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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

सप्तदशोऽध्यायः (119)
कृतकृत्यस्ततः शिष्यस्तस्मै सर्वं निवेदयेत्।
यच्च यावच्च यद्भक्त्या गुरुवे हृष्टचेतनः।।141।।
गोभूहिरण्यं विपिनं गृहं क्षेत्रादिकं मुने।
न चेदर्द्धं तदर्द्धं वा दशांशमपि वापि वा।।142।।
अक्लेशादन्नवस्त्रादि दद्याद् वित्तानुसारतः।।143।।
प्रकारान्तरमालम्ब्य गुरुं यत्नेन तोषयेत्।
गुरुपुत्रकलत्रादीन् तोषयेद् बहुभक्तितः¹।।144।।
अर्हणादिश्च बहुभिर्भक्त्याच्छादनभूषणैः।
तब शिष्य चेतना का दर्शन कर कृतकृत्य होकर प्रसन्न चित्त से गुरु को
भक्तिपूर्वक सब कुछ गाय, भूमि, सोना, वन, घर, खेत आदि समर्पित करे। यदि
न हो, तो इसका आधा, आधे का आधा या दशांश भी दे। स्वयं कष्ट न कर धन
के अनुसार अन्न वस्त्र आदि गुरु को समर्पित करें। अन्य विधि से भी यत्नपूर्वक
गुरु को सन्तुष्ट करें। गुरु की पत्नी उनके पुत्र आदि को भी भक्तिभाव से
वस्त्राभूषण देकर उनकी पूजा कर सन्तुष्ट करें।
एवमुक्तप्रकारेण गुरवे दत्तदक्षिणः।
कृतकृत्यं तथात्मानं मत्वा विप्रांश्च भोजयेत्।।145।।
तेभ्यश्च² दक्षिणां दत्त्वा सर्वं तत्प्रतिपूजयेत्³।
ब्राह्मणाशीर्वचोभिश्च गुर्वाशीर्भिः समेधितः।।146।।
विसर्जयेच्च गुर्वादीन् ततो भुञ्जीत मन्त्रवित्।
इस प्रकार ऊपर कही गयी विधि से गुरु को दक्षिणा देकर स्वयं को
कृतकृत्य मानकर ब्राह्मण भोजन कराएँ। उन्हें दक्षिणा देकर उनका अभिवादन
करें। इस प्रकार ब्राह्मणों और गुरु के आशीर्वाद से पवित्र होकर गुरु आदि को
विदा करें तब साधक स्वयं भोजन करें।
एवं लब्धमनुर्विप्रः कृतार्थः स्यान्न संशयः।।147।।
तदादि संध्यां कुर्वीत नियतो गुर्वनुज्ञया।
सायं प्रातश्च मध्याह्ने रामं ध्यात्वा मनुं जपेत्।।148।।

  1. घ. बहुभिः स्वयम्। 2. घ. तेभ्योऽपि। 3. घ. परिपूरयेत्।

(120) अगस्त्य-संहिता
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इस प्रकार मन्त्र प्राप्त कर वह विप्र होकर धन्य हो जाता है, इसमें सन्देह
नहीं। इसके बाद वह गुरु की आज्ञा से सायं, प्रातः और मध्याह्न में सन्ध्या कर
श्रीराम का ध्यान कर मन्त्र का जप करें।
जलमस्त्रेण संशोध्य कवचेनावगुण्ठ्य च।
चक्रीकृत्य जलं सम्यक् दर्भमूलेन मन्त्रवित्।।49।।
आवाहनादिमुद्राभिस्तीर्थमावाह्य पूजयेत्।
ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रखे।।50।।
तेन सत्येन मे देव तीर्थं देहि दिवाकर।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।।51।।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।
जल को अस्त्र-मन्त्र से शोधित कर कवच मन्त्र से उसे ढँककर चक्रीकरण
कर कुश की जड़ से आवाहन आदि की मुद्राओं से तीर्थ का आवाहन कर साधक
तीर्थों की पूजा इस मन्त्र से करें-
हे देव सूर्य! "सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के गर्भ में जो तीर्थ हैं, जिन्हें सूर्य के किरण
स्पर्श करते हैं, इस शपथ के कारण वे तीर्थ मुझे दें। हे गंगा, यमुना, गोदावरी,
सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी इस जल में आप सब निवास करें।"
एवमावाह्य चाराध्य विधिवत् तज्जलं मुने।।52।।
आदायाञ्जलिना सम्यक् जपेन्मालामनुं सकृत्।
जलं दक्षिणहस्तस्थं सव्यहस्ते विनिक्षिपेत्।।53।।
तन्निःसृताम्बुना मूर्ध्नि सिञ्चेन्मालामनुं स्मरन्।
दशाक्षरेण तच्छेषमभिमन्त्र्य जलं क्षिपेत्।।54।।
इस प्रकार तीर्थों का आवाहन कर उनकी आराधना विधिपूर्वक करके उस
जल को अंजलि में लेकर माला-मन्त्र का एक बार जप करें। तब दाहिने हाथ के
जल को बाये हाथ में लें तब माला-मन्त्र का जप करते हुए बायें हाथ से गिरते हुए
जल को मस्तक पर छिड़के। अन्त में दशाक्षर मन्त्र से शेष जल को चारो ओर
छिड़क दें।
पुनरञ्जलिमादाय जलं मूर्ध्नि तु तत् क्षिपेत्।¹
ततो रामोऽहमस्मीति गायत्रीं नियतो जपेत्।।55।।
फिर अंजलि से जल लेकर उसे अपने मस्तक पर छिड़कें। तब 'मैं राम हूँ'
यह भावना कर नियमपूर्वक राम-गायत्री का जप करें।

  1. घ. जलमूर्ध्वं त्रिरुत्क्षिपेत्। इसके बाद क. में 'मण्डलस्थाय रामाय पाद्यार्घ्यं
    कल्पयाम्यहम्' यह अधिक है, जो अप्रासंगिक है।

अष्टादशोऽध्यायः (121)

