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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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९६ [दूसरी पञ्चिका
यही उन दोनों का स्थायी भाग है। इसलिए इसमें से लेना
चाहिये और खाना चाहिये। (३)
४-(अब आप्रि मंत्रों का वर्णन आता है)
अब होता आप्रि मंत्रों का पाठ करता है। आप्रि मंत्र तेज
और ब्रह्मवर्चस के देने वाले हैं। इसलिये इन मंत्रों को पढ़ कर
यह यजमान को तेज और ब्रह्मवर्चस दिलाता है।
वह समिधाओं के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण ही
समिधा है। प्राण ही इस सब जगत् को प्रज्वलित करते हैं।
इस प्रकार वह प्राणों को संतुष्ट करता है और यजमाने में प्राण
धारण कराता है।
अब तनूनपात् के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण ही
तनूनपात् है। क्योंकि वह तनू अर्थात् शरीर की 'पाति' अर्थात्
रक्षा करता है। इस प्रकार वह प्राणों को संतुष्ट करता है और
प्राण ही यजमान में धारण कराता है।
अब नराशंस के लिये याज्य मंत्र बोलता है। 'नर' का अर्थ
है संतान और 'शंस' का अर्थ है वाणी। इस प्रकार वह संतान
और वाणी को सन्तुष्ट करता है और यजमान में सन्तान और
वाणी धारण करता है।
अब इला के लिये याज्य मंत्र बोलता है। इला का अर्थ है
अन्न। इस प्रकार वह अन्न को संतुष्ट करता है और यजमान में
अन्न धारण कराता है।
अब वह बर्हि के लिये याज्य मंत्र बोलता है। बर्हि पशु हैं।
इस प्रकार वह पशुओं को संतुष्ट करता है और यजमान में
पशुओं को धारण कराता है।
अब वह यज्ञशाला के द्वारों के लिये याज्य मंत्र बोलता है।
द्वार वृष्टि हैं। इस प्रकार वह वृष्टि को संतुष्ट करता है और
वृष्टि तथा अन्न आदि को यजमान में धारण कराता है।