ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२२ [ दूसरी पञ्चिका
तैंतीस देवता सोमपा हैं। ३३ असोमपा ।
सोमपा यह हैं। आठ वसु, ११ रुद्र, बारह आदित्य, प्रजा-
पति, और वषट्कार ।
असोमपा यह हैं, ११ प्रयाज, ११ अनुयाज, ११ उपयाज ॥
यह पशु में भाग रखते हैं।
सोम से सोमपा देवताओं को संतुष्ट करता है और पशु से
असोमपा देवताओं को । इस प्रकार जो इस रहस्य को समझता
है वह दोनों प्रकार के देवों को सन्तुष्ट कर देता है।
वह इस मंत्र से समाप्त करता है :-
अभूदुषा रुशत् पशुरग्निरधाय्यृत्वियः। अयोजि वां वृषण्वसू रथो
दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥ ( ऋ० ५।७५।६ )
( श्वेत पशु वाली उषा आ गई । ऋतु के अनुकूल अग्नि रख
दी गई। हे विचित्र वीरो ( दोनों अश्विनो ) तुम्हारा न मरने
वाला रथ जोता जा चुका । हे मधु को प्रिय रखने वाले, तुम
दोनों हमारे बुलाने को सुनो ) ।
इस पर प्रश्न होता है कि यदि अग्नि के, उषा के और अश्विन
की तीन ऋचाओं को बोलता है तो यह एक ऋचा बोलने का क्या
प्रयोजन है ? इसका उत्तर यह है कि इस ऋचा में तीनों देवों
का वर्णन है। "अभूदुषा रुशत् पशुः" यह 'उषा' के लिये ।
"अग्निरधाय्यृत्वियः" यह अग्नि के लिए । "अयोजि वां वृषण्वसू
रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ।” दोनों अश्विनों के
लिये । इस प्रकार एक ऋचा से समाप्त करने से तीनों देवों की
स्तुति शामिल हो जाती है। (८)