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सर्वकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 337 में से

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पृष्ठ 180

सप्तदशोऽध्यायः (119)
कृतकृत्यस्ततः शिष्यस्तस्मै सर्वं निवेदयेत्।
यच्च यावच्च यद्भक्त्या गुरुवे हृष्टचेतनः।।141।।
गोभूहिरण्यं विपिनं गृहं क्षेत्रादिकं मुने।
न चेदर्द्धं तदर्द्धं वा दशांशमपि वापि वा।।142।।
अक्लेशादन्नवस्त्रादि दद्याद् वित्तानुसारतः।।143।।
प्रकारान्तरमालम्ब्य गुरुं यत्नेन तोषयेत्।
गुरुपुत्रकलत्रादीन् तोषयेद् बहुभक्तितः¹।।144।।
अर्हणादिश्च बहुभिर्भक्त्याच्छादनभूषणैः।
तब शिष्य चेतना का दर्शन कर कृतकृत्य होकर प्रसन्न चित्त से गुरु को
भक्तिपूर्वक सब कुछ गाय, भूमि, सोना, वन, घर, खेत आदि समर्पित करे। यदि
न हो, तो इसका आधा, आधे का आधा या दशांश भी दे। स्वयं कष्ट न कर धन
के अनुसार अन्न वस्त्र आदि गुरु को समर्पित करें। अन्य विधि से भी यत्नपूर्वक
गुरु को सन्तुष्ट करें। गुरु की पत्नी उनके पुत्र आदि को भी भक्तिभाव से
वस्त्राभूषण देकर उनकी पूजा कर सन्तुष्ट करें।
एवमुक्तप्रकारेण गुरवे दत्तदक्षिणः।
कृतकृत्यं तथात्मानं मत्वा विप्रांश्च भोजयेत्।।145।।
तेभ्यश्च² दक्षिणां दत्त्वा सर्वं तत्प्रतिपूजयेत्³।
ब्राह्मणाशीर्वचोभिश्च गुर्वाशीर्भिः समेधितः।।146।।
विसर्जयेच्च गुर्वादीन् ततो भुञ्जीत मन्त्रवित्।
इस प्रकार ऊपर कही गयी विधि से गुरु को दक्षिणा देकर स्वयं को
कृतकृत्य मानकर ब्राह्मण भोजन कराएँ। उन्हें दक्षिणा देकर उनका अभिवादन
करें। इस प्रकार ब्राह्मणों और गुरु के आशीर्वाद से पवित्र होकर गुरु आदि को
विदा करें तब साधक स्वयं भोजन करें।
एवं लब्धमनुर्विप्रः कृतार्थः स्यान्न संशयः।।147।।
तदादि संध्यां कुर्वीत नियतो गुर्वनुज्ञया।
सायं प्रातश्च मध्याह्ने रामं ध्यात्वा मनुं जपेत्।।148।।

  1. घ. बहुभिः स्वयम्। 2. घ. तेभ्योऽपि। 3. घ. परिपूरयेत्।