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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 592 में से

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पृष्ठ 289

पाँचवाँ अध्याय ] २७५
“यद् वावान्” ।
साम प्रगाथ है :—
उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः । सत्राच्या मघवा सोमपीतये
धिया शविष्ठ आ गमत् ॥
तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः । उतोपमानां
प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः॥ ( ऋ० ८।६१।१-२ )
उभय का अर्थ है जो आज है और जो कल था । यह बृहत्
साम का है। यह दूसरे दिन का रूप है।
तार्क्ष्य वही है:—
“त्यमूषु वाजिनं देवजूतम् ॥” ( ३ )
३२—निष्केवल्य शस्त्र का निविद् है :—
यां त ऊतिरवमा या परमा...(ऋ० ६।२५) इसमें “वृष्ण्यानि”
शब्द आया है । 'वृषन्' दूसरे दिन का रूप है ।
वैश्वदेवशस्त्र का प्रतिपद् यह है :—
विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीत सख्यम् । विश्वो राय इषुध्यति द्युम्नं
वृणीत पुष्यसे ॥ ( ऋ० ५।५०।१ )
तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
देवस्य सवितुर्वयं वाजयनतः पुरन्ध्या । भगस्य रातिमीमहे ॥
( ऋ० ३।६२।१०-११ )
इसके अनुचर यह हैं :—
आ विश्वदेवं सत्पतिं सूक्तैरद्या वृणीमहे । सत्यसवं सवितारम् ॥
य इमे उभे अहनी पुर एत्यप्रयुच्छन् । स्वाधीर्देवः सविता ॥
य इम विश्वा जातान्याश्रावयति श्लोकेन । प्र च सुवाति सविता ॥
( ऋ० ५।८२।७-९ )
यह बृहत् दिन या दूसरे दिन के हैं। दूसरा दिन का यही
रूप है।
सविता का निविद् सूक्त यह है :—