ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२० [ सप्तम पञ्चिका
या 'अग्नये व्रतभृते स्वाहा' से आहवनीय में घी की एक
आहुति दे दे । यही उसका प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री उपवास के दिन व्रत के
विरुद्ध कोई कार्य्य करे तो उसका प्रायश्चित्त क्या है ? वह
'अग्नि व्रतपति' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये ।
उसका याज्य मंत्र यह है :—
त्वमग्ने व्रतपा असि...( ऋ० ८।११।१ )
अनुवाक्य यह है :—
यद्बो वयं प्रमिनाम व्रतानि...( ऋ० १०।२।४ )
या केवल 'अग्नये व्रतपतये स्वाहा' से आहवनीय में घी
की आहुति दे देवे । यही उसका प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न यह है कि यदि अग्निहोत्री अमावस्या या पूर्ण-
मासी का यज्ञ छोड़ जावे तो इसका क्या प्रायश्चित्त है । वह
'अग्नि पथिकृत' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे ।
इसका याज्य मंत्र यह है :—
वेत्था हि वेधो अध्वनः ( ऋ० ६।१६।३ )
अनुवाक्य यह है :—
आ देवानामपि पंथा अगन्म...( ऋ० १०।२।३ )
या केवल 'अग्नये पथिकृते स्वाहा' से आहवनीय में घी की
एक आहुति देवे । यही उसका प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि यदि किसी अग्निहोत्री की तीनों अग्नियां
बुझ जावें तो उसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि तपस्वत्
जनद्वत् पावकवत्' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे ।
उसकी याज्य आहुति यह है :—
आयाहि तपसा जनेषु ( आश्व० ३।११ )
अनुवाक्य यह है :—
आ नो याहि तपसा जनेषु ( आश्व० ३।११ )