ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अध्याय ] ६७
वह उषा और रात्रि के लिए याज्य मंत्र बोलता है। उषा
और रात्रि का अर्थ है दिन और रात। इस प्रकार वह रात
और दिन को संतुष्ट करता है और यजमान में रात और दिन
को धारण कराता है। दो दिव्य होताओं के लिये याज्य मंत्र
बोलता है। प्राण और अपान दिव्य होता है। इस प्रकार वह
प्राण और अपान को संतुष्ट करता है और प्राण और अपान
को यजमान में धारण कराता है।
तीन देवियों के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण, अपान,
और व्यान तीन देवियाँ हैं। इस प्रकार वह इनको संतुष्ट करता
है और प्राण, अपान और व्यान को यजमान में धारण
कराता है।
वह त्वष्टा के लिये याज्य मंत्र बोलता है। वाणी ही त्वष्टा है।
वाणी मानो सब संसार को “ताष्ट्रि” या बनाती है। इस प्रकार
वह वाणी को संतुष्ट करता है और यजमान में वाणी को धारण
कराता है, वनस्पति के लिये याज्य मंत्र बोलता है। वनस्पति
प्राण है। इस प्रकार वह प्राण को संतुष्ट करता है और यजमान
में प्राण को धारण कराता है।
स्वाहाकृतियों के लिये मंत्र बोलता है। स्वाहाकृतियां प्रतिष्ठा
हैं। इस प्रकार वह यज्ञ को ठीक ठीक स्थापित करता है। ऐसे
मंत्र बोलने चाहिये जिनका सिलसिला ऋषियों से मिल सके।
इस प्रकार वह यजमान की ऋषियों के साथ बन्धुता स्थापित
कराता है। (४)
५—(अग्नि को ले जाना)
जब अग्नि (पशु के) चारों ओर ले जाते हैं तो अध्वर्यु कहता
है “मंत्र बोल”।
अब होता अग्नि देवता और गायत्री छन्द वाले नीचे के तीन
मंत्र बोलता है :—
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