अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
_ _ _ _ _ _ _ _ _ एकोनविंशोऽध्यायः _ _ _ _ _(139)
प्रत्येकमेषां वक्ष्यामि लक्षणानि च सुव्रत।
तद्विविच्य प्रवक्ष्यामि तत्तल्लक्षणमप्यहो।।41।।
हे सुव्रत! इनके प्रत्येक का लक्षण मैं कहूँगा फिर उनका विवेचन कर
उनका लक्षण कहूँगा।
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयार्जवम्।
क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमाः दश।।42।।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, कोमलता, क्षमा, धैर्य, मिताहार,
शौच ये दश यम हैं।
सर्वेषामपि जन्तूनामक्लेशजननं पुनः।
वाङ्मनः कर्मभिर्नूनमहिंसेत्यभिधीयते।।43।।
सभी प्राणियों को वचन, मन एवं कर्म से कष्ट न पहुँचाना अहिंसा कही
जाती है।
यथादृष्टश्रुतार्थानां स्वरूपकथनं पुनः।
सत्यमित्युच्यते धीरैस्तद् ब्रह्मप्राप्तिसाधकम्।।44।।
जैसा देखा गया हो और सुना गया हो, उसी रूप में यदि पुनः कहा जाये
तो उसे धीरों ने सत्य कहा है, यह सत्य ब्रह्म की प्राप्ति का साधक है।
तृणादेरप्यनादानं परस्य चेत् तपोधन।
अस्तेयमेतदप्यङ्ग ब्रह्मप्राप्तेः सनातनम्।।45।।
हे अंग! सुतीक्ष्ण! दूसरे का घास तक नहीं लेना अस्तेय है, जो ब्रह्म की
प्राप्ति का सनातन साधन है।
अवस्थास्वपि सर्वासु कर्मणा मनसा गिरा।¹
स्त्रीसंगतिपरित्यागो ब्रह्मचर्यं प्रशिक्षते।।46।।
सभी अवस्थाओं में कर्म, मन एवं वचन से स्त्री की संगति का परित्याग
ब्रह्मचर्य कहलाता है।
परेषां दुःखमालोक्य स्वस्येवालोच्य तस्य तु।
उत्सादानानुसंधानं दयेति प्रोच्यते बुधैः।।47।।
- घ. मनसापि वा।
(140) अगस्त्य-संहिता
दूसरों का दुःख देखकर 'यह दुःख मेरा है' ऐसा समझकर उसे हटाने हेतु
जो चिन्तन किया जाये, उसे बुद्धिमान् दया कहते हैं।
व्यवहारेषु सर्वेषु मनोवाक्कायकर्मभिः।
सर्वेषामपि कौटिल्यराहित्यं त्वार्जवं भवेत् ।।48।।
सभी प्रकार के व्यवहारों में मन, वचन एवं कर्म से सबके प्रति कुटिलता
का त्याग करना कोमलता है, वह लाना चाहिए।
सर्वात्मना सर्वदापि सर्वत्राप्यपकारिषु।
बन्धुष्विव समाचारः क्षमा स्याद् ब्रह्मवित्तम ।।49।।
हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ! हर प्रकार से, हमेशा, हर स्थान पर अपकार
करनेवालों के प्रति भी भाई-बन्धु के समान आचरण करना क्षमा है।
इच्छाप्रयत्नराहित्यं यातेषु विषयेष्वपि।
नो भवेत् तां धृतिं धीराः प्रवदन्ति सतां वरः ।।50।।
बीती हुई बातों के सम्बन्ध में इच्छा और उसके लिए प्रयत्न न करना धृति
कहलाता है ऐसा धीर लोग कहते हैं।
भोज्यस्यैव चतुर्थांशं भोजनं स्वस्थचेतसः।
अत्युष्णकटुतिक्ताम्ललवणादिविवर्जितम्¹ ।।51।।
हितं मेध्यं सुतीक्ष्णैतन्मिताहारं प्रवक्ष्यते।
जितना भोजन कर सकते हों, उसका चौथाई भाग ही भोजन है। वह
अधिक गरम, कड़वा, तीता, खट्टा, नमकीन नहीं होना चाहिए। भोजन हितकर
हो और पवित्र हो। वैसा भोजन करना मिताहार कहलाता है।
निर्गतं रोमकूपेभ्यो नवरन्ध्रेभ्य एव च ।।52।।
मलं वदन्ति द्वाराणां क्षालनं शौचमुच्यते।
मृज्जलाभ्यां बहिः सम्यक् निर्मलीकरणं पुनः ।।53।।
पूर्वोक्तभूतशुद्धान्तं शौचमाचक्षते बुधाः।
एते दश यमाः ब्रह्मन् ब्रह्मसम्प्राप्ति हेतवः ।।54।।
शरीर के नौ छिद्र एवं रोमकूपों से निकले हुए पदार्थ को मल कहते हैं।
इनके द्वारों को प्रक्षालित करना शौच कहा जाता है। मिट्टी और जल से शरीर के
- घ. अत्युष्णकटुताम्बूललवणादिविवर्जितम्। 2. घ. सिद्धान्तलक्षणम्।
एकोनविंशोऽध्यायः (141)
बाहरी अंगों का शुद्धीकरण होता है तथा पूर्वोक्त विधि से भूतशुद्धि पर्यन्त शुद्धि
को बुद्धिमान् लोग शौच कहते हैं। हे ब्रह्मन्! ये दश यम हैं, जो ब्रह्म-प्राप्ति के
साधन हैं।
तपश्च तुष्टिरास्तिक्यं ईश्वराराधनं तथा।
सिद्धान्तावेक्षणं² चैव लज्जा दानं मतिस्तथा।।55।।
जपो व्रतं दशैतानि सुतीक्ष्ण नियमाः स्मृताः।
तप, तुष्टि, आस्तिक्य भावना, ईश्वर की आराधना, सिद्धान्तों का अवलोकन
करना, लज्जा, दान, मति, जप और व्रत ये दश नियम कहे गये हैं।
प्रत्येकमेषां वक्ष्यामि लक्षणानि तपोनिधे।।56।।
तपस्त्वनशनं नाम विधिपूर्वकमिष्यते।
अनायासोपवासेन तृप्त्यर्थं¹ नैव जीवनम्।।57।।
तुष्टिरेषावधार्य्यैतत् तत्प्राप्तिर्नानया विना।
श्रुत्याद्युक्तेषु विश्वास आस्तिक्यं स प्रचक्षते।।58।।
हे तपोनिधि सुतीक्ष्ण! इनमें से अब प्रत्येक का लक्षण कहता हूँ। विधानपूर्वक
और विना प्रयास किये हुए भोजन नहीं करना तप कहलाता है। 'मेरा जीवन
तृप्ति के लिए नहीं है' तथा 'जीवन तृप्ति के बिना भी व्यर्थ नहीं है' यह धारणा
बनाकर रहना तुष्टि है। वेदादि शास्त्रों में उक्त सिद्धान्तों पर विश्वास करना
