ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२२ [ सातवीं पञ्चिका
तपोष्पवित्रं विततं दिवस्पदे...( ऋ० ९।८३।१ )
या “अग्नये पवित्रवते स्वाहा” से आहवनीय में घी की एक
आहुति देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री का सोना ( हिरण्य )
खो जाय तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह ‘अग्नि हिरण्यवत्’
के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे । उसका याज्य
मंत्र यह है : -
हिरण्यकेशो रजसो विसारे...( ऋ० १।७६।१ )
अनुवाक्य यह है :—
आ ते सुपर्णा अमिनन्त एवैः...( ऋ० १।७६।२ )
या ‘अग्नये हिरण्यवते स्वाहा’ से आहवनीय में घी की
एक आहुति देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री प्रातःकाल स्नान किये
बिना अग्निहोत्र करे तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह
अग्नि वरुण के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे । याज्य
मंत्र यह है :—
त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्...( ऋ० ४।१।४ )
अनुवाक्य यह है :—
स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती...( ऋ० ४.१।५ )
या ‘अग्नये वरुणाय स्वाहा” से आहवनीय अग्नि में एक
आहुति दे । यही इस का प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री सूतका स्त्री का पकाया
अन्न खा ले तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ?
‘अग्नि तन्तुमत्’ के लिये आठ कपालों का पुरोडाश दे ।
उसका याज्य मंत्र यह है :—