाय ॥