आस्तिक्य है।
इष्टदेवार्चनं सम्यक् विधिपूर्वकमन्वहम्।
त्रिसन्ध्यमेकवारन्तु भवत्येवेश्वरार्चनम्।।59।।
प्रतिदिन तीनों सन्ध्या में अथवा एक बार प्रातःकाल में विधानपूर्वक अपने
इष्टदेव की आराधना ईश्वर की आराधना है।
वैष्णवागमसिद्धान्तश्रवणं मननं तथा।
श्रुतिस्मृतिपुराणादिमध्यान्तोदर्कदर्शनम् ।।60।।
सिद्धान्तश्रवणं ह्येतत् प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः।
वैष्णवागम के सिद्धान्त का श्रवण, मनन, वेद, स्मृति, पुराण आदि के
श्रवण के मध्य तथा अन्त में उसके परिणाम के भी दर्शन को तत्त्वज्ञानियों ने
सिद्धान्त-श्रवण कहा है।
- घ. तृप्त्युत्पत्त्यैव जीवनम्।
(142) अगस्त्य-संहिता
— — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — —
श्रुत्यादिभिर्लौकिकैश्च यद्यदत्यन्तनिन्दितम्।।61।।
तत्राप्रवर्तनं लज्जा वाङ्मनःकर्मणामपि।
वेद या लोक में जो अत्यन्त निन्दित कर्म माना गया हो, उन कार्यों को
को नहीं करना वाणी, मन और कर्मों की लज्जा है।
यदिष्टदेवतां ध्यात्वा तदर्पणधियान्वहम्।।62।।
सत्पात्रे दीयतेन्नादि^1 तद्दानमभिधीयते।
अपने इष्टदेव का ध्यान कर उन्हें समर्पित करने की बुद्धि से प्रतिदिन जो
अन्नादि दिया जाता है, उसे दान कहते हैं।
तर्कैस्तदनुसन्धानं^2 सम्यक् सदसतोरपि।।63।।
शास्त्रोक्तयोर्मतिरयं तत्त्वविद्भिरुदीर्यते।
तर्क कर शास्त्र में उक्त अच्छे और बुरे का अनुसंधान कर तत्त्व-ज्ञान
तत्त्वज्ञानियों के द्वारा मति कही गयी है।
गुरोर्लब्धस्य मन्त्रस्य शश्वदावर्त्तनं हि यत्।।64।।
अन्तरङ्गाक्षराणां च न्यासपूर्वो जपो भवेत्।
न्यास करके करना गुरु से प्राप्त मन्त्र के अन्तर्गत आये अक्षरों की बार
बार आवृत्ति जप कहलाता है।
कर्तव्यस्य समस्तस्य नियमग्रहणं व्रतम्।।65।।
सभी कर्तव्यों को नियमपूर्वक स्वीकार करना व्रत कहलाता है।
नियमव्यतिरेकेण सर्वं भवति निष्फलम्।
अतो नियमतः सर्वं कृत्यं साफल्यमाप्नुयात्।^3।।66।।
नियम के विपरीत सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः नियमपूर्वक सभी
कृत कर सफलता पायें।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये यमनियमव्रतो नाम
एकोनविंशोऽध्यायः।
- घ. दीयतेऽर्थादि। 2. घ. स्वतस्तदनुसंधानम्। 3. घ. यमैश्च नियमैश्चैव कृतं यत्
सफलं भवेत्।
Rarest Archiver
विंशोऽध्यायः (143)
अथ विंशोऽध्यायः
अगस्त्य उवाच
एकत्रैव स्थिरीभावः पूर्वोक्तनियमैः सह।
मूलार्पितशरीरस्य एतदासनमुच्यते।।1।।
पूर्वोक्त नियमों का पालन करते हुए मूलाधार में अर्पित शरीर का एक
स्थान पर स्थिर रहना आसन कहलाता है।
प्राणायामाँस्तथा वक्ष्ये मुमुक्षोरुपकारकान्।
यैः कृतैर्दह्यतेऽघौघः शुष्केन्धनगिरिर्मुने।।2।।
अब मोक्ष चाहनेवालों के उपकारक प्राणायामों के विषय में कहता हूँ,
जिन्हें करने से पाप समूह रूपी सूखी लकड़ी का पहाड़ भस्म हो जाता है।
इन्द्रियेष्वपि ये दोषा वातपित्तकफोद्भवाः।
त्वगसृङ्मांसमेदोत्थाः मज्जास्थिचर्मसम्भवाः। 1 ।।3।।
एतेऽपि सर्वे दह्यन्ते प्राणस्यान्तर्निरोधनात्।
प्रायश्चित्तमघौघानां मुख्यमेतद् वदन्ति हि।।4।।
वात, पित्त एवं कफ के कारण त्वचा, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि एवं
चर्म में उत्पन्न जो इन्द्रियों में दोष हैं, वे भी प्राणवायु को अन्तः में रोकने से जल
जाते हैं। पाप समूह का भी यह मुख्य प्रायश्चित्त कहा गया है।
पुनरावृत्तिरहितं शाश्वतं ब्रह्मकांक्षिभिः।
प्राणायामश्च सततं कर्तव्यो विधिवन्मुने।।5।।
पुनर्जन्म से रहित तथा शाश्वत पद एवं ब्रह्म का साक्षात्कार करने की
इच्छा रखनेवालों के द्वारा विधानपूर्वक प्राणायाम सदा करना चाहिए।
सम्यङ्निरुध्य च प्राणानन्तःकरणमात्मनि।
स्वयमेवात्र शिष्टः सन् ब्रह्मभूयाय कल्पते।।6।।
प्राणवायु को सम्यक् रूप से रोककर आत्मा में अन्तःकरण को प्रविष्ट
कराकर स्वयं को इस स्थिति में तटस्थ रखकर साधक ब्रह्म स्वरूप हो जाता है।
- घ. त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जान्त्रशुक्रसम्भवाः।
(144) अगस्त्य-संहिता
जानुबिम्बं कराग्रेण त्रिः परामृश्य सत्त्वरम्।
प्रदद्याच्छोटिकामेकामियं मात्रा कनीयसी ।।7।।
मध्यमा द्विगुणा चैव सा ज्येष्ठा त्रिगुणा स्मृता।
अधमो मध्यमश्चैव प्राणायामस्तथोत्तमः ।।9।।
जानुमण्डल के ऊपर हथेली को शीघ्रतापूर्वक तीन बार फिराकर एक बार
चुटकी बजाने में जो समय लगता है, उसे छोटी मात्रा कहते हैं। इसी दुगुनी मात्रा
मध्यमा कहलाती है और तीन गुनी श्रेष्ठ मात्रा कहलाती है। इसी प्रकार प्राणायाम
भी अधम, मध्यम और उत्तम भेद से प्राणायाम तीन प्रकार के होते हैं।
