सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 74

६० [ प्रथम पञ्चिका
यातेवाजुर्या नद्येव रीतिरक्षी इव चक्षुषा यातमर्वाक् । हस्ताविव
तन्वे३ शम्भविष्ठा पादेव नो नयतं वस्यो अच्छ ॥५॥
ओष्ठाविव मध्वासने वदन्ता स्तनाविच पिप्यतं जीवसे नः। नासेव
नस्तन्वो रक्षितारा कर्णाविव सुश्रुता भूतमस्मे ॥६॥
हस्तेव शक्तिमभि सन्ददी नः क्षामेव नः समजतं रजांसि । इमा गिरो
अश्विना युष्मयन्तीः क्ष्णोत्रेणेव स्वधितिं सं शिशीतम् ॥७॥
एतानि वामश्विना वर्धनानि ब्रह्म स्तोमं गृत्समदासो अक्रन् । तानि
नरा जुजुषाणोपयातं बृहद् वदेम विदथे सुवीराः ॥८॥ (ऋ० २।३९।८)
इस सूक्त में आंख, कान, नाक का वर्णन है। इसलिये इस
सूक्त को पढ़ कर वह प्रवर्ग्य रूपी यज्ञ-पुरुष में इन्द्रियों को धारण
कराता है ।
यह सूक्त भी त्रिष्टुभ् में हैं। त्रिष्टुभ् वीर्य है। इस प्रकार वह
प्रवर्ग्य में वीर्य को धारण कराता है।
अब वह इस सूक्त को पढ़ता है :—
ईले द्यावा पृथिवी पूर्वचित्तयेऽग्निं घर्मं सुरुचं यामन्निष्टये इति ❋ ॥
(ऋ० म० १, सूक्त ११२)
इसमें “अग्निं घर्मं सुरुचं” शब्द आये हैं। इसलिये इनमें
रूप-समृद्धता है। जहां रूप-समृद्धता है वहां सफलता है।
यह सूक्त जगती छन्द में है। पशु जगती से सम्बन्ध रखते
हैं। इसलिये इस सूक्त के पाठ द्वारा वह पशुओं को प्रवर्ग्य में
धारण करता है। इस सूक्त में ऐसे शब्द आये हैं जैसे “याभिर-
मुमावतं” (दो बार) अर्थात् अश्विन देवों ने यह प्राप्त कराया।‡
इस लिये इस सूक्त के पाठ से वह प्रवर्ग्य रूपी यज्ञ पुरुष को वह
सब धारण कराता है जिसको देना अश्विन देवों को ठीक प्रतीत
हो। इन मन्त्रों से वह प्रवर्ग्य को समृद्ध करता है।
❋ यह २५ मंत्र हैं। ‡ सम्भवतः १।११२।२३