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सर्वकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 337 में से

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पृष्ठ 196

(135)
— — — — — — — — — — एकोनविंशोऽध्यायः — — — — — — — — — —
सुतीक्ष्ण बोले— हे ज्ञानियों में श्रेष्ठ महामुनि अगस्त्य! आपने वेद और
पुराणों के प्रयोजन के विषय में सब कुछ जानकर उसका निश्चय कर लिया है। हे
तात! मेरे मन में एक सन्देह है। मैं पूछ रहा हूँ। इस सन्देह का निवारण करें। इस
विषय में आप कृपा करें।
आत्मानुभवरूपेण साक्षात्कारेण केवलम्।
पुनरावृत्तिरहितं शाश्वतं ब्रह्म यात्यपि।।17।।
इति श्रुत्यादितत्त्वज्ञाः प्रवदन्ति मनीषिणः।
वेद आदि का तत्त्व जाननेवाले मनीषीगण कहते हैं कि आत्मा का जब
अनुभव होता है, तब ब्रह्म के साथ साक्षात्कार कहलाता है, उससे इस संसार में
पुनर्जन्म से रहित नित्य ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
श्रीमत्ताभिहितं राममन्त्रानुष्ठानतत्पराः।
भुक्तिं मुक्तिं च विन्दन्ति कथमेतन्निबोधय।।18।।
किन्तु आपने कहा है कि श्रीराम के मन्त्र का जो अनुष्ठान करते हैं, वे
भोग और मोक्ष दोनों पा लेते हैं। यह कैसे होता है यह हमें बतलायें।
निवृत्तिरेव मुक्तिश्च प्रवृत्तिर्भुक्तिरुच्यते।
उभयोरप्येक एव कथं मार्गो भवेद् वद।।19।।
जब विमुख होना मुक्ति है और प्रवृत्त होना भुक्ति है, तब दोनों विपरीत
वस्तुओं का एक मार्ग कैसे हो सकता है?
अगस्तिरुवाच
त्वया चैव यदुक्तं यत् सत्यं सत्यविदां वर।
सर्वजन्मसुखोच्छित्तिर्दुःखोच्छित्तिश्च तत्त्वतः।20।।
निवृत्तिलक्षणा ह्येषा मुक्तिरित्यभिधीयते।
अगस्त्य ने कहा— हे सत्यवादियों में श्रेष्ठ, सुतीक्ष्ण! तुमने जो कहा वह
सत्य है। वस्तुतः जन्म-ग्रहण सम्बन्धी सभी सुखों तथा दुःखों का नाश, जो एक
प्रकार का त्याग है, मुक्ति के नाम से जाना जाता है।
विषयात्यन्तसंसर्गः करणानां हृदा सह।।21।।
भुक्तिः प्रचक्ष्यते लोके वैषम्यमुभयोरपि।