अधमः पञ्चदशभिः त्रिंशद्भिर्मध्यमो भवेत्।
मात्राभिरुत्तमः पञ्चचत्वारिंशद्भिरुच्यते ।।10।।
प्राणायामैः कृतै शश्वत् कृतैः षोडशभिर्मुने।
दिने दिने च च यत्पापं तत्सर्वं नश्यति ध्रुवम् ।।11।।
परोपतापजं पापं परद्रव्यापहारजम्।
परस्त्रीमैथुनोत्पन्नं प्राणायामैः शतं दहेत् ।।12।।
पन्द्रह मात्राओं से अधम, तीस मात्राओं का मध्यम तथा पैंतालीस मात्राओं
का उत्तम प्राणायाम है। नियमित रूप से सोलह बार प्राणायाम कर प्रतिदिन के
पाप को नाश कर लेता है। दूसरे को कष्ट देने से, दूसरे का धन छीनने से, परायी
स्त्री से मैथुन करने से जो पाप होते हैं, वे सौ बार प्राणायामों से जल जाते हैं।
महापातकजातानि ब्रह्महत्याशतानि च।
सर्वाण्यपि प्रदह्यन्ते प्राणायामैश्चतुःशतैः ।।13।।
महापातकों का समूह तथा सैकड़ो ब्रह्महत्या का पाप, ये सभी चार सौ
प्राणायाम से जल जाते हैं।
आदावन्ते च यत्नेन प्राणायामं समाचरेत्।
कर्मस्वपि समस्तेषु शुभेष्वप्यशुभेषु च।।14।।
सभी शुभ एवं अशुभ कर्म के प्रारम्भ और अन्त में यत्नपूर्वक प्राणायाम
करना चाहिए।
- घ. ०विधिवन्मुने।
विंशोऽध्यायः (145)
प्राणायामैर्विना यद्यत् कृतं कर्म निरर्थकम्।
अतो यत्नेन कर्तव्या प्राणायामाः शुभार्थिना।।15।।
प्राणायाम के विना जो जो कर्म किए जाते हैं, वे व्यर्थ हो जाते हैं। अतः
शुभ चाहनेवाले यत्नपूर्वक प्राणायाम करें।
यावच्छक्यं नियम्यासून मनसैव जपेन्मनुम्।
रामं मुहुर्मुहुर्ध्यायन् पूर्वोक्तविधिवत्सुधीः¹।।16।।
जबतक सम्भव हो प्राणवायु को रोककर श्रीराम का ध्यान करते हुए मन
ही मन मन्त्र पूर्वोक्त विधि से जप करें।
¹धारयन्नन्तरं वासून नेत्रे किञ्चिन्निमील्य च।
परं ज्योतिः परं ध्यायन्नन्तरेव मनुर्जपेत्।।17।।
अथवा प्राणवायु को भीतर में धारण कर दोनों आँखें थोड़ा बन्द कर परम
ज्योतिःस्वरूप परमात्मा का ध्यान करते हुए मन ही मन मन्त्र का जप करें।
आपादमस्तकं सम्यक् प्रविशत्यनिलो यथा।
यावतीभिस्तुमात्राभिरिन्द्रियाण्यपि धावतः।।18।।
प्रक्षुभ्यति शरीरं च तावन्मात्रं सुसंयमः।
जितनी मात्राओं के बराबर समय में मस्तक से पैर तक तथा सभी इन्द्रियों
तक जैसे वायु प्रविष्ट हो रहा हो तथा शरीर हिलने लगे, उतनी मात्राओं तक
प्राणायाम करना चाहिए।
प्राणायामैर्विना यस्य जपहोमार्चनादिकाः।।19।।
न फलन्त्येव ताः सर्वाः यत्नेनापि कृताः क्रियाः।
प्राणायाम के विना जप, होम, अर्चन आदि क्रियाएँ करते हैं, वे सफल नहीं
होते हैं; चाहे वे क्रियाएँ यत्न से क्यों न किये जाएँ।
इन्द्रियाणां हृदा सार्द्धं विषयेभ्यो निवर्तनम्।।20।।
प्रत्याहारो भवेदेतत् सम्यगिन्द्रियनिग्रहः।
इन्द्रियों को अपने अपने विषयों से विमुख करनेवाला तथा हृदय के साथ
संयोग करानेवाला प्रत्याहार है; इससे सम्यक् प्रकार से इन्द्रिय-निग्रह होता है।
- घ. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध।
(146) अगस्त्य-संहिता
जीवस्य ब्रह्मरूपेण निर्द्धारो वाथ युक्तिभिः ।।21।।
पूर्वोक्ता या तु मात्राख्या प्राणायामत्रयोद्भवा।
आत्मन्यपि स्थिरीकारश्चित्तस्येवात्र धारणा ।।22।।
जीव को ब्रह्म के रूप में युक्तियों के द्वारा निर्धारित करना धारणा है
अथवा पूर्व में कही गयी मात्रा से तीन बार प्राणायाम कर आत्मा में चित्त को
स्थिर करना धारणा है।
सम्यगालोकनं ध्यानं रामं हृदि निधाय च।
अङ्गादिभूषणैः सार्द्धं बाहुना चरणैरपि ।।23।।
सभी अंगों, भूषणों, बाहुओं और चरणों सहित श्रीराम को हृदय में
धारण कर उन्हें भली भाँति देखना ध्यान है।
सत्यज्ञानसुखैकत्वप्राप्तये प्राप्तिसाधनम्।
समाधिर्धर्मचिन्ता स्याद् भवान्तरशतेष्वपि ।।24।।
समाधिरथवा जीवब्रह्मणोरैक्यचिन्तनम्।
ब्रह्मीभूय स्वयं जीवो निरुद्धासुर्विलीनभूः ।।25।।
सैकड़ों जन्मों में सत्य, ज्ञान और सुख की प्राप्ति के लिए साधन के रूप में
धर्म-चिन्तन समाधि है। अथवा जीव और ब्रह्म में एकत्व का चिन्तन करना
समाधि है। इस अवस्था में जीव के प्राण अवरुद्ध हो जाते हैं और पृथ्वी का संसार
विलीन हो जाता है; वह साधक ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।
^1अतोऽप्यनन्यसद्भावात् स्वयमेवावशिष्यते।
मुहूर्तावस्थितौ वापि समाधिरथवोच्यते ।।
इसके बाद जीव और ब्रह्म की एकात्मकता के कारण केवल ब्रह्म की सत्ता
रह जाती है। इस अवस्था में मुहूर्त भर भी रहना समाधि की दूसरी परिभाषा है।
एवमष्टाङ्गसम्पन्नो योगयुक्तः सुसंयतः।
सूर्यस्य मण्डलं भित्वा याति ब्रह्म सनातनम् ।।26।।
इस प्रकार आठो अंगों को नियमपूर्वक पूरा कर योग से संयुक्त योगी
होकर सूर्यमण्डल का भेदन कर सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं।
