ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें२७४ [ चौथी पञ्चिका
ब्रह्मणस्पति का प्रगाथ यह है "उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते" । इसमें
“उत्तिष्ठ” (उत्) शब्द ऊर्ध्व के अर्थ में है । यह दूसरे दिन
का रूप है।
धाय्य वही हैं :-
अग्निर्नैता, त्वं सोम ऋतुभिः, पिन्वन्त्यपः । (ऐतरेय ब्रा० ३।१८)
मरुत्वतीय प्रगाथ यह है :-
बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम् । येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो
देवं देवाय जागृवि ।।
अपाधमत्तमिश्रस्तिरस्तिहाऽथेन्द्रो द्युभ्यामभवत् । देवास्त इन्द्र
सख्याय येमिरे बृहद् भानो मरुद्गणं ॥ ( ऋ० ८।८६।१-२ )
इसमें 'ऋतावृधः' शब्द में 'वृधन्' शब्द आ गया । यही
दूसरे दिन का रूप है।
मरुत्वतीय शस्त्र का निविद् सूक्त यह है :-
इन्द्र सोमं सोमपते.........( ऋ० ३।३२ )
इसमें 'आवृषस्व' में वृषन् शब्द आया है । [गवाशिरं......
तृपदा वृषस्वा ३।३२।२] यह दूसरे दिन का रूप है।
बृहत् पृष्ठ यह है :-
त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः । त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं
नरस्त्वां काष्ठा स्वर्वतः ॥
स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया महः स्तवानो अद्रिवः । गामश्वं
रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे ।। ( ऋ० ६।४६।१-२ )
त्वं ह्येहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये । उद्वावृषस्व मघवन् गविष्टय
उदिन्द्राश्वमिष्टये ॥
त्वं पुरु सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय मंहसे । आ पुरन्दरं
चकृम विप्रवचस इन्द्रं गायन्तोऽवसे ।। ( ऋ० ८।६१।७-८ )
यह बार्हत दिन का होता है। यह दूसरे दिन का रूप है।
निष्केवल्य शस्त्र की धाय्या वही है-