जन्मप्रभृति यत्पापं दशभिर्याति सञ्चितम्।
पुराकृतं शतेनैव सहस्रेण जपेन वा।।56।।
पूर्वकाल में जन्मकाल से लेकर दश इन्द्रियों द्वारा जो पहले किये गये पाप
संचित हैं, वे सौ बार या हजार बार जप से नष्ट हो जाते हैं।
पदं² दशरथायेति विद्महेति पदं ततः।
सीतापंद समुद्धृत्य वल्लभाय ततो वदेत्।।57।।
धीमहीत्यपि तन्नोऽथ रामश्चापि प्रचोदयात्।
एषा स्याद् रामगायत्री भक्तानां भुक्तिमुक्तिदा।।58।।
सबसे पहले 'दशरथाय' यह पद बोलें। तब 'विद्महे' बोले तब 'सीता' पद
कहकर तब 'वल्लभाय' कहें। 'धीमहि' ऐसा कहकर 'तन्नो' 'रामः' और 'प्रचोदयात्'
कहें। यह रामगायत्री है, जो भक्तों को भोग और मोक्ष प्रदान करती है।
पुरश्चरणमस्याश्च चतुर्लक्षजपावधि।
यच्च यावच्च पूजादि सर्वं पूर्ववदाचरेत्।।59।।
इसका भी पुरश्चरण चार लाख जप का होता है। जो पूजा होगी, वह
पूर्वोक्त विधि से करें।
ओमादिरेषा गायत्री मुक्तिमेव प्रयच्छति।
मायादिरपि वैदुष्यं रमादिश्च श्रियं मुने।।60।।
मदनेनापि संयुक्ता सम्मोहयति मेदिनीम्।।
अनयाराधितो रामः सर्वाभीष्टं प्रयच्छति।।61।।
इसके आदि में ॐ लगाकर जप करने से मुक्ति ही मिलती है। माया बीज
(ह्रीं) आदि में लगाने से वैदुष्य तथा लक्ष्मी बीज (श्रीं) से धन प्राप्ति होती है।
कामबीज (क्लीं) लगाकर जप करने से वह पूरी पृथ्वी को सम्मोहित कर लेता है।
इस प्रकार पूजित श्रीराम सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं।
तर्पयेच्च ततो मूलमन्त्रोच्चारणपूर्वकम्।
²रामं तर्पयामि नमः पीठदेवादिपूर्वकम्।।62।।
चत्वारिंशद्धरीनादौ सीतादींश्चतुरः क्रमात्।
इसके बाद मूलमन्त्र का उच्चारण करते हुए 'रामं तर्पयामि नम' ऐसा
कहते हुए पीठस्थ अन्य देवों का भी इसी प्रकार तर्पण करें। पहले चालीस
देवताओं का तर्पण (हनूमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न,

  1. घ. वदेद्। 2. घ. यहाँ दो श्लोक अनुपलब्ध हैं।
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(122) अगस्त्य-संहिता

जाम्बवान्, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्द्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त।
नल, नील, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, सुरभि, मैन्द और द्विविद। वसिष्ठ, वामदेव,
जाबालि, गौतम, भरद्वाज, कौशिक, वाल्मीकि और नारद। दशरथ, कौशल्या,
कैकेयी, सुमित्रा। राम लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न।) कर सीता आदि चार (सीता,
माण्डवी, उर्मिला एवं श्रुतिकीर्ति) देवों का क्रमिक तर्पण करें।
हृदादींस्तर्पयेत्पश्चान्मध्ये मध्ये रघूद्वहम्।
नाममन्त्रैर्भविदेवं चत्वारिंशच्छतद्वयम् ॥६३॥
कृत्वैवं प्रत्यहं सम्यक् त्रिसन्ध्यन्तु यथाविधि।
स्तुवंश्च प्रणमेद् रामं यथाशक्ति मुनीश्वर।
कृतकृत्यो भवेन्मन्त्री सत्यं सत्यं न चान्यथा॥६४॥
हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! हृत् आदि को तर्पण बाद में करें; बीच-बीच में
श्रीराम को तर्पण करें। इस प्रकार नाम मन्त्रों से यह तर्पण दो सौ चालीस बार
होगा। इस प्रकार सम्यक् रीति से प्रतिदिन तीनों सन्ध्याओं में विधानपूर्वक कृत्य
सम्पन्न कर तथा श्रीराम की स्तुति करते हुए, उन्हें यथाशक्ति प्रणाम करें। इस
प्रकार साधक कृतकृत्य हो जाता है, यह सत्य है, सत्य है इसमें सन्देह नहीं।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये पूजाविधानं नाम
सप्तदशोऽध्यायः।
अथ अष्टादशोऽध्यायः
अगस्त्य उवाच
अथ पूजाविधानानां लक्षणान्यभिदध्महे।
अम्बुचन्दनपुष्पाणि धूपदीपनिवेदनम्¹ ॥१॥
हरेरेतानि² मुख्यानि साधनानि मुनीश्वर।
स्थलमप्यर्घ्यपात्राणि शङ्खं चैषाञ्च लक्षणम् ॥२॥
अगस्त्य बोले- हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण, अब मैं पूजा-सामग्रियों के स्वरूप
बतलाता हूँ। जल, चन्दन, फूल, धूप एवं दीप का समर्पण पूजा के मुख्य साधन हैं
तथा पूजा-स्थल, अर्ध्यादिपात्र तथा शंख ये जो साधन हैं, उनका लक्षण मैं कहता हूँ।

  1. घ. धूपदीपौ निवेदयेत्। 2. क. हविरेतानि।

अष्टादशोऽध्यायः (123)
अन्यानिवेदितं शुद्धं प्रकृतिस्थं सुशीतलम्।
हेमादिकलशान्तस्थं पूजासाधनमिष्यते।।3।।
जो जल दूसरे देवता को न चढाया गया हो तथा कलश में रखा गया हो
ऐसा शुद्ध अपने स्वभाव के अनुरूप हो तथा शीतल हो वैसा जल पूजा की सामग्री है।
अनन्यार्पितपूर्वाणि गन्धवन्ति सितानि च।
पीतान्यपि मनोज्ञानि छिद्रेण रहितानि च।।4।।
पुष्पाण्येवात्र शस्यन्ते न चेत् सर्वं निरर्थकम्।
जो पुष्प पूर्व में दूसरे देवता को न चढ़ा हो, पवित्र, सुगन्धित, श्वेत अथवा
पीत, सुन्दर, छिद्र से रहित हो वे ही फूल इस पूजन में प्रशस्त हैं, नहीं तो सारा
व्यर्थ है।
चन्दनं मलयोत्पन्नमनाघ्रातं सुशीतलम्।।5।।
मलय पर्वत से उत्पन्न श्रीखण्ड चन्दन, जो सूँघा गया न हो और शीतल
हो, प्रशस्त है।
कर्पूरागरुकस्तूरीहिमान्यादिसुवासितम्¹ ।
पूजायां शस्यते धूपस्ताम्रकांस्यादिनिर्मिते।।6।।
पात्रे वा द्विद्ले भुग्ननाले पद्माकृतौ मुने।
सारांगारविनिक्षिप्ते गुग्गुल्वगुरुवृक्षजे।।7।।
निर्यासादुत्थितैर्धूपैर्गन्धद्रव्यैस्तथोद्गतैः ।
अनन्यार्पितगन्धोऽयं शस्यतेऽर्चनकर्मणि।।8।।
कर्पूर, अगरु, कस्तूरी, हिमानी आदि से सुगन्धित किया हुआ धूप पूजा में
प्रशस्त है। ताँबा, कांसा आदि से निर्मित कमल की आकृति वाला, जिसमें दो
नाल लगे हों और दो पत्र भी हों, इस प्रकार के पात्र में सारिल लकड़ी का अंगार
डाला गया हो, गुग्गुल या अगुरु के वृक्ष से उत्पन्न निर्यास से उठते हुए धूपों या
सुगन्धित द्रव्यों से भी बना जो धूप दूसरे देवता को अर्पित नहीं किया गया हो, वह
अर्चना के कर्म में प्रशस्त है।
दीपोऽपि पूर्ववत्पात्रे मण्डलाकारनिर्मितः²।
प्रतिपात्रं प्रदीप्तश्च वर्त्या गव्यघृतादिना।।9।।

