ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 435, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें• दूसरा अध्याय ] ४२१
या 'अग्नये तपस्वते जनद्वते पावकवते स्वाहा' से आहवनीय
में घी की एक आहुति देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। (७)
९—अब प्रश्न है कि यदि कोई अग्निहोत्री आग्रायण इष्टि
में आहुति दिये बिना नया अन्न खाले तो उसका क्या प्रायश्चित्त
है ? वह "अग्नि वैश्वानर" के लिये दस कपालों का पुरोडाश
बनावे। उसका याज्य यह है :—
वैश्वानरो अजीजनत् पृष्टो दिविऴ
अनुवाक्य यह है :—
पृष्टो अग्निः पृथिव्याम् (ऋ० १।९८।२ )
या 'अग्नये वैश्वानराय स्वाहा' से आह्वनीय में घी की
एक आहुति दे देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न है कि यदि पुरोडाश का कपाल टूट जाय तो
क्या प्रायश्चित्त है ? वह अश्विनों के लिये दो कपालों में पुरो-
डाश बनावे। याज्य यह है :—
आश्विना वर्तिरस्मदा...( ऋ०. १।९२।१६ )
अनुवाक्य यह है :—
आ गोमतानासत्यारथेन...( ऋ० ७।७२।१ )
या 'अश्विभ्यां स्वाहा' से आहवनीय में घी की आहुति दे
देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री का पवित्रा (कुश) खो
जाय तो उसका क्या प्रायश्चित्त है। वह "अग्नि पवित्रवत्"
के लिये आठ कपालों का पुरोडाश दे। याज्य मंत्र यह है :—
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते...( ऋ० ९।८३।१ )
अनुवाक्य यह है :—
ऴ यह मन्त्र कहाँ का है, पता नहीं ।