स एवमभ्यसेन्नित्यं वीतभीः^2 शान्त एव च।
वशीकृतरिपुग्रामः^3 सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।27।।
- क. यह श्लोक अनुपलब्ध। 2. घ. विनीतः। 3. वशीकृतेन्द्रियग्रामः। 4. स याति
परमां गतिं।
विंशोऽध्यायः (147)
जो प्रति दिन इस प्रकार का अभ्यास करे, वह भयमुक्त तथा शान्त होकर
सभी काम-क्रोधादि शत्रुओं को वश में कर अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है।
निरस्ताशेषदुरितः कामक्रोधादिवर्जितः।
एवमभ्यासयोगेन योगी याति परां गतिम् ।।२८ ।।
सभी पापों का नाश कर काम, क्रोध आदि का त्याग कर इस प्रकार
अभ्यास कर योगी परम गति को प्राप्त करते हैं।
कर्मयोगेन वा ज्ञानयोगेनाथोभयेन च।
प्राप्यते पुनरावृत्तिरहितं ब्रह्मशाश्वतम् ।।२९ ।।
कर्मयोग से, ज्ञान से अथवा दोनों से वह साधक पुनर्जन्म से रहित शाश्वत
ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
करोत्यनुदिनं यस्तु तत्तत्फलगतस्पृहः।
जपहोमात्मकं कर्म समुन्नीयत तत्फलम् ।।३०।।
सगुणं निर्गुणं चाथ ध्यायेद् यो रघुवंशजम्।¹
कर्मानपेक्षध्यानेन स यात्येव परं पदम् ।।३१ ।।
ध्यानेन कर्मणा चैव योऽभ्यसेद्योगमन्वहम्।
स यात्येवोत्तमं स्थानं यद् गत्वा न निवर्तते ।।३२।।
जो प्रतिदिन कर्मों के फल के प्रति निःस्पृह होकर जप, होम आदि कर्म
करते हैं अथवा उस फल को मन में लाकर सगुण अथवा निर्गुण श्रीराम का ध्यान
करते हैं, वे कर्म के बिना भी ध्यान से उस उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, जहाँ
जाकर कोई लौटता नहीं। ध्यान अथवा कर्म से जो प्रतिदिन योग का अभ्यास
करते हैं, वे उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, जहाँ पहुँच जाने पर पुनः कोई लौटता
नहीं।
अतः² सुतीक्ष्ण यत्नेन योगी भव तपोनिधे।
व्रतोपवासनियमैः जन्मकोटिष्वनुष्ठितैः ।। ३३ ।।
यज्ञैश्च विविधैः सम्यक् भक्तिर्भवति राघवे।
संसारसागरस्यास्य पारं प्राप्तुं यदीच्छसि ।। ३४ ।।
कर्मयोगेऽथवा ज्ञानयोगे प्रविश सत्वरम्।
- घ. रघुनन्दनम्। 2. घ. ततः।
(148) अगस्त्य-संहिता
हे सुतीक्ष्ण! इसलिए योगी बनो। करोड़ो जन्मों में व्रत, उपवास आदि
नियमों से तथा अनेक प्रकार के यज्ञों से श्रीराम में सम्यक् भक्ति का उदय होता
है। इस संसार के समुद्र को यदि पार करना चाहते हो, तो कर्मयोग में अथवा
ज्ञानयोग में शीघ्रता से प्रवेश करो।
सर्वदुःखाभिभूतानां भ्रान्तानां गतचेतसाम् ।। ३५ ।।
त्राता स एव संसारे राघवः स्वयमेव हि।
सभी प्रकार के दुःखों से दुःखी, भटके हुए तथा चैतन्यहीन प्राणियों की
रक्षा करनेवाले स्वयं श्रीराम है।
प्रक्षीणशेषपापानां ज्ञानयोगः प्रशस्यते ।। ३६ ।।
कर्मयोगैस्तु सर्वेषां भवे निर्वाणसाधनम्।
जिनके सभी पाप नष्ट हो गये हैं, उनके लिए ज्ञान योग प्रशस्त हैं; किन्तु
इस संसार में सबके लिए कर्मयोग के द्वारा मुक्ति का साधन मिल जाता है।
ज्ञानेन कर्मणा वापि रामं सम्यगिहार्चयेत् ।। ३७ ।।
सुतीक्ष्णैतच्छरीरं तु क्षयिष्ण्वपि पतिष्णु च। १।
त्वगसृङ्मांसमज्जास्थिमेदश्शुक्रमयं तनुः ।। ३८ ।।
शास्त्रोपपादितं सम्यगनुतिष्ठ सनातनम्।
ज्ञान से अथवा कर्म से इस संसार में श्रीराम की सम्यक् आराधना करनी
चाहिए। हे सुतीक्ष्ण! यह शरीर विनाशशील है और संयमित करने योग्य है।
त्वचा, रक्त, मांस, मज्जा, अस्थि, मेद और शुक्र से बना हुआ यह शरीर है
इसलिए शास्त्रों में प्राचीन काल से जो विधान किया गया है, उसका पालन करो।
कर्मयोगं तथा ज्ञानयोगं वा योगवित्तम ।। ३९ ।।
श्वः करिष्यामि कर्त्तव्यमिति कश्चिद् विचिन्तयेद्।
स्वस्यास्ये स्वयमेवार्य्य मन्दाक्षो धूलिं निक्षिपेत् ।। ४० ।।
हे योग के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! हे आर्य! 'कर्मयोग अथवा ज्ञानयोग मैं
कल करूँगा' यह जो कोई सोचता है, वह अन्धा जैसा अपने मुँह पर धूल झोंक
रहा है।
सम्यग्वैराग्यनिष्ठस्य पारतत्त्वस्थचेतसः।
छर्दितान्ननिभाः सर्वे दृश्यन्ते विषयाः स्वयम् ।। ४१
- घ. क्षयिष्णु पिपतिष्णु च।
एकविंशोऽध्यायः (149)
शरीरित्वमपि प्रायो विरक्तस्यैव शोभते।
विरक्तस्य तदा स्यात्तु त्याज्यं सर्वात्मना भवेत् ।।42।।
सम्यक् प्रकार से वैराग्य युक्त साधक जो परम तत्त्व में ध्यान लगाये हुए
हैं, उन्हें सारे विषय वमन किये हुए पदार्थ के समान स्वयं दिखाई पड़ने लगते हैं।
इस शरीर की भावना भी विरक्त को ही शोभा देती है। विरक्त के लिए यह
शरीर भी शीघ्र ही हर प्रकार से त्याज्य है।
अत्यमेध्यशरीरस्थं विष्ठामध्यगतादपि।
तत्त्वनिष्ठो विशेषेण प्राणिनां मनुते हितम् ।।43।।
शरीरेऽस्मिन्नमेध्यत्वमीदृशं नाम देहिनाम्।