  1. घ. हिमाभादिसुभाषितम्। 2. घ. मण्डलाकारकारितैः।

(124) अगस्त्य-संहिता

अन्यावेदितः पूजाकर्मण्येव प्रशस्यते।
दीप भी पूर्वोक्त स्वरूप के पात्र में गोलाकार में निर्मित और प्रत्येक दीप
गाय के घी से जलते हुए दीप पूजा कर्म में प्रशस्त होते हैं, यदि वह दूसरे देवता को
समर्पित न किया गया हो।
पायसापूपसंपक्वफलोपेतं हविर्मुने¹।।10।।
शुद्धं च षड्रसोपेतं अनन्यार्पितमिष्यते।
नैवेद्यमर्चनायान्तु सताम्बूलं निवेदयेत्।।11।।
खीर, पुआ, पकवान, फल जो शुद्ध हो और छह रसों से परिपूर्ण हो और
दूसरे देवता को अर्पित न किया गया हो, वह नैवेद्य पान के साथ पूजा में अर्पित
करना चाहिए।
स्थलं प्रासादविपिननदीतीरगतं³ समम्।
चतुरस्रं चतुर्हस्तं हस्तोन्नतसुवेदिकम्।।12।।
चन्द्रातपपताकादितोरणैः प्रोल्लसच्छविः।
विविक्तं च विशेषेण शस्यतेऽर्चनकर्मणि।।13।।
पूजा-स्थल के रूप में मकान, जंगल, नदी का तट जो समतल, चौकोर,
चार हाथ लम्बाई-चौड़ाई वाला, एक हाथ ऊँची वेदी से युक्त, चँदोवा, पताका,
बंदनवार आदि से शोभित एकान्त स्थल पूजा-कर्म में प्रशस्त है।
³पात्राणि ताम्रहेमादिनिर्मितानि जलान्तरे।
जलजानीव निर्मल्य पाद्याद्यर्हणादिषु।।14।।
उपचाराणि शुद्धानि शस्यतेऽत्र विशेषतः।
पाद्य, अर्घ्य आदि कार्यों के लिए ताँबा, सोना आदि का पात्र जो जल में कमल
के समान स्वच्छ हो प्रशस्त होते हैं। पूजन-कर्म में सभी शुद्ध साधन प्रशस्त होते हैं।
शङ्खो नाम सदावर्तः पृष्ठमध्यसुनालकः।।15।।
सितैश्च पूरितो नीरैः शस्यतेऽर्चनकर्मणि।
सदावर्त नाम का शंख जिसकी पीठ और मध्य भाग में नाल का चिह्न हो
वह शुभ्र जल से पूर्ण पूजा-कर्म में प्रशस्त है।
एतान्यन्यानि पूजायां साधनानि बहूनि च।।16।।

  1. घ. पायसं पूपमन्नं च सघृतं सह शर्करम्। 2. घ. नदीतटगतं। 3. घ. यहाँ से
    छह चरण अनुपलब्ध हैं।
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अष्टादशोऽध्यायः (125)
तान्युत्तमानि मध्यानि न्यूनानि विधिमन्ति वै।
स्वस्थः समर्थः कुर्वीत चोत्तमैरेव साधनैः।।17।।
मध्यमो मध्यमेनैव न्यूनो न्यूनैस्तपोधन।
आपन्नश्चेत् समर्थोऽपि न्यूनैरेव समाचरेत्।।18।।
पूजाकर्मविशेषेण देशकालानुसारतः।
यथाशक्ति यथान्यायं यथा लोकाविगर्हितम्।।19।।
ऊपर कहे गये अथवा अन्य भी बहुत प्रकार के साधन पूजा में होते हैं, वे
उत्तम, मध्यम और न्यून प्रकार के होते हैं। जो साधक स्वस्थ हो, समर्थ हो वे
उत्तम साधन से पूजा करें। मध्यम कोटि के साधक मध्यम प्रकार के साधन से
पूजा करें तथा न्यून साधक न्यून साधनों से करें। समर्थ भी यदि किसी विपत्ति में
हो तो न्यून साधनों से ही पूजा करें। पूजा-कर्म के वैशिष्ट्य से देश एवं काल के
अनुसार शक्ति तथा औचित्य के अनुसार ऐसे साधनों का व्यवहार करें, जिसे
लोक में निन्दित नहीं माना जाता हो।
एकेन वान्यत्संकल्पः कुर्यादिवार्चनं तथा।¹
मुद्राश्च² दर्शयेद्यत्नाद् देवसान्निध्यकारिणः।।20।।
दर्शितास्तास्तु देवानां मोदकाः द्रावकाः³ मुने।
दर्शनीयाः सुतीक्ष्णातो देवतायागकर्मणि।।21।।
अथवा एक ही व्यक्ति दोनों कार्य अर्थात् संकल्प और पूजा करें। देवता के
साथ नजदीकी साधनेवाली मुद्राएँ यत्नपूर्वक दिखाएँ। दिखाई गयी मुद्राएँ देवताओ
को प्रसन्न तथा द्रवित करतीं हैं। हे सुतीक्ष्ण! अतः देवताओं के याग कर्म में मुद्राएँ
दिखानी चाहिए।
आवाहनी स्थापनी च सन्निधीकरणी तथा।
सुसंनिरोधनी मुद्रा संमुखीकरणी तथा।।22।।
सकलीकरणी चैव महामुद्रा तथैव च।
शङ्खचक्रगदापद्मधेनुकौस्तुभगारुडीम्⁴ ।।23।।
श्रीवत्सवनमाले च योनिमुद्रां⁵ च दर्शयेत्।
मूलाधाराद् द्वादशान्तामानीतां कुसुमाञ्जलिः।।24।।

