ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ
पृष्ठ 135, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 135दूसरा अध्याय ] १२१
दूसरा अध्याय ] १२१
यजमान के हित के लिये प्रातरनुवाक पाद पाद करके बोलने
चाहिये । पशुओं के चार पाद होते हैं। ( ऐसा करने से ) पशुओं
को पाता है। ऋचायें आधी आधी करके बोलनी चाहियें ।
यह जो इस प्रकार बोलता है प्रतिष्ठा के लिए बोलता है। मनुष्य
के दो पाद होते हैं पशु के चार पाद । इस प्रकार वह दो पैर
वाले यजमान को चार पैर वाले पशुओं में स्थापना करता है।
इसलिए प्रातरनुवाक को आधी आधी ऋचा करके बोलना
चाहिये ।
यहाँ यह प्रश्न होता है कि प्रातरनुवाक तो व्यूह हैं, फिर यह
अव्यूह कैसे हो गये ? इसका उत्तर यह है कि *"यदि इसके
मध्य से बृहती छन्द चला न जाय”।
कुछ देवता आहुतियों में भाग लेते हैं, कुछ स्तोमों ( साम-
वेदीय प्रार्थना ) में। कुछ छन्दों में। आहुतियों से उन देवों
को प्रसन्न किया जाता है जो आहुतियों में भाग लेने वाले हैं।
स्तुति और प्रशंसा से उनको जो स्तोम और छन्दों में भाग
लेने वाले हैं। जो इस रहस्य को समझता है उससे दोनों प्रकार
के देव सन्तुष्ट रहते हैं।
*छन्दों का साधारण क्रम यह है—गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्,
बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री में २४ अक्षर होते हैं।
उष्णिक् में २८, अनुष्टुप में ३२, बृहती में ३६, पंक्ति में ४०, त्रिष्टुप्
में ४४ और जगती में ४८। इस प्रकार हर दूसरे में ४ अक्षर बढ़
जाते हैं। इस क्रमशः बढ़ने को व्यूह्ल कहते हैं। प्रातरनुवाक में छन्दों
का क्रम टूट जाता है अर्थात् गायत्री, अनुष्टुप, त्रिष्टुप्, बृहती, उष्णिक्,
जगती, पंक्ति। इस प्रकार यह अव्यूह्ल हो गये। इसका उत्तर यह
दिया गया है कि 'बृहती' छन्द बीच से उठाया नहीं गया इस लिये
व्यूह्ल का अव्यूह्ल हो गया।