ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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मिलाकर अगले भाग को पतला कर देता है। यही हाल दण्ड
या कुठार का है ! इस प्रकार वह अपने शत्रु पर प्रहार करता
है। जिस शत्रु को दबाना हो, वज्र उसको दबा लेगा। (३)
३६—इन लोकों में देव और असुर लड़ते थे। देवों ने
( उत्तर वेदी के दक्षिण को ) ऋत्विजों के बैठने के स्थान (सदस् )
को ग्रहण किया। असुरों ने उनको वहाँ से उठा दिया। तब
वे उत्तर वेदी के वांई ओर आग्नीध्र के स्थान पर चले गये।
वहाँ वह पराजित न हो सके। इस लिये ऋत्विज् आग्नीध्र के
पास बैठते हैं। सदस् पर नहीं। आग्नीध्र के पास बैठ कर वह
अग्नि के पास घरे जाते हैं इसलिये उसे आग्नीध्र कहते हैं।
आग्नीध्र का आग्नीध्रत्व यही है।
असुरों ने देवों के सदस् की अग्नि को बुझा दिया। लेकिन
देवों ने आग्नीध्र से अपने सदस् की अग्नि को जला लिया। इस
प्रकार उन्होंने असुरों और राक्षसों को हरा दिया और बाहर
निकाल दिया। इस लिए यजमान लोग आग्नीध्र से अग्नि लेकर
असुरों और राक्षसों को हरा देते और निकाल देते हैं।
उन्होंने प्रातःकाल के आज्यों द्वारा विजय पाई, और जीती
हुई जगह पर आ गये। इसी लिये इनका नाम आज्य पड़ा।
यही आज्यों का आज्यत्व है।
उन विजय पाये हुये होताओं के शरीरों में से केवल अच्छा-
वाक का शरीर न मिल सका क्योंकि इन्द्र और अग्नि उसमें
घुस गये थे। देवों में इन्द्र और अग्नि ही बड़े और बलवान
तथा जीतने वाले, उत्तम और अच्छे मित्रों वाले हैं। इस लिये
प्रातः सवन में अच्छावाक इन्द्र और अग्नि की स्तुति करता
है। क्योंकि इन्द्र और अग्नि ने ही अच्छावाक के शरीर में
प्रवेश किया था। इस लिये अन्य होता अपने स्थान पर पहले
जाते हैं और पीछे से अच्छावाक। जो पीछे आवे वही हीन