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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 592 में से

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पृष्ठ 73

चौथा अध्याय ] ५९
लिया। जो जो इस रहस्य को समझता है वह अश्विनों के
प्रिय धाम तक पहुँच जाता है और परम लोक को जीत लेता है।
अब नीचे का सूक्त बोलता है :-
.आभात्यग्निरुष सामनीकमुद् विप्राणां देवया वाचो अस्थुः ।
अर्वाञ्चा नूनं रथ्येह यातं पीपिवांसमश्विना घर्ममच्छ ॥१॥
न संस्कृत्तं प्र मिमीतो गमिष्ठान्ति नूनमपरिवनोऽस्तुतेह । दिवाभि-
पित्वेऽ व सागमिष्ठा प्रत्यवर्तिं दाशुषे शं भविष्ठा ॥२॥
उता यातं सङ् गवे प्रातरह्नो मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य । दिवा नक्त-
मवसा शन्तमेन नेदानीं पातिरश्विना ततान ॥३॥
इदं हि वां प्रदिवि स्थानमोक इमे गृहा अश्विनेदं दुरोणम् । आ नो
दिवो बृहतः पर्वतादद्द्भ्यो यातमभिपमूर्जं वहन्ता ॥४॥
समश्विनोरवसा नूतनेन मयो भुवा सुप्रणीती गमेम । आ नो रयिं
वहतमोत वीराना विश्वान्यमृता सौभगानि ।५॥ ( ऋ० ५।७६।१-५ )
पहले मन्त्र के चौथे पाद में "पीपिवांसं अश्विना घर्ममच्छ,
यह शब्द यज्ञ के बिल्कुल उपयुक्त हैं। जिनमें रूप-समृद्धता होती
है उन्हीं से सफलता होती है। यह त्रिष्टुभ छन्द में हैं। त्रिष्टुभ्
वीर्य है। इसलिये इन मन्त्रों के द्वारा प्रवर्ग्य में वीर्य (शक्ति) धारण
कराता है।
अब वह नीचे का सूक्त पढ़ता है :-
ग्रावाणेव तदिदर्थं जरेथे गृधेव वृक्षं निधिमन्तमच्छ । ब्रह्माणेव
विदथ उक्थशासा दूतेव हव्या जन्या पुरुत्रा ॥१॥
प्रातर्यावाणा रथ्येव वीराऽजेव यमा वरमा सचेथे । मेने इव तन्वाइ-
शुम्भमाने दम्पतीव क्रतुविदा जनेषु ॥२॥
शृङ्गेव नः प्रथमा भन्तमर्वाक् छुफाविव जर्भुराणा तरोभिः । चक्र-
वाकेव प्रति वस्तोरुस्रार्वाञ्चा यातं रथ्येव शक्रा ॥३॥
नावेव नः पारयतं युगेव नभ्येव न उपधीव प्रधीव । श्वानेव नो
अरिषण्या तद्नूं खगलेव विस्रसः पातमस्मान् ॥४॥