त्वगाद्येकैकसंस्पर्शे स्नानमेव विशोधनम् ।।44।।
अत्यन्त अपवित्र शरीर में स्थित इन्द्रिय विष्ठा के बीच रहनेवाले कीड़े के
समान हैं, इस शरीर को तत्त्वज्ञानी विशेष रूप से प्राणियों का केवल उपकारक
मानते हैं। प्राणियों में इस शरीर की ऐसी अपवित्रता होती है, अतः त्वचा आदि
प्रत्येक का स्पर्श होने पर उसकी शुद्धि स्नान है।
शृगालैरपि गृध्रैश्च नीयते यद्यहो विधिः।
विधत्ते चर्मणा चैव शरीराणि शरीरिणाम् ।।45।।
तत्तु प्रतिपदं सम्यगापदां पदमीदृशम्।
ततः शरीरं विश्वस्य न उदास्ते स मूढधीः ।।46।।
सियार और गीध उस शरीर के टुकड़े टुकड़े कर ले जाते हैं, यही विधि
का विधान है। वे ही अवयव शरीरधारियों में चमड़ा से ढँके हुए रहते हैं। वह
शरीर प्रत्येक पग पर विपत्तियों का स्थान है, अतः जो शरीर पर विश्वास करते
हुए शरीर से उदासीन नहीं रहते हैं, वे विद्वान् नहीं, मूर्ख हैं।
दुःखानुभवार्थाय विधिनैतत्कृतं वपुः।
परमार्थविद्येतद् वीक्षमाणो न वीक्षते।।47।।
व्यामोहिते जगत्यस्मिन् माययैव महात्मनः।
विष्णोस्तत्त्वविदप्याशु देहान्तरमुपैत्यहो ।।48।।
सुखबुद्ध्या दुःखमेव भूयोप्यनुभवेत् तु यः।
Rarest Archiver
(150) अगस्त्य-संहिता
केवल दुःख का अनुभव करने के लिए विधाता ने इस शरीर का निर्माण
किया है। परमार्थ के ज्ञानी भी इसे देखते हुए भी नहीं देखते हैं; क्योंकि इस संसार
में महान् विष्णु की माया से ही वे व्यामोहित हैं। तत्त्वज्ञानी भी दूसरा शरीर पाकर
पुनः मैं सुख भोग रहा हूँ, यह सोचते हुए बार-बार दुःख ही भोगने लगते हैं।
पतत्यकिञ्चनो भूत्वा कुटुम्बाभरणाकुलः ।।४९।।
भ्रमत्येवातुरो भूत्वा दुःखावर्ते पुनः पुनः।
दुःखमित्यविजानाति दुःखं नैव तपोधन ।।५०।।
सर्वात्मना परित्याज्ये सर्वेषामपि दुःखदे।
प्रविशेत् को भवे मन्दे ततोऽप्यादौ पुनर्हतः ।।५१।।
वे अकिंचन होकर परिवार के भरण-पोषण में व्याकुल होते हुए इस
संसार-चक्र में कूद पड़ते हैं और आतुर होकर बार-बार इसी दुःख रूपी भँवर में
घूमते रहते हैं। यह संसार दुःखमय है, उसे वह जीव पहचान नहीं पाता है और
दुःख के स्वरूप को भी नहीं जान पाता है। सभी प्राणियों को दुःख देनेवाले अतः
हर प्रकार से त्यागने योग्य इस अभागे संसार में कौन प्रवेश करे! वे मन्दबुद्धि वाले
जन्म के समय तो नष्ट होते ही हैं, पुनः मृत्यु के समय भी मारे जाते हैं; क्योंकि वे
मुक्ति के लिए जीवन भर उपाय नहीं करते।
न किञ्चिदपि कर्मात्र निष्फलं विद्यते मुने।
इच्छेत् पुनः प्रवेशाय भवेन्मुक्तोऽपि वध्यते ।।५२।।
हे मुनि सुतीक्ष्ण! इस संसार में कोई कर्म निष्फल नहीं होता। तब यदि
पुनः इस संसार में प्रवेश की इच्छा की जाती है तो मुक्त भी पुनर्जन्म के बन्धन से
बँध जाते हैं।
अतो न कर्म कर्त्तव्यं फलार्थित्वेन शूरिभिः।
न चेत् पतन्ति संसारे दुःखावर्ते विमोहिताः ।।५३।।
यदि कर्तुः फलं तत्तदनपेक्ष्यार्चनादिकम्।
ईश्वरोऽपि समुद्धर्त्तुं शक्तो भवति नान्यथा ।।५४।।
Rarest Archiver
एकविंशोऽध्यायः (151)
अतः फल के प्रयोजन से विद्वानों के द्वारा कोई कर्म नहीं किया जाना
चाहिए। अन्यथा, वह इस संसार में दुःख के भँवर में विमूढ़ होकर गिर पड़ते हैं।
यदि उन अर्चना आदि से कर्ता को मिलनेवाले फल की अपेक्षा न हो, तो कर्म
करना चाहिए। उसे ईश्वर ही उद्धार कर सकते हैं; अन्य प्रकार से उनका उद्धार
नहीं हो सकता।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये प्राणायामविधिर्नाम
विंशोऽध्यायः ।।20।।
अथ एकविंशोऽध्यायः
अगस्त्य उवाच
अथातोहं प्रवक्ष्यामि गुह्याद् गुह्यतरं परम्।
यदशेषेण दुःखघ्नं तच्छृणुष्व तपोनिधे।।1।।
तत्प्राप्तिसाधनेनैव कर्मापीत्यपि चिन्त्यते।
कर्मणामीदृशं यस्माद् विहितं सुकृतं तथा।।2।।
अगस्त्य बोले- अब मैं अत्यन्त गूढ रहस्य बतलाता हूँ, जिससे सभी दुःख
मिट जाते हैं। हे तपस्वी! इसे सुनें। उस परमात्मा की प्राप्ति के साधन के रूप में
कर्म भी है, यह चिन्तन किया गया है; कर्म का स्वरूप ही ऐसा है कि यह विहित
और अविहित रूप से दो प्रकार के होते हैं।
रहस्यमेतत् तन्नास्ति तदस्मन्मुक्तये कथम्।
यो यत्र वाधिकारत्वे चोदितस्तादृशो नहि।।3।।
रहस्य यह है कि कर्म का सत्ता ही नहीं है, तब वह कैसे हमारी मुक्ति के
लिए उपयोगी होगा। जो कर्म जिस विनियोग के लिए कहा गया है, वह उसके
अनुरूप नहीं है।
जगत्यपि धनं न्यायैरागतं क्व च मे वद।
ऋत्विजः कर्मतत्त्वज्ञाः यजमानहितैषिणः।।4।।
(152) अगस्त्य-संहिता
अब बतलाएँ कि इस संसार में कर्म के लिए न्यायोपार्जित धन कहाँ से
मिलेगा? यज्ञ में कर्म के मर्मज्ञ ऋत्विक् क्या यजमान का उपकार करते हैं?
