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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

पाँचवाँ अध्याय ] १४९
है। क्योंकि वह देर में पहुँचेगा। इसलिये जो ब्राह्मण बह्वृच
( बहुत ऋचायें जानने वाला ) और वीर्यवान हो, वही अच्छा-
वाक का कार्य करे। क्योंकि तभी वह अहीन ( न खोया
हुआ ) हो सकता है। (४)
३७—यह जो यज्ञ है वह देवों का रथ है। आज्य और
प्रउग दो बीच की रस्सियां हैं। पवमान स्तोत्र के बाद आज्य
पढ़ने और आज्य स्तोत्र के बाद प्र-उग पढ़ने से होता देवों के
रथ की रस्सियों को थाम लेता है कि रथ टूट न जाय। उसी
का अनुकरण करके मनुष्यों के रथों की रस्सियों को सारथी
थामते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसका देवरथ या
मनुष्यरथ टूटने नहीं पाता।
यहाँ एक शंका होती है। नियम यह है कि शस्त्रस्तोत्र के
अनुकूल होना चाहिये। सामगाओं के पवमान गाने पर होता
अग्नि के आज्य स्तोत्र को कहता है। तो यह पवमान के अनुकूल
कैसे हो जाता है ? इसका समाधान यह है कि “अग्नि पवमान”
है। जैसे ऋषि ने कहा :—
अग्निऋषिः पवमानः। (ऋ० ६।६६।२०)
इसलिये अग्नि वाले मंत्रों से आज्य शस्त्र आरंभ होता है,
वह पवमान स्तोत्र के अनुकूल हो जाता है।
अब प्रश्न होता है कि जब नियम यह है कि स्तोत्र शस्त्र के
अनुकूल हो तो सामगाओं का स्तोत्र गायत्री छन्द में और होता
का आज्य-शस्त्र अनुष्टुभ् में क्यों होता है ? इसका उत्तर यह
है कि योग तो ठीक ही है। आज्य शस्त्र के अनुष्टुभ् छन्द में
सात मन्त्र हैं। पहले और पिछले मन्त्र को तीन बार बोलने से
११ हो जाते हैं। बारहवाँ याज्य मन्त्र विराट् में है। उसे भी
गिन लेना चाहिये क्योंकि एक या दो अक्षरों के बढ़ने से छन्दो-
भेद नहीं होता। यह बारह अनुष्टुभ् १६ गायत्री के बराबर