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सर्वकोश
अभिधर्मकोश एवं भाष्य (आचार्य वसुबन्धु - स्फुटार्था व्याख्या सहित सम्पूर्ण बौद्ध दर्शन महाकोश)

अभिधर्मकोश एवं भाष्य (आचार्य वसुबन्धु - स्फुटार्था व्याख्या सहित सम्पूर्ण बौद्ध दर्शन महाकोश)

Abhidharmakosha and Bhashya of Vasubandhu with Commentary

आचार्य वसुबन्धु (टीकाकार: यशोमित्र, सम्पादक: स्वामी द्वारिकादास शास्त्री) द्वारा

DevanagariSanskritpublished1,258 पृष्ठ

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पृष्ठ 1149

म्बनत्वे एकाालम्बनत्वं? Let's look at line 18: मप्येकालम्बनत्वे एकाालम्बनत्वं चित्तानामित्युच्यते, न पुनरेकालम्बनता`
Wait, look at line 18:
म-प्ये-का-ल-म्ब-न-त्वे (मप्येकालम्बनत्वे)
ए-का-ल-म्ब-न-त्वं (एकालम्बनत्वं)
चि-त्ता-ना-मि-त्यु-च्य-ते, (चित्तानामित्युच्यते,)
न पु-न-रे-का-ल-म्ब-न-ता (न पुनरेकालम्बनता)
Yes!

Line 19:
चित्तचैत्तानामित्युच्यते ? प्राधान्यात् चित्तान्येवैकालम्बनानि समाधिरिति ।

Line 20:
अवस्थाविशेषत्वाच्चित्तगुणभाववत्¹ । वैभाषिक आह-न चित्तान्येव

Line 21:
समाधिः । येन तु तान्येकाग्राणि वर्तन्ते समाहितानि स धर्मः समाधिः । यथा

Line 22:
वैशेषिक-नये शुक्लगुणयोगाच्छुक्लः पटः, स एव गुणोऽस्य शौक्लमित्युच्यते,