ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें९८ [ दूसरी पञ्चिका
( १ ) अग्नि॒र्होता॑ नो अध्व॒रे वा॒जी सन् परिणीयते ।
दे॒वो दे॒वेषु॑ य॒ज्ञियः॑ ॥ ( ऋ० ४।१५।१ )
( २ ) परि॑ त्रि॒विष्ट्य॑ध्व॒रं यात्य॒ग्नी र॑थी॒रिव॑ ।
आ दे॒वेषु॒ प्रयो॒ दध॑त् ॥ ( ऋ० ४।१५।२ )
( ३ ) परि॒ वाज॑पतिः क॒विर॒ग्निर्ह॒व्यान्य॑क्रमीत् ।
दध॒द्रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ॥ ( ऋ० ४।१५।३ )
( अग्नि होता हमारे यज्ञ में घोड़े के समान बन जाता है ।
यह देवों में यज्ञ सम्बन्धी देव है ॥१॥ रथी के समान अग्नि यज्ञ
के चारों ओर तीन बार जाता है । वह देवों के लिये आहुति को
धारण करता है ॥२॥ अन्न का पति, कवि (वस्तुओं का प्रकाश)
अग्नि, हवियों की परिक्रमा करता है । वह यजमान को धन
देता है ॥३॥ )
इस लाई हुई अग्नि को इस प्रकार इसी के देवता और
उसी के छन्दों द्वारा बढ़ाता है । "वाजी सन् परिणीयते" का
अर्थ है कि घोड़े के समान उसको चारों ओर फिराते हैं । "परि
त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव" का अर्थ है कि यह अग्नि रथी
के समान यज्ञ के चारों ओर फिरता है । "परिवाजपतिः कविः"
का अर्थ है कि वह वाज अर्थात् अन्नों का पति है ।
अब अध्वर्यु कहता है, "हे होता, देवों के हव्य के लिये
आदेश कर" ।
अब मैत्रावरुण आदेश करता है, "अग्नि की विजय हो ।
अग्नि हव्य का खाना दे ।"
यहाँ प्रश्न होता है कि जब अध्वर्यु ने आदेश देने के लिये
होता को कहा तो मैत्रावरुण ने क्यों आदेश दिया ? इसका उत्तर
यह है कि मैत्रावरुण तो यज्ञ का मन है । होता यज्ञ की वाणी
है । मन से ही प्रेरित होकर वाणी बोलती है । जो बिना मन के
बोलता है, वह आसुरी वाणी है और देव उसको ग्रहण नहीं