  1. घ. कुर्याद् देवार्चनं हरेः। 2. घ. सुमुद्राः। 3. घ. मोदकास्तारकाः। 4. घ.
    ºगारुडाः। 5. श्रीवत्सवनमालाख्ययोनिमुद्राश्च।

(126) अगस्त्य-संहिता

आवाहनी, स्थापनी, सन्निधीकरणी संरोधिनी, संमुखीकरणी, सकलीकरणी,
महामुद्रा, शंखमुद्रा, चक्रमुद्रा, गदामुद्रा, पद्ममुद्रा, धेनुमुद्रा, कौस्तुभमुद्रा, गरुड़मुद्रा,
श्रीवत्समुद्रा, वनमालमुद्रा तथा योनिमुद्रा दिखानी चाहिए। मूलाधार से द्वादशार
तक लायी गयी कुसुमाञ्जलि मुद्रा भी दिखानी चाहिए।
त्रिस्थानगततेजोभिर्विनीता प्रतिमादिषु।
आवाहनीयं मुद्रा स्याद् देवार्चनविधौ मुने।।२५।।
एषैवाधोमुखी मुद्रा स्थापने शस्यते पुनः।
तीनों स्थानों भूः भुवः एवं स्वः में उद्भूत तेज से प्रतिमा में तेज लाने वाली
मुद्रा देवार्चन के विधान में आवाहनी कहलाती है। यही अधोमुखी मुद्रा स्थापना
में प्रशस्त है।
आवाहनी स्थापनी संनिधीकरणी संनिरोधनी
उन्नताङ्गुष्ठयोगेन मुष्टीकृतकरद्वयी।।२६।।
सन्निधीकरणी नाम मुद्रा देवार्चने विधौ।
दोनों हाथों के अंगूठे को ऊपर की ओर खड़ा कर मुट्ठी बाँधकर संनिधिकरणी
मुद्रा बनती है, जो देव-पूजन में प्रशस्त है।
अङ्गुष्ठगर्भिणी सैव मुद्रा स्यात् संनिरोधनी।।२७।।
इसी संनिधीकरणी मुद्रा में यदि अंगूठे मुट्ठी के अंदर दबे हों तो संनिरोधनी
मुद्रा कहलाती है।
उत्तानमुष्टियुगला¹ सम्मुखीकरणी तथा।
अङ्गैरेवाङ्गविन्यासः सकलीकरणी भवेत्²।।२८।।
दोनों मुट्ठी को ऊपर की ओर उठाकर सम्मुखीकरणी मुद्रा बनती है तथा
शरीर के सभी अंगों से अंगों का न्यास करना सकलीकरणी मुद्रा कहलाती है।

  1. घ. उत्तानमुष्टियोगेन। 2. घ. तथा।

अष्टादशोऽध्यायः (127)
सम्मुखीकरणी सकलीकरणी समापनी
अन्योन्याङ्गुष्ठसंलग्ना विस्तारितकरद्वयी।
महामुद्रेयमाख्याता न्यूनाधिकसमापनी ॥129॥
दोनों हाथों के अंगूठे को आपस में सटाने और दोनों हाथों को फैलाने से
जो महामुद्रा बनती है, वह न्यूनाधिक दोष को समाप्त करनेवाली समापनी मुद्रा
कहलाती है।
कनिष्ठानामिकामध्यान्तस्थाङ्गुष्ठेतरागतः ।
गोपिताङ्गुष्ठमूलेन सन्नतान्मुकुलीकृता ॥130॥
करद्वयेन मुद्रा स्याच्छङ्खाख्येयं सुरार्चने।
(दाहिने हाथ की) कनिष्ठा अनामिका मध्यमा के बीच में बायें हाथ का
अंगूठा रखकर उसे दाहिने हाथ के अंगूठे की जड़ से ढँकें और अन्य अंगुलियों को
चारों ओर से फूल की कली तरह बनावें। दोनों हाथों से बनी यह शंखमुद्रा
देवार्चन के लिए कहलाती है।
शंखमुद्रा चक्रमुद्रा गदामुद्रा
अन्योन्याभिमुखस्पृष्टव्यत्ययेन¹ तु वेष्टयेत् ॥131॥
अङ्गुलीभिः प्रयत्नेन मण्डलीकरणं मुने।
चक्रमुद्रेयमाख्याता

  1. घ. अन्योन्याभिमुखं स्पर्शव्यत्ययेन।

(128) अगस्त्य-संहिता

हे मुने! दोनों हाथों की अंगुलियों को एक दूसरे के विपरीत कर चारों ओर
से प्रयत्नपूर्वक अंगुलियों से घेर लें। यह चक्रमुद्रा कहलाती है।
गदामुद्रा ततः परम् ।।32।।
अन्योन्याभिमुखाश्लिष्टाङ्गुलिः प्रोन्नतमध्यमा ।
इसके वाद गदा मुद्रा कही जाती है। दसो अंगुलियों को एक दूसरे के
सम्मुख गूंथ कर मध्यमा को ऊपर उठावें।
अथाङ्गुष्ठद्वयं मध्ये दत्वापि परितः करौ ।।33।।
मण्डलीकरणी सम्यगङ्गुलीनां तपोधन ।
पद्ममुद्रा भवेदेषा
हे तपोधन सुतीक्ष्ण! बीच में दोनों हाथों के अंगूठे को सटाकर इसके चारों
ओर दोनों हाथों की शेष आठ अंगुलियों से मण्डल बनावें। यह पद्ममुद्रा कहलाती है।
पद्ममुद्रा धेनुमुद्रा
धेनुमुद्रा ततः परा ।।34।।
अनामिकाकनिष्ठाभ्यां तर्जनीभ्यां च मध्यमे।
अन्योन्याभिमुखाश्लिष्टे
दोनों हाथों की अंगुलियों को एक दूसरे से गूँथकर अनामिका से कनिष्ठिका,
कनिष्ठिका से अनामिका तथा तर्जनी से मध्यमा और मध्यमा से तर्जनी को सटा
देने पर धेनुमुद्रा या सुरभि मुद्रा बनती है।
ततः कौस्तुभसंज्ञिका ।।35।।
कनिष्ठेन्योन्यसंलग्नेऽभिमुखे च परस्परम्।
वामस्य तर्जनीमध्ये मध्यानामिकयोरपि ।
वामानामिकसंस्पृष्टे तर्जनीमध्यशोभिता।
पययिण नताङ्गुष्ठाद्वयी कौस्तुभलक्षणा ।।37।।

