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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 592 में से

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पृष्ठ 164

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१५० [ दूसरी पञ्चिका
हैं। अनुष्टुभ् छन्द का शस्त्र इस प्रकार स्तोत्र के गायत्री छन्दों
के बराबर हो जाता है। होता के आज्य शस्त्र का याज्य मन्त्र
यह है।
अग्न इन्द्रश्च दाशुषो दुरोणे सुता॒वतो य॒ज्ञमिहोप॑ यातम्। अमर्धन्ता
सोम॑ पेयाय देवा ॥ (ऋ० ३।२५।४)
(यहाँ 'इन्द्राग्नी' के बजाय अग्नि-इन्द्र कहा है। इसका
कारण यह है कि) इन्होंने इन्द्राग्नी के रूप में विजय नहीं
पाई किन्तु "अग्नीन्द्रौ" के रूप में। अग्नीन्द्र का याज्य वह
विजय पाने के लिये पढ़ता है। यह मन्त्र विराट् छन्द में है जो
तेतीस अक्षर का होता है। देव तेतीस हैं, आठ वसु, ग्यारह रुद्र
और बारह आदित्य ; एक प्रजापति और एक वषट्कार । इस
प्रकार वह पहले ही शस्त्र में एक एक अक्षर एक एक देवता के
लिये कह देता है। अक्षरों के क्रम से ही देव सोमपान करते
हैं। इस प्रकार देवपात्र से देवता तृप्त हो जाते हैं।
अब प्रश्न यह है कि जब याज्य मन्त्र शस्त्र के अनुकूल
होना चाहिये तो आज्य शस्त्र केवल अग्नि का है, फिर याज्य
मन्त्र अग्नीन्द्र का क्यों है ? इसका उत्तर यह है कि अग्नि-इन्द्र
याज्य वही है जो इन्द्राग्नी याज्य है। यह इन्द्राग्नी का शस्त्र है
जैसा ग्रह और तूष्णींशंस से प्रकट होता है। अध्वर्यु नीचे के
मन्त्र से ग्रह को लेता है :–
इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्। अस्य पातं धियेषि॒ता ॥
(ऋ० ३।१२।१)
"हे इन्द्र और अग्नि, स्तुतियों के साथ बादल के समान
पवित्र सोम के पास आओ। और बुद्धि से प्रेरित होकर इसको
पियो"।
होता की तूष्णीं-शंस या "चुपचाप प्रार्थना" यह है:–