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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 572 में से

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त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ १६१
नाना प्रकार के विकल्प उत्पन्न होते हैं ? ॥ १४ ॥ कर्म से कर्मों का
अस्तित्व है, कर्मत्याग से शान्ति हो जाती है । दक्षिण अयन में आने से
उसे प्रपञ्च में लिप्त होना पड़ता है ॥ १५ ॥
अहंकाराभिमानेन जीवः स्याद्धि सदाशिवः ।
स चाविवेकप्रकृतिसङ्गत्या तत्र मुह्यते ॥१६
नानायोनिशतं गत्वा शेतेऽसौ वासनावशात् ।
विमोक्षात्संचरत्येव मत्स्यः कूलद्वयं यथा ॥१७
ततः कालवशादेव ह्यात्मज्ञानविवेकतः ।
उत्तराभिमुखो भूत्वा स्थानात्स्थानान्तरं क्रमात् ॥१८
मूर्ध्न्याधात्मनः प्राणान्योगाभ्यासं स्थितश्चरन् ।
योगात्संजायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रवर्तते ॥१९
योगज्ञानपरो नित्यं स योगी न प्रणश्यति ।
विकारस्थं शिवं पश्येद्विकारश्च शिवे न तु ॥२०
योगप्रकाशकं योगैर्ध्यायेश्चानन्यभावनः ।
योगज्ञाने न विद्येते तस्य भावो न सिध्यति ॥२१
अहंकार से युक्त हो जाने के कारण सदाशिव ( परमात्मा ) को
जीवकोटि में आना पड़ता है । वहां अविवेक और प्रकृति के संयोग से
वह मोहग्रस्त होजाता है ॥ १६ ॥ वासनाओं में फँस कर वह सैकड़ों
योनियों में जाता रहता है और मछली के घूमने के समान सर्वत्र भटकता
रहता है ॥ १७ ॥ फिर काल प्रभाव से वह विवेक और आत्मज्ञान को
प्राप्त होकर उत्तरामुख होकर एक दर्जा से दूसरे दर्जा को प्राप्त होता
जाता है ॥ १८ ॥ तब वह अपने प्राणों को मूर्धा में धारण करके
योगाभ्यास में प्रवृत्त होता है । योग से ज्ञान और ज्ञान से योग की प्रवृत्ति
होती है ॥ १९ ॥ जो योगी सदैव ज्ञान योग में संलग्न रहता है वह