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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

५८ [ प्रथम पञ्चिका
अहं गर्भमदधामोषधीष्वहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः ।
अहं प्रजा अजनयं पृथिव्यामहं जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान् ॥३॥
(ऋ० १०।१८३।१-३)
अब होता भिन्न-भिन्न छन्दों वाले नीचे के नौ मंत्रों को
बोलता है :—
(१) का राधद् धोत्राश्विना वां को वां जोष उभयोः । कथा विधात्य-
प्रचेताः ॥
(२) विद्वांसाविद्दुरः पृच्छेदविद्वानित्थापरो अचेताः । नू चिन्नुमर्ते अक्रौ ॥
(३) ता विद्वांसा हवामहे वां ता नो विद्वांसा मन्म वोचेत मद्य । प्राच॑द्
दयमानो युवाकुः ॥
(४) वि पृच्छामि पाक्यान् देवान् वषट्कृतस्याद्भुतस्य दत्तः । पातं च
सह्यसो युवं च रभ्यसो नः ॥
(५) प्रया घोषे भृगवाणो न शोभे यया वाचा यजति पज्रियो वाम् ।
प्रैषयुर्न विद्वान् ॥
(६) श्रुतं गायत्रं तकवानस्याहं चिद्धि रिरेभाश्विना वाम् । आक्षी
शुभस्पती दन् ॥
(७) युवं ह्यास्तं महो रन्युवं वा यन्निरततं सतम् । ता नो वसू सुगोपा
स्यातं पातं नो वृकादघायोः ॥
(८) मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणे नो माकुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः । स्तना-
भुजो अशिश्वीः ॥
(६) दुहीयन् मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै । इषे च
'नो मिमीतं धेनुमत्यै ॥ (ऋ० १।१२०।१-६)
यह भिन्न-भिन्न छन्दों के मंत्र इस लिये बोले जाते हैं कि यज्ञ
रूपी शरीर के वाह्य अंग (हाथ पैर आदि) भिन्न-भिन्न परिमाण
के होते हैं, कोई पतले, कोई मोटे । इसलिये इन मंत्रों का परिमाण
भी भिन्न-भिन्न होता है । इन्हीं मंत्रों द्वारा ऋषि कक्षीवान् अश्विनों
के प्रिय धाम तक पहुँच गया। और उसने परमलोक को जीत