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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 592 में से

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पृष्ठ 437

दूसरा अध्याय ] ४२३
तं तुं तन्वन् रजसो...( ऋ० १०।५३।६ )
उसका अनुवाक्य यह है :—
अन्नानद्दो नद्यतनोत सोमा...( ऋ० १०।५३।७ )
या "अग्नये तन्तुमते स्वाहा" से ही आह्वनीय में घी की
आहुति दे दे । इसका यही प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न यह है कि यदि कोई अग्निहोत्री अपने जीवन-
काल में किसी को सुने कि वह उसे मरा बताता है तो इसका
क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि सुरभिमत्' के लिये आठ कपालों
का पुरोडाश देवे । उसका याज्य मंत्र है :—
अग्निर्होतान्यसीदत्...( ऋ० ५।१।६ )
और अनुवाक्य यह है :—
ऊर्ध्वामकृद्देववीतिं नो अद्य ( ऋ० १०।५३।३ )
या 'अग्नये सुरभिमते स्वाहा' से आहवनीय अग्नि में
आहुति देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि यदि किसी अग्निहोत्री की स्त्री या गाय
जुड़वाँ बच्चे दे तो इसका क्या प्रायश्चित्त है । वह 'अग्नि
मरुत्वत्' के लिये तेरह कपालों का पुरोडाश बनावे । उसका
याज्य मंत्र यह है :—
मरुतो यस्य हि क्षये...( ऋ० १।८६।१ )
और अनुवाक्य यह है :—
अरा इवेदचरमा अहेव...( ऋ० ५।५८।५ )
या केवल 'अग्नये मरुत्वते स्वाहा' से आहवनीय में घी की
आहुति देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि अपत्नीक ( जिसकी स्त्री मर गई हो )
अग्निहोत्री आहुतियाँ दे या न दे । उसे देना चाहिये । अगर
न देगा तो 'अनद्धा' कहलायेगा । अनद्धा कौन है ? जो न देवों