अष्टादशोऽध्यायः (129)
इसके बाद कौस्तुभ मुद्रा कही गयी है। दोनों कनिष्ठा को आमने-सामने
एक दूसरे से सटाकर वाम हाथ के तर्जनी, मध्यमा और अनामिका के बीच बायीं
अनामिका को छूती हुई तर्जनियों के बीच रखकर बारी-बारी से दोनों अंगूठा को
नीचे झुकाकर कौस्तुभ मुद्रा बनती है।
कनिष्ठान्योन्यसंलग्ना विपरीतं नियोजिता।
अधस्तात् प्रापिताङ्गुष्ठा मुद्रा गरुडसंज्ञका।।३८।।
कनिष्ठा अंगुलियों को एक दूसरे के विपरीत संलग्न कर उन्हें अंगूठे के
नीचे रखने से गरुड़मुद्रा बनती है।
वनमाला मुद्रा योनिमुद्रा
तर्जन्यङ्गुष्ठमध्यस्था मध्यमानामिकाद्वयी।
कनिष्ठानामिकामध्ये तर्जन्यग्रकरद्वयी।।३९।।
मुने श्रीवत्समुद्रेयं
तर्जनी, अंगूठा, मध्यमा और अनामिका को सटाकर तर्जनी को कनिष्ठा
और अनामिका के बीच रखने से श्रीवत्समुद्रा बनती है।
वनमाला भवेत् ततः।
कनिष्ठानामिकामध्या मुष्टिरुन्नीततर्जनी।।४०।।
परिभ्रान्ता शिरस्युच्चैस्तर्जनीभ्यां दिवौकसः।
इसके बाद वनमाला होती है। कनिष्ठा, अनामिका के बीच तर्जनी रखकर
दोनों हाथों से मुट्ठी बाँधकर दोनों तर्जनी से देवता के हृदय का स्पर्श कर पश्चात्
देवता के मस्तक पर तर्जनी को उठाकर घुमावें।
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(130) अगस्त्य-संहिता
मुद्रा योनिसमाख्याता स्यात् करद्वयदर्शिता ।।41।।
तर्जन्याकृष्टमध्यान्ता स्थितानामिकयुग्मका।
मध्यमूलस्थिताङ्गुष्ठा ज्ञेया शस्तार्चने मुने।।42।।
योनि नामक मुद्रा दोनों हाथों से दिखायी जाती है। दोनों मध्यमाओं के
नीचे से बायीं तर्जनी के ऊपर दाहिनी अनामिका और दाहिनी तर्जनी के ऊपर
बायीं अनामिका रखकर दोनों तर्जनियों से बाँधकर दोनों मध्यमाओं को ऊपर
रखने से यह मुद्रा बनती है, जो देवताओं की अर्चना में प्रशस्त है।
एताभिर्दशमुद्राभिः पूर्वोक्ताभिश्च सप्तभिः।
यो रामर्चयेन्नित्यं मोदयेत् स सुरेश्वरम् ।।43।।
द्रावयेदपि¹ विप्रेन्द्र ततः प्रार्थितमाप्नुयात्।
पूर्व में कही गयी सात तथा यहाँ कही गयी दश मुद्राओं से जो नित्य
श्रीराम की अर्चना करते हैं, वे देवों के ईश्वर विष्णु को प्रसन्न करते हैं, उन्हें द्रवित
भी करते हैं और प्रार्थना की गयी वस्तु प्राप्त करते हैं।
लक्षण्यान्यासनानां हि वक्ष्यामि मुनिसत्तम ।।44।।
तानि स्वस्तिकभद्राब्जवीरादीनि भवन्ति वै।
हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं आसनों का लक्षण कहता हूँ। आसन स्वस्तिक,
भद्रासन, पद्मासन, वीरासन आदि अनेक प्रकार के होते हैं।
कृत्वोत्तानौ क्षितौ पादौ तत्रैवोरुद्वयं समम् ।।45।।
निधाय निश्चलं ह्येतत् स्वस्तिकं कीर्त्यते मुने।
दोनों पैरों को पृथ्वी पर अपने सामने फैलाकर दोनों जंघाओं को समान
कर अविचल होकर बैठें। यह स्वस्तिक मुद्रा कहलाती है।
( प्रयोग में बायें पैर को दायीं जंघा की मांसपेशियों के बीच तथा दायें पैर
को बांयी जंघा के बीच फंसाकर स्थिर होकर बैठने से यह आसन बनता है।
पादद्वयं समं जानुद्वयोरपि तु कारितम् ।।46।।
भद्रासनमिदं श्रेष्ठं जपेत् तत्तत् फलप्रदम्।
दोनों पैरों को समान रूप से दोनों घुटना के ऊपर करने से वज्रासन
कहलाता है। इस श्रेष्ठ आसन में जो जप किये जाते हैं वे फलदायी होते हैं।

  1. आचार्य रामकिशोर कृत 'मुद्राप्रकाश' नामक ग्रन्थ में 'मोदयन्ति द्रावयन्ति देवान्
    इति मुद्राः' यह परिभाषा दी गयी है।

अष्टादशोऽध्यायः (131)
पादद्वयं समं ⁃ सम्यगूरुमूलद्वयोपरि ।।47।।
कृतं पद्मासनं ह्येतच्छ्रेष्ठं सर्वेषु कर्मसु।
दोनों पैरों को भली भाँति जंघा की जड़ के ऊपर रखकर किया गया
पद्मासन सभी कर्मों में श्रेष्ठ है।
वामपादे निधायाङ्कं मूलं पादं च दक्षिणम्।
वामाङ्गाग्रे दृतिर्ह्येतद्¹ वीरासनमुदीरितम् ।।48।।
बाँये पैर को जमीन पर टिकाकर घुटना पर बाँयी केहुनी को टिका लें।
तथा बायें पैर को मोड़कर भूमि पर रखें। इस स्थिति में वाँयीं ओर दृष्टि केन्द्रित
करने पर वह वीरासन कहलाता है।
योगासनं चमूष्काधः पाणिं दत्वा पदान्तरम्।
जङ्घाद्वयोर्निधायैतद्योगेभीष्टं प्रयच्छति ।।49।।
(यहाँ भी पाठ सन्देहास्पद है। अन्यत्र विवरण के अनुसार पद्मासन में
बैठकर दोनों ऐँड़ियों को पेट से दबाकर दोनों जंघाओं को एक समान रखकर
आगे की ओर कपाल को भूमि से सटाने पर योगासन होता है।)
वामाङ्कपाश्र्वे पाणिञ्च दक्षिणं चेतरं पुनः।
पाष्ण्र्यन्तरं विधायैवं कुर्याज्जानुद्वयं समम् ।।50।।
गोमूत्रासनमेतत् स्यात् सर्वाघौघविनाशनम्।
बायीं काँख के को बायीं ऐंड़ी पर तथा दायें काँख को दायीं एड़ी पर
टिकाकर दोनों जंघाओं को समानान्तर कर लें। यह गोमूत्रासन कहलाता है,
जिससे सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं।
आसनानि बहूनि स्युरेवमेव जपादिषु ।।51।।
येन केनासनेनैव वीरः स्थित्वा जपादिकम्।¹
इस प्रकार जप आदि में अनेक आसन है। किसी भी एक आसन में वीर
की तरह निर्वाह करते हुए जप आदि करें।
कुर्वीत भक्तियुक्तस्तु भावयेत् पुरुषोत्तमम्।।
एवं यः कुरुते पूजाजपहोमादिकं मुने ।।52।।
सर्वेषामिह पूज्योऽयमिह लोके परत्र च।

