ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय
७.-प्रजापति ने अपनी लड़की सूर्या सावित्री को सोम
राजा को ब्याह दिया । सब देव मेहमान होकर आये । प्रजापति
ने उनके लिये वहतु के रूप में ( मेहमानों को जो चीजें अर्पण
की जाती हैं उनको 'वहतु' कहते हैं ) हज़ार मंत्रों का शस्त्र
बनाया जिसे अश्विन-शस्त्र कहते हैं । जो एक हज़ार से कम रहे
वह अश्विनों का नहीं है । इसलिये होता को चाहिये कि एक
हज़ार मंत्र बोले या अधिक । घी को खाकर बोले । जैसे लोक
में गाड़ी या रथ के पहियों में तेल लगाने से अच्छे चलते हैं
इसी प्रकार ( घी खाने से ) वाणी भी अच्छी चलती है । शकुनि
या बाज़ की तरह बैठकर आहाय पढ़े ।
देव आपस में यह निश्चय न कर सके कि यह हज़ार मंत्र
किस के हों । हर एक ने कहा, "मेरे हों," "मेरे हों ।" जब एक
मत न हो सके तो यह ठहरा कि एक दौड़ दौड़ें । जो जीते उसी
के यह मंत्र हों । उन्होंने सूर्य्य को जो अग्नि के भी ऊपर है
गृहपति और काष्ठ ( सीमा ) नियत किया ❁ । इसीलिये अश्विन
शस्त्र का आरंभ इस अग्नि की ऋचा से होता है :-
❁ अर्थात् वह गार्हपत्य अग्नि से चलकर सूर्य्य तक दौड़े ।
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