आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ आल्हखण्ड । ६०
माथ नवावों पितु अपने का जिनमोहिंविद्यादीनपढ़ाय १७६
करों तरंग यहाँसों पूरण तव पद सुमिरि भवानी कन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छायही मोरि भगवन्त १७७
इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशी नवलकिशोरआत्मज बाबू
प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां
निवासि मिश्रवंशोद्भवबुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत
अनूपीवधोनामत्त्रतीयस्तरंगः ३ ॥
कवित्त ॥
चन्द्रभालमुण्डमाललोचनविशाललाल ओढ़ेतनवाघखाल पोढ़ेभक्तपाल है ।
मोहमार दामजार बैलके सवार यार मोर रखवारहोहु नाम जक्तपाल है ॥
सोहैं शीशगंगा फिरै भंगके उमंगा नंगा संग अर्द्धांगा गौरि दीननको घालहै ।
ध्यावैं औमनावै गावैं ललितहमेश शेष पावैं नहिं पार शिवकालहूको काल है १
सुमिरन ॥
दुर्गामाता तुमका ध्यावों नितप्रति दुर्गापाठ सुनाय ॥
तुम असिमाता को त्रिभुवनमाँ ड्योढ़ी जासु जुहारों जाय १
भयू यशोदाके पेटे सों त्रिभुवन जान तुम्हारी गाथ ॥
तुम्हरे भाई कृष्णचन्द्र भे त्रिभुवनपती चराचरनाथ २
जिनकी कीरति महभारत में पर्वै रची अठारह ब्यास ॥
मथा समुन्दर गा सतयुग में पूरी तबै सबैकी आश ३
भारत मथिकै मच्छोदर सुत गीता ताते कीन प्रकाश ॥
गीता धीता जो कोउ कीन्ह्यो लीन्ह्योजिति जगतकी फाँस ४
छूटि सुमिरनी गै देवनकै शाका सुनो बनाफर क्यार ॥
जम्बै राजा जो माड़ो का सूरज लड़िहै तासु कुमार ५