  1. क. में अनुपलब्ध।

(132) अगस्त्य-संहिता
भक्तिभाव के साथ उपर्युक्त कर्म करें और पुरुषोत्तम की भावना करें। जो
इस प्रकार पूजा, जप, होम आदि करते हैं, वे इस संसार में और परलोक में सबके
द्वारा पूजित होते हैं।
पूजा जपश्च होमश्च मन्त्राणामुद्धृतिस्तथा।।53।।
दीक्षाभिषेकमार्गस्तु दर्शितोऽत्र तपोनिधे।
पूजोपकरणादीनां लक्षणान्यपि सुव्रत।।54।।
दर्शितानि प्रयत्नेन सर्वं भक्त्यावधारय।
सुतीक्ष्णाभिहितं यत्नाद् यदेतद्¹ भुक्तिमुक्तिदम् ।।55।।
नावैष्णवेभ्यो वक्तव्यं न श्राव्यमिति मे मतिः।
यत्नेन विष्णुभक्ताय चार्हते² देयमित्यपि।।56।।
पूजा, जप, होम, मन्त्रों की आहुति तथा दीक्षा और अभिषेक का मार्ग मैंने
मूल रूप से बतला दिया। पूजा में प्रयुक्त होनेवाले उपकरणों के लक्षण भी
प्रयत्नपूर्वक मैंने बलता दिया, उन सबको भक्तिभाव से समझो। हे सुतीक्ष्ण! मैंने
जो पूजा की विधि तुम्हें बतलायी, उसे किसी वैष्णव से भिन्न व्यक्ति के सामने मत
बोलना, न उन्हें सुनाना, यह मेरा मत है। विष्णु के भक्त जो इस विधि को ग्रहण
करने में समर्थ हों, उन्हें यत्नपूर्वक देना चाहिए, यह भी मेरा मत है।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये आसनमुद्राप्रदर्शनं
नामाष्टादशोऽध्यायः।
अथ एकोनविंशोऽध्यायः
अगस्तिरुवाच
सुतीक्ष्ण मन्त्रवर्येषु श्रेष्ठो वैष्णव उच्यते।
गाणपत्येषु शैवेषु शाक्तसौरेष्वभीष्टदः।।1।।
वैष्णवेष्वपि सर्वेषु राममन्त्रः फलाधिकः।
गाणपत्यादिमन्त्रेषु कोटिकोटिगुणाधिकः।।2।।
अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण! गाणपत्य, शैव, शाक्त, सौर मन्त्रों में भी
वैष्णव मन्त्र श्रेष्ठ है तथा मनोरथ सिद्ध करनेवाला है। वैष्णव-मन्त्रों में भी
राममन्त्र गाणपत्य आदि मन्त्रों में करोड़ों गुना अधिक फल देनेवाला है।

  1. घ. यद्वद्वैष्णवं। 2. क. चार्थिने। 3. घ. ⁰कामदोऽयं।

एकोनविंशोऽध्यायः (133)
मन्त्रेषु तेष्वप्यनायासफलदोऽयं³ षडक्षरः।
षडक्षरोऽयं मन्त्रस्तु सर्वाघौघनिवारणः।।३।।
राममन्त्र भी अनेक हैं; किन्तु उनमें भी अनायास फल देनेवाला यह छह
अक्षरों का मन्त्र है। यह छह अक्षरों का मन्त्र सभी पापों का नाश करनेवाला है।
मन्त्रराज इति प्रोक्तः सर्वेषामुत्तमोत्तमः।
दैनन्दिनं च दुरितं पक्षमासर्तुवर्षजम्।।४।।
इसे मन्त्रराज कहा गया है जो सभी मन्त्रों में उत्तम है। पक्ष, मास, ऋतु
और वर्ष में किये गये पापों को नाश करने के साथ प्रतिदिन किये गये पाप को भी
नाश करता है।
सर्वं दहति निःशेषं ऊर्णाजालमिवानलः।¹
ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञानाज्ञानकृतानि च।।५।।
जैसे आग ऊन से बने जाल को निःशेष कर जला देता है, उसी प्रकार यह
मन्त्र हजारो ब्रह्महत्या और ज्ञानवश या अज्ञानवश जो पाप किये गये हैं उन्हें जला
देता है।
स्वर्णस्तेयसुरापानं गुरुतल्पायुतानि च।।६।।
कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपातकान्यपि।
सर्वाण्यपि शमं यान्ति² राममन्त्रानुकीर्तनात्।।७।।
सोने की चोरी, मद्यपान, गुरु की शय्या पर शयन आदि जो करोड़ों
करोड़ों महापाप हैं और अनेक उपपातक भी हैं, वे सब श्रीराम के मन्त्र के जप से
शान्त हो जाते हैं।
भूतप्रेतपिशाचाद्याः कूष्माण्डाः ग्रहराक्षसाः।
दूरादेव पलायन्ते³ राममन्त्रप्रभावतः⁴।।८।।
भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ग्रह, राक्षस श्रीराम के मन्त्र के प्रभाव से दूर
भाग जाते हैं।
मालिन्यमपि सांकार्यं यच्च यावच्च दूषितम्।
सर्वं विलयमाप्नोति राममन्त्रे तु कीर्तिते।।९।।

  1. घ. तूर्णाचलमिवानलः। 2. घ. विनश्यन्ति। 3. क. प्रधावन्ति। 4. राममन्त्रप्रसादतः।
    ५ शामिताः।