क्व च तिष्ठन्ति मन्त्राश्च नियमाध्यापिता पुनः।
अधीतानि यमेनापि सम्यग् वा पाठनं कुतः।।5।।
कथमेवंविधं कर्मफलं साधकमिष्यते।
फिर नियमपूर्वक पढ़ाये गये मन्त्र कहाँ है? कोई यम का पालन करते हुए
पढ़ना भी चाहे, तो सम्यक् रूप से किससे पढ़े? तब इस प्रकार किये गये कर्म भला
कैसे इष्टसाधक हो सकेगा?
यदर्थसाधकत्वेन यच्च यस्य प्रचोदितम् ।।6।।
तत्रैवोक्तं प्रयत्नेन व्यङ्गं चेत् तदसाधनम् ।¹
जो कर्म जिस प्रयोजन के लिए साधन के रूप में कहा गया है, वही कर्म
अपने अंग के लोप हो जाने पर असाधन हो जाता है।
( लोक में नियम है- एकदेशविकृतमनन्यवत्। अर्थात् यदि कुत्ते की पूँछ
कटी हो, तब भी उसे कुत्ता ही कहेंगे, उसकी संज्ञा नहीं बदलती है, किन्तु कर्म के
साथ यह विडम्बना है कि इसका एक अंग भी छुट जाये, तो वह साधन नहीं
असाधन हो जाता है।)
कर्तुं कारयितुं वापि ब्रह्मा विष्णुमहेश्वरः ।।7।।
न शक्नोतीति¹ मे बुद्धिर्विहितं विधिवत् स्वयं।
को वान्ये विधिवत् कर्म कृत्वेष्टं साधयेत् फलम्² ।।8।।
सभी अंगों के साथ विधिवत् कर्म करने और कराने में तो ब्रह्मा, विष्णु
और महेश भी समर्थ नहीं होंगे, यह मेरी बुद्धि कहती है। तब दूसरा कौन है, जो
स्वयं विधिवत् कर्म कर अभीष्ट फल पा सकेगा?
कर्म कर्ता कृतिश्चैव साधनानि बहून्यपि।
एतत्साध्यं फलं तेन सुखी भवति देहवान् ।।9।।
कर्ता, कर्म, कृति और अनेक प्रकार के साधनों के द्वारा मनुष्य को कर्मफल
मिलता है, जिससे वह सुखी होता है।
तेषां न्यूनातिरिक्ताभ्यां अतथा चोदिता सती।
विपरीतफलस्यैव³ दात्री स्यात् कृतिरुज्जसा।।10।।
- घ. न शक्तोस्तीति। 2. घ. पुनः।
एकविंशोऽध्यायः (153)
कर्मों में न्यूनता और अधिकता हो जाने के कारण शास्त्रानुसार सम्पन्न न
होने से कर्म शीघ्र ही विपरीत फल देने लगता है।
निर्मलीकरणं कर्म वदन्ति ह्यपि चेतसः।
तत्फलानर्थिभिः सम्यग्विहितं तदनुष्ठितम्।।11।।
कर्म के फल की प्राप्ति की कामना न रखनेवाले साधकों द्वारा भलीभाँति
जो कर्म किया जाता है, वह चित्त को शुद्ध करने की प्रक्रिया है, ऐसा लोग कहते हैं।
योगाभ्यासदशायाञ्च तन्नित्यं कर्म नित्यशः।
नैमित्तिकनिमित्तेषु काम्यं नैव समाचरेत् ।।12।।
योगाभ्यास करते समय नित्यकर्म प्रतिदिन करना चाहिए और नैमित्तिक
के लिए किये जानेवाले कर्म के साथ काम्य कर्म नहीं करना चाहिए।
सम्यगुत्पन्नवैराग्यो यदा भवति देहवान्।
तदा सर्वं परित्यज्य कर्म मोक्षाय कल्पते।।14।।
भलीभाँति वैराग्य हो जाने पर प्राणी जब स्वयं को देहधारी समझता है,
अर्थात् आत्मा से भिन्न शरीर का अस्तित्व मानने लगता है, तब वह सभी कर्मों
का त्यागकर मोक्ष की इच्छा करने लगता है।
योगाभ्यासरततः शान्तो निर्धूताशेषकल्मषः।
ब्रह्मविद् ब्रह्म भवति परिव्राडेव नेतरः।।15।।
सर्वात्मना परित्यागो नास्त्यन्येषामतस्ततः।
योगाभ्यास में लीन होकर सभी पापों को जलाकर शान्तचित्त ब्रह्मज्ञानी
परिव्राजक ब्रह्म ही हो जाता है, अन्य नहीं; क्योंकि अन्य लोग हर प्रकार से त्याग
नहीं कर पाते हैं, इसलिए वे ब्रह्म को प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
ब्रह्मचारिगृहारण्यवासिनां योगिनामपि।।16।।
सर्वात्मनामृतत्वेन ब्रह्मीभावो यतः परम्।¹
गृहस्थों और वानप्रस्थियों में तथा योगियों में जो ब्रह्मचारी होते हैं, वे
सभी प्रकार से अमरत्व से पूर्ण होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं।
परित्यक्तात्मदेहादिपत्नीपुत्रादिमानितः ।।17।।
स्वं देहमपि योऽमेध्यं विण्मूत्रमपि चिन्तयेत्।
यतिरुत्पन्नवैराग्यो ब्रह्मेति ब्रह्मवित्तमः।।18।।
- घ. यतो भवेत्। 2. घ. एक श्लोक अनुपलब्ध।
(154) अगस्त्य-संहिता
ऐसे व्यक्ति, जो शरीर, पत्नी, पुत्र आदि का अभिमान छोड़ चुके हैं, उनमें
से अनन्य ब्रह्मचारी शरीर को अपवित्र मानते हुए उसे विष्ठा और मूत्र के समान
सोचें। तब वैराग्य उत्पन्न होने के कारण जो यति हो जाते हैं, वे ब्रह्मज्ञानियों में
श्रेष्ठ होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं।
२कर्मावकाशलेशोऽपि मोक्षे नास्ति ततो मुने।
परमार्थविदो नूनं विरक्तस्य सुचेतसः।।
परमार्थ को जाननेवाले, विरक्त एवं निर्मल चित्तवाले मनुष्यों के लिए
मोक्षमार्ग में कर्म के लिए थोड़ा सा भी स्थान नहीं है।
अमेध्यं दृश्यते सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
कश्चित्किमर्थं यत्किञ्चित् कुर्याद् भ्रान्त इवात्मवान्।।19।।
यह स्थावर एवं जंगम रूप सम्पूर्ण जगत् ही अपवित्र दिखाई पड़ता है।
कोई प्राणी इस जगत् में जो कुछ भी है, उसका प्रयोजन जानकर तथा आत्मा का
ज्ञान पाकर भी कोई भ्रमित व्यक्ति के समान कर्म करता है।
को वामेध्यं परित्यक्तं पुनरङ्गे विनिक्षिपेत्।
विष्ठाशनः शूकरोऽपि न स्वविष्ठाशनो भवेत्।।20।।
कौन ऐसा प्राणी है, जो अपवित्र वस्तु का परित्याग कर उसे पुनः अपने
शरीर पर डाले! विष्ठा खानेवाला सूअर भी अपनी विष्ठा तो नहीं खाता है!
