आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
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अथ आल्हाखण्ड ॥
आल्हानिकासी ॥
सवैया ॥
राम औ श्याम अकाम भजै सो तजै जगके सब पातकभाई ।
बामन पद प्रक्षालनके जलसों भइ गंग पुराणन गाई ॥
ज्ञात सबै बिख्यात सबय ललिते ज्यहि भांति धरापरआई ।
गाई बताई न जाय कछू अब कीरति गंग धरापर छाई १
सुमिरन ॥
ध्याय भवानी शिवशंकर को सुमिरन करै गंगको भाय ॥
सो तरिजावै भवसागर सों पावै अमर रूपको जाय १
गावै नित प्रति रघुनन्दन को नरपुर फेरि न जन्मै आय ॥
बड़ा महातम रघुनन्दन कत नारद वालमीकि कहगाय २
गीधअजामिल शबरीगणिका चारो कीरति रहे बताय ॥
कलियुग तुलसीकी समताको दूसर कौन बतावा जाय ३
॥