(134) अगस्त्य-संहिता
मलिनता, संकरता और जो जितने दोष हैं, सब श्रीराम का मन्त्र जपने से
विलुप्त हो जाते हैं।
आब्रह्मबीजदोषाश्च नियमातिक्रमोद्भवाः।
स्त्रीणाञ्च पुरुषाणां स्युर्मन्त्रेणानेन नाशिताः⁵।।१०।।
ब्रह्म से लेकर उत्पत्ति के बीज पर्यन्त जो दोष होते हैं या नियम का त्याग
करने से स्त्रियों और पुरुषों में जो दोष उत्पन्न होते हैं, वे सब इस मन्त्र से नष्ट हो
जाते हैं।
येषु येष्वेष्वपि देशेषु रामः परमुपास्यते।।११।।
दुर्भिक्षादिभयान्येषु न भवन्ति कदाचन।
जिन जिन देशों में श्रीराम परम देवता के रूप में पूजित होते हैं, वहाँ
दुर्भिक्ष आदि का भय कभी नहीं रहता।
शान्तः प्रसन्नो वरदोऽक्रोधनो भक्तवत्सलः।।१२।।
अनेन सदृशो मन्त्रो जगत्स्वपि न विद्यते।¹
संसार में इस मन्त्र के समान शान्त, प्रसन्न, वर देनेवाला, सौम्य तथा
भक्तों के प्रति संतान का भाव रखनेवाला मन्त्र नहीं है।
अनेनाराधितो रामः प्रसीदत्येव सत्वरम्।।१३।।
प्रददात्यायुरैश्वर्यं² सम्मानोत्तमतामपि।
इस मन्त्र से पूजित श्रीराम शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं और आयु, ऐश्वर्य,
सम्मान तथा श्रेष्ठता प्रदान करते हैं।
य एवमुक्तमार्गेण मन्त्राराधनतत्परः।।१४।।
सकामो भुक्तिमाप्नोति निष्कामो मुक्तिमेति च।
प्राप्नोत्युभयकामस्तु भुक्तिं मुक्तिं न संशयः।।१५।।
जो इस प्रकार पूर्वोक्त पद्धति से मन्त्र के आराधन में तत्पर होते हैं, वे
सकाम होने पर भोग प्राप्त करते हैं और निष्काम होने पर मुक्त हो जाते हैं और
दोनों चाहनेवाले भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं इसमें सन्देह नहीं।
सुतीक्ष्ण उवाच
श्रुतिस्मृतिपुराणार्थनिश्चय ज्ञानवित्तम।
सन्देहं छिन्धि पृच्छामि तातात्रानुग्रहं कुरु।।१६।।

  1. घ. में अनुपलब्ध। 2. घ. ददात्यायुष्यमैश्वर्यं।

(135)
— — — — — — — — — — एकोनविंशोऽध्यायः — — — — — — — — — —
सुतीक्ष्ण बोले— हे ज्ञानियों में श्रेष्ठ महामुनि अगस्त्य! आपने वेद और
पुराणों के प्रयोजन के विषय में सब कुछ जानकर उसका निश्चय कर लिया है। हे
तात! मेरे मन में एक सन्देह है। मैं पूछ रहा हूँ। इस सन्देह का निवारण करें। इस
विषय में आप कृपा करें।
आत्मानुभवरूपेण साक्षात्कारेण केवलम्।
पुनरावृत्तिरहितं शाश्वतं ब्रह्म यात्यपि।।17।।
इति श्रुत्यादितत्त्वज्ञाः प्रवदन्ति मनीषिणः।
वेद आदि का तत्त्व जाननेवाले मनीषीगण कहते हैं कि आत्मा का जब
अनुभव होता है, तब ब्रह्म के साथ साक्षात्कार कहलाता है, उससे इस संसार में
पुनर्जन्म से रहित नित्य ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
श्रीमत्ताभिहितं राममन्त्रानुष्ठानतत्पराः।
भुक्तिं मुक्तिं च विन्दन्ति कथमेतन्निबोधय।।18।।
किन्तु आपने कहा है कि श्रीराम के मन्त्र का जो अनुष्ठान करते हैं, वे
भोग और मोक्ष दोनों पा लेते हैं। यह कैसे होता है यह हमें बतलायें।
निवृत्तिरेव मुक्तिश्च प्रवृत्तिर्भुक्तिरुच्यते।
उभयोरप्येक एव कथं मार्गो भवेद् वद।।19।।
जब विमुख होना मुक्ति है और प्रवृत्त होना भुक्ति है, तब दोनों विपरीत
वस्तुओं का एक मार्ग कैसे हो सकता है?
अगस्तिरुवाच
त्वया चैव यदुक्तं यत् सत्यं सत्यविदां वर।
सर्वजन्मसुखोच्छित्तिर्दुःखोच्छित्तिश्च तत्त्वतः।20।।
निवृत्तिलक्षणा ह्येषा मुक्तिरित्यभिधीयते।
अगस्त्य ने कहा— हे सत्यवादियों में श्रेष्ठ, सुतीक्ष्ण! तुमने जो कहा वह
सत्य है। वस्तुतः जन्म-ग्रहण सम्बन्धी सभी सुखों तथा दुःखों का नाश, जो एक
प्रकार का त्याग है, मुक्ति के नाम से जाना जाता है।
विषयात्यन्तसंसर्गः करणानां हृदा सह।।21।।
भुक्तिः प्रचक्ष्यते लोके वैषम्यमुभयोरपि।

(136) अगस्त्य-संहिता
भोग के साधनों का हृदय के साथ जो अत्यन्त संयोग है, वह संसार में
भोग कहा जाता है। इस प्रकार दोनों एक दूसरे से अलग है।
तथाथात्मानुसन्धानमुभयत्रापि दृश्यते।।22।।
मुक्तिरात्मानुसन्धाने चात्मावस्थानमेव हि।
एतदस्त्येव तत्त्वञ्च सर्वतत्त्वविदां सताम्। ।23।।
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च सर्वदात्मानुभाविनाम्।
चूँकि आत्मा का अनुसंधान दोनों ही स्थलों पर है और आत्मा के
अनुसंधान के द्वारा आत्मा में स्थित होना मुक्ति है। हे तत्त्वज्ञ! यही कारण है कि
प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों में हमेशा आत्मा का ही अनुभव होता है, यही दोनों में
साम्य है।
किञ्च रामोऽहमित्येव सर्वदानुस्मरन्ति ये।।24।।
न ते संसारिणो नूनं राम एव न संशयः।
और भी, 'मैं राम हूँ' ऐसा जो हमेशा चिन्तन करते हैं, वे संसारी न होकर
राम-स्वरूप हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
राम एवात्र भोक्ता च भोग्यमाद्यं¹ भुजि क्रिया।।25।।
एतस्मिन्नविशिष्टे तु किमसत् सत्रसंजनम्।
अतो न मुक्तिमार्गस्य रोधिनी भुक्तिरिष्यते।।26।।
हे आर्य सुतीक्ष्ण! श्रीराम ही भोक्ता हैं, प्रथम भोग्य हैं तथा भोजन रूप
क्रिया भी वे ही है। उनके अविशिष्ट अर्थात् सामान्य अर्थात् सबमें उपस्थित रहने
पर कौन सा असत् उत्पन्न हो सकता है? अतः भोग मोक्ष के मार्ग का अवरोधक नहीं है।
अनेन विधिना रामं य एवमनुतिष्ठति।
स भुक्तिमपि मुक्तिञ्च लभते नात्र संशयः।।27।।
इस विधि से जो श्रीराम का अनुष्ठान करते हैं, वे भोग और मोक्ष दोनों
प्राप्त करते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
यथा विधिनिषेधौ तु मुक्तिं नैवापसर्पतः।
तथा न स्पृशतो रामोपासकं विधिपूर्वकम्।।28।।