स्वेनासत्त्वेन मुक्तस्य स चिन्तां किं करिष्यति।
जगत्यभ्युदयार्थं यद् भवेत् कर्म तथाविधि।।21।।
एतत् तत्त्वविदो न्यूनं न भ्रान्तस्य कदाचन।
जो अपने असत्त्व रूप शरीर से मुक्त हो चुका है, उसे चिन्ता किस बात
की होगी? किन्तु इस संसार में अपनी उन्नति के लिए जो कर्म किये जाते हैं, वे
तत्त्वज्ञानियों के लिए न्यून होते हैं न कि भ्रान्त लोगों के लिए।
इन्द्रियाणि शरीरं च वर्तन्ते मनसा समम्।।22।।
विषयेष्वेव तोयानि स्वतो न्यूनस्थलेष्विव।
दुःखमुत्पादयन्त्येव तदानीमायतावपि।23।।
इन्द्रियाँ तथा शरीर मन के साथ संयुक्त होकर नीचे विषयों की ओर उसी
प्रकार गिरने लगते हैं, जैसे जल हमेशा नीचे की ओर बहता है। ऐसी स्थिति में
स्फीत स्थल में भी वे इन्द्रियाँ तथा शरीर दुःख ही उत्पन्न करते हैं।
- घ. दुःखकृद्।
एकविंशोऽध्यायः (155)
यो यस्य पापकृद्¹ वैरी स तस्येति स्थितिर्भवेत्।
तदन्ते वैरिणं ज्ञात्वा समीपेऽप्यपकारिणम् ॥ २४ ॥
स तेनैव हतो भूत्वा प्राणानपि विमुञ्चति ।
जो शत्रु है और पाप देनेवाला है, उसे लोग अपना (हित) बना लेते हैं,
यही विडम्बना की स्थिति है। किन्तु देहान्त के समय में प्राणी समीप में स्थित
अपकार करनेवाले शत्रु को जानकर भी उसी के द्वारा घायल होकर अपना प्राण
भी त्याग कर देता है।
अतो यत्नेन देहादीन् कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः ।। २५ ।।
शोधयेद् विधिवत् सम्यक् न च तैरभिभूयते ।
अतः यत्नपूर्वक देह आदि को कृच्छ्र एवं चान्द्रायण व्रत आदि के द्वारा
विधानपूर्वक सम्यक् प्रकार से शुद्ध करें, इससे वह साधक इन्द्रियों के द्वारा पराजित
नहीं होता है।
यदि तैरभिभूतः स्यात् स्वस्यापि प्रियमप्रियम् ॥ २६ ॥
न वेत्ति विषयाविष्टो नरकं प्रतिपद्यते ।
यदि वह शरीरादि से पराजित हो जाता है, तब अपन प्रिय और अप्रिय
भी नहीं जान पाता है और विषय में लिप्त होकर नरक का भागी बनता है।
ततः कर्मविपाकेन तरुगुल्मलतादिकम् ॥ २७ ॥
सम्प्राप्य कृमिकीटादिजन्तुत्वं प्रतिपद्यते ।¹
ग्रामारण्यपशुत्वं च यच्च यावच्चराचरम् ॥ २८ ॥
समुपेत्य विनष्टात्मा मानुष्यं प्रतिपद्यते ।²
ऐसा होने पर कर्म के परिणामस्वरूप वृक्ष, झुरमुट, लता आदि के रूप में
तथा कीड़े-मकोड़े के रूप में जन्तु का शरीर प्राप्त करता है। वह पालतू और
जंगली जानवर के रूप जन्म लेकर जितने स्थावर और जंगम प्राणी हैं, उसके रूप
में जन्म लेते हुए आत्मज्ञान के नष्ट हो जाने पर मनुष्य की योनि में जन्म लेते हैं।
ततः पुराकृतं स्वस्य दुःखदं कर्म विस्मरन् ॥ २९ ॥
करोत्यनिष्टं सततं हितं नैव समाचरेत् ।
ततोऽयन्नारकी भूत्वा पुनरेवं प्रपद्यते ॥ ३० ॥
- घ. में अनुपलब्ध। 2. घ. मनुष्यत्वं प्रपद्यते ।
(156) अगस्त्य-संहिता
भूयो भूयोऽप्येवमेव चक्रवत्परिवर्तते।
तब पूर्वजन्म में अपने किये गये दुःखप्रद कर्मों को भूलते हुए हमेशा गलती
ही करता रहता है और कल्याणकारी कार्य नहीं करता है। तब वह जीव नरक
प्राप्त कर फिर इसी प्रकार उत्पन्न होता है। बार बार इसी प्रकार चक्र के समान
परिवर्तन होता रहता है।
विहितं च निषिद्धं च सः कर्म विदधीत वै।।31।।
संसारान्न निवर्तन्ते कदाचिदपि दुःखितः।
अतः शास्त्र में जिस कर्मकाण्ड का विधान किया गया है अथवा जिसे
निषिद्ध माना गया है, उन्हें जो करते हैं, वे दुःखी इस संसार से छुटकारा
नहीं पाते हैं।
न ज्ञानव्यतिरेकेण मुक्तये साधनान्तरम्।।32।।
सुतीक्ष्ण विद्यते तत्त्वज्ञाननिष्ठो भवानघ।
तद्योगेनैव भवति योगोऽप्यभ्यासपूर्वकः।।33।।
अभ्यासोऽपि यमाद्यैश्च जायते नान्यथा मुने।
अतः हे निष्पाप सुतीक्ष्ण! ज्ञान को छोड़कर मुक्ति का दूसरा साधन कुछ
भी नहीं है, अतः तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करो। यह ज्ञान योग से होगा तथा योग भी
अभ्यास करने से होगा। यह योगाभ्यास भी यम आदि का पालन करने से होगा
अन्य विधि से नहीं।
अधीत्य वेदशास्त्राणि¹ विरक्तैः सात्त्विकैश्च तैः।।34।।
यमादयोऽनुष्ठीयन्ते त्यक्तदेहाभिमानिभिः।
वेद और शास्त्रों का अध्ययन कर विरक्त और सात्त्विक प्रवृत्ति के लोगों
