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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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२९८ [ पाँचवीं पञ्चिका
के वसु या शरीर है। यह शाक्वर पांक्त है और दूसरे दिन के
समान वर्तमान काल है। यह पांचवें दिन के रूप हैं।
आज्य शस्त्र है "इममृधुवो अतिथि मुषुबु धम्"
(ऋ० ६।१५)
छन्द जगती है और छन्दों के साथ भी। यह पशुओं का
रूप है। यह पांचवें दिन का रूप है।
पांचवे' दिन के प्र-उग शस्त्र में जो बृहत् छन्द में हैं नीचे के
मंत्र हैं :—
आ नो यज्ञं दिविस्पृशं वायो याहि सुमन्मभिः। अन्तः पवित्र
उपरि श्रीणानोयं शुक्नो अयामि ते॥
वेत्यध्वर्युः पथिभी रजिष्ठैः प्रति हव्यानि वीतये। अधा नियुत्व
उभयस्य नः पिब शुचिं सोमं गवाशिरम्॥ (ऋ० ८।१०१।६-१०)
आ नोने वायो महे तने याहि मखाय पाजसे। वयं हि ते चकृमा
भूरि दावने सद्यश्चिन्महि दावने। (ऋ० ८।४६।२५)
रथेन पृथु पाजसा दाश्वांसमुप गच्छतम्। इन्द्रवायू इहागतम्॥
इन्द्रवायू अयं सुतस्तं देवेभिः सजोषा। पिवतं दाशुषो गृहे॥
इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्र वायू विमोचनम्। इह वां सोम पीतये॥
(ऋ० ४।४६।५-७)
बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः। त्रीणि ये येमुर्विदथानि
धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः॥
वि ये दधुः शरदं मासमादर्हर्यज्ञमक्तुं चाहृचम्। अनाप्यं वरुणो
मित्रो अर्यमा क्षत्रं राजान आशत॥
तद्वो अद्य मनामहे सूक्तैः सूर उदिते। यदोहते वरुणो मित्रो अर्यमा
यूयमृतस्य रथ्यः॥ (ऋ० ७।६६।१०-१२)
इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना। अयं वामह्वे ऽवसे
शचीवसू विशं विशं हि गच्छथः॥