  1. क. एवं घ. भोज्यमाद्यं।

(137)
एकोनविंशोऽध्यायः
जिस प्रकार विधि और निषेध दोनों मुक्ति की ओर ही जाते हैं, उसी
प्रकार विधिपूर्वक रामोपासक को वे दोनों स्पर्श भी नहीं कर पाते।
सदा रामोऽहमित्येव चिन्तयेदप्यनन्यधीः।
न तस्य विहितं लोके निषिद्धं च न विधीयते।।२८।।
'मैं सदा श्रीराम हूँ' ऐसा एकाग्र होकर सोचें। ऐसे व्यक्ति के लिए संसार
में कोई विधान अथवा निषेध नहीं रह जाता है।
यथा घटश्च कलश एकार्थस्याभिधायकः।
तथा ब्रह्म च रामश्च नूनमेकार्थतत्परः।।२९।।
जैसे 'घट' शब्द एवं 'कलश' शब्द दोनों एक ही पदार्थ का अभिधान करते
हैं। उसी प्रकार 'ब्रह्म' और 'राम' शब्द का एक ही अर्थ होता है।
अतो रामोऽहमित्येव तात्पर्यं प्रवदन्ति ये।
रामनामत एव स्युर्न तेषां विहितादिकम्।।३०।।
इसलिए 'मैं राम हूँ' यही भाव जो बोलते हैं, वे श्रीराम के नाम के कारण
राम ही हो जाते हैं, उनके लिए विधि-निषेध आदि नहीं होते।
दातव्यमस्मै ददति ये यावत्किञ्चिदन्वहम्।
उदकौदनवस्त्राणि रामायैव न संशयः।।३१।।
अतो ब्रह्मविदे दत्तमानन्त्याय प्रकल्प्यते।
'ऐसे भक्त को यह दे रहा हूँ' ऐसा सोचकर जो जितनी मात्रा में जल,
भात, वस्त्र आदि दान करते हैं, वे राम को ही समर्पित करते हैं, इसमें सन्देह
नहीं। इसलिए ब्रह्मज्ञानी को दिया गया दान अनन्त फल देनेवाला होता है।
ये दुष्यन्त्यपि निन्दन्ति तत्पापफलभागिनः।।३२।।
¹कुटुम्बिनो दरिद्राः स्युर्दुःखिनः स्युर्न संशयः।
जो ब्रह्मज्ञानियों का दोष निकालते हैं, उनकी निन्दा करते हैं, वे उस पाप
के भागी होते हैं। वे दुःखी होते हैं तथा उनके परिवार के लोग भी दुःखी होते हैं।
ततः सुतान् समुत्पाद्य स्वयमेव दहेदपि।।३३।।
कारागृहेषु सर्वेषु निर्निमित्तं निगृह्यते।
तब वे अनेक पुत्रों को उत्पन्न कर स्वयं भी जलते रहते हैं तथा सभी प्रकार
के बन्धन रूपी कारागार में विना किसी कारण के बाँधे जाते हैं।

  1. घ. यहाँ से दो श्लोक तक क. में अनुपलब्ध। 2. घ. कृतेप्सुभिः।
    Rarest Archiver

(138) अगस्त्य-संहिता
अहो स्वजनभाग्यस्य यथावत्तत् क्षयं भवेत्।।34।।
अतो ब्रह्मविदां द्वेषो न कर्त्तव्यः शुभेच्छुभिः²।
निन्दा चैव न कर्त्तव्या हितमेव समाचरेत्।।।35।।
अपने कुटुम्बों के भाग्य की तरह उनका भी ह्रास होता है। अतः जो
अपनी भलाई चाहते हों, वे ब्रह्मज्ञानियों से द्वेष न करें, उनकी निन्दा न करें;
केवल भलाई का कार्य करें।
ये स्तुवन्त्यनुमोदन्ति ददत्यस्मै मनीषिणः।
तत्पुण्यमखिलं लब्ध्वा तद्गतिं प्राप्नुवन्त्यपि।।36।।
जो उनकी स्तुति करते हैं; उनका समर्थन करते हैं, उन्हें दान देते हैं वे
बुद्धिमान् व्यक्ति अपने सभी कर्मों से उनके पुण्यों को पाकर उनकी गति को भी
प्राप्त करते हैं।
ज्ञात्वा तमेवमात्मानं कृत्यं कुरु निरन्तरम्।
एतेनैव तवाभीष्टं भविष्यति न संशयः।।37।।
उसी आत्मा को जानकर लगातार कर्म करो। इसी से तुम्हारा अभीष्ट
सिद्ध होगा, इसमें सन्देह नहीं।
त्यज¹ दुर्जनगोष्ठीषु विहारेच्छां समाचर।
हितमेव सतां नित्यमहिंसातत्परो भव।।38।।
दुर्जनों की गोष्ठी में स्वच्छन्द होकर रंगरेलियाँ मनाने की इच्छा न करो;
प्रतिदिन सज्जनों के कल्याण की बात करो और अहिंसा के लिए कमर कस लो।
तत्प्राप्तिसाधनान्यष्टौ तानि वक्ष्यामि तच्छृणु।
यमो नियमसंज्ञश्च आसनं च तृतीयकम्।।39।।
प्राणायामश्चतुर्थश्च प्रत्याहारश्च पञ्चमः।
धारणा च तथा ध्यानं समाधिरिति सत्तम।।40।।
हे सत्तम! उस श्रीराम को पाने के आठ साधन हैं, जिन्हें सुनो- यम,
नियम और तीसरा आसन, चौथा प्राणायाम, पाँचवाँ प्रत्याहार इसके बाद धारणा,
ध्यान और समाधि।

  1. घ. त्यजन्।