द्वारा अपने शरीर का अभिमान छोड़ देने पर यमादि का पालन किया जाता है।
स्वदेहाभिमानोऽपि तेषामेव न विद्यते।35।।
नित्यानित्यार्थतत्त्वज्ञाः शान्ताश्च यतयोऽपि ये।
यह नित्य है और यह अनित्य है, इसका जिन्हें ज्ञान हो गया है, ऐसे शान्त
यती को ही अपने शरीर का अभिमान नहीं रहता है।
मुक्तये न परो मार्गो मुक्तये न परन्तपः।।36।।
मुक्तये न परं ध्यानं ततोऽन्यन्नास्ति किञ्चन।
- घ. वेदशास्त्रार्थ।
द्वाविंशोऽध्यायः (157)
मुक्ति के लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं, दूसरा कोई तप नहीं, दूसरा कोई
ध्यान नहीं। इस ज्ञान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
यदि त्वमुपपद्यैव देहादौ ममतामपि।।37।।
त्यज कर्माखिलं सम्यक् यदि मुक्तिमपेक्षसे।
इस प्रकार, यदि मोक्ष चाहते हो, तो ज्ञान प्राप्त कर शरीर इन्द्रिय आदि के
प्रति ममता का त्याग करो और सभी कर्मों का भी त्याग करो।
जानीहि सम्यगात्मानमन्तरे त्वं निरन्तरम्।।38।।
मूलाधारे च हृदये द्वादशान्ते स्थितो हि सः।
यावदन्तर्बहिः सर्वं व्याप्य रामः प्रकाशते।।39।।
देहादिषु गतेष्वेकं स्वयमेवावशिष्यते।
ततस्त्वतः परं कञ्चिद् विद्यते न तपोधन।।40।।
आत्मा को भलीभाँति जानो और हमेशा उसे अपने अन्तःकरण में स्थित
जानो। वह परमात्मा मूलाधार, हृदय और द्वादश चक्र के अन्तस् में स्थित है।
भीतर बाहर जो कुछ भी है, उनमें श्रीराम व्याप्त होकर उन्हें प्रकाशित करते हैं।
शरीर आदि के नष्ट हो जाने पर भी एकमात्र श्रीराम शेष रह जाते हैं। हे
तपोधन सुतीक्ष्ण! इसलिए इसके ऊपर कुछ भी नहीं है। श्रीराम परम सत्ता हैं।
एवं च सति दुःखञ्च संसारोऽप्यस्थितो मुने।
यतित्वव्यतिरेकेण यो यतेत स मूढधीः।।41।।
दुःखात्यन्तनिवृत्तौ च विना वा ब्रह्मविद्यया।
सर्वात्मना हि सर्वेभ्यो विषयेभ्यो निवर्तनम्।।42।।
हे मुनि सुतीक्ष्ण! इस प्रकार श्रीराम को परम सत्ता के रूप में जान लेने
पर दुःखमय यह संसार अस्तित्वहीन हो जायेगा। यति धर्म के बिना जो भी इसके
लिए यत्न करते हैं, वे मूर्ख हैं। अथवा, ब्रह्मविद्या के बिना दुःखों की पूर्ण निवृत्ति
के लिए तथा हर प्रकार से सभी विषयों से छुटकारा पाने के लिए भी जो यत्न
करते हैं, वे मूर्ख हैं।
ब्रह्मविद्यासमायुक्तं यतित्वं मुक्तिसाधनम्।
तत्त्वतो न परं किञ्चित् साधनं मुक्तयेऽस्ति हि।।43।।
(158) अगस्त्य-संहिता
ब्रह्मविद्या से युक्त जो यति धर्म है, वह मुक्ति का साधन है। वस्तुतः इससे
आगे ऐसा कोई साधन नहीं है, जो मोक्ष के लिए हो।
अतस्तदयनं सर्वं मङ्गलं सर्वसिद्धिदम्।
यथा भागीरथी गङ्गा सागरेण समं गता ।।44।।
पुनाति पतितान् ब्रह्मविद्यापि भुवनत्रयम्।
इसलिए वह समस्त मंगलमय तथा सारी सिद्धि देनेवाला मार्ग है। जैसे
सगर के वंशज भगीरथ द्वारा लायी गयी गंगा पतितपावनी है, उसी प्रकार, ब्रह्म
विद्या तीनो लोकों को पवित्र करती है।
यतिदर्शनमात्रेण योगाभ्यासपरायण। ।।45।।
सम्यग् ब्रह्मविदां श्रेष्ठ¹ निर्मली कुरुते जगत्।
हे योगाभ्यास में लीन सुतीक्ष्ण! हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ! यतियों के दर्शनमात्र
से यह संसार पवित्र हो जाता है।
प्रायश्चित्तं पुनात्याशु यथा द्वादशवार्षिकम् ।।46।।
विधिवत् स्वीकृतं सम्यग् यतित्वं च तथा सताम्।
²अतः सर्वात्मना ब्रह्मकैवल्यं नित्यमभ्यसेत् ।।47।।
जिस प्रकार, बारह वर्ष तक का प्रायश्चित्त शीघ्र पवित्र करता है, उसी
प्रकार सज्जनों द्वारा आचरित विधानपूर्वक, शास्त्रानुमोदित सम्यक् यति धर्म पवित्र
करता है। अतः सभी प्रकार से ब्रह्म-कैवल्य का नित्य अभ्यास करना चाहिए।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये ब्रह्मविद्यानिरूपणं नामैकविंशोऽध्यायः।।
अथ द्वाविंशोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच।
योगो नाम किमेतन्मे ब्रूहि योगविदां वर।
चेतसो विजयः केनोपायेन स्यान्मुनीश्वर।।1।।
सुतीक्ष्ण बोले- हे योगिराज! अगस्त्य! योग क्या है? यह मुझे बतलाएँ
और मन पर विजय कैसे मिलेगा?
- घ. ब्रह्मविदश्चैव। 2. घ. में अनुपलब्ध। 3. घ. स